रावण के भाग्य में स्त्रीसुख नहीं था ! इसलिए 14 हजार स्त्रियों से विवाह करने के बाद भी रावण को स्त्री सुख नहीं मिला !अंत में स्त्री सुख की चाहत में ही सीता जी का हरण किया ,फिर भी स्त्री सुख नहीं मिला किंतु स्त्री के लिए ही मार दिया गया | इतना बड़ा विद्वान तपस्वी पराक्रमी रावण भी अपना भाग्य बदलने में सफल नहीं हुआ |
दशरथ जी ने पुत्रेष्टि यज्ञ करके संतान रूप में साक्षात् परमात्मा श्रीराम सहित चार पुत्र पा लिए किंतु संतान सुख में बाधा होने के कारण मृत्यु के समय दशरथ जी को पुत्रों की आवश्यकता सबसे अधिक थी | उस समय उनके पास चार में से एक भी पुत्र नहीं था | ये है भाग्य का बल !
वर्तमान समय में कुछ लोग पत्नी सुख की चाहत में बार बार विवाह करते हैं| अनेकों स्त्रियों से संबंध जोड़ते हैं | इसके बाद भी उन्हें स्त्रियाँ पाकर भी स्त्री सुख और समर्पण नहीं मिलता है | ऐसा ही स्त्रियों के साथ भी होता है |
सच्चाई है स्त्री और पुरुष दोनों एक दूसरे के लिए सुख के साधन हैं | वे तो धन से बल से पद प्रतिष्ठा से हासिल किए जा सकते हैं किंतु पति या पत्नी का सुख उसी को मिलता है जिसके भाग्य में बदा होता है |
बेईमानी करके किसी का धन हरण करके धोखा देकर चोरी करके धन भले पा लिया जाए किंतु धन का सुख नहीं मिलता | जो सुख भाग्य में नहीं बदा होता है वो नहीं मिलता है | सुख तभी मिलेगा जब भाग्य में बदा होगा |
मंदोदरी ने रावण को बहुत समझाया कि सीता को वापस दे दो !तो तुम्हारा जीवन बच जाएगा | राम जीने भी रावण को यही समझाया !रावण को भी पता था कि यदि सीता को वापस दे दूँगा तो युद्ध टल सकता है मृत्यु नहीं | मृत्यु युद्ध के आधीन नहीं है वह तो समय के आधीन है |मृत्यु तो होकर रहेगी | युद्ध तो मृत्यु का बहाना मात्र है जबकि आयु पूरी होने पर ही होती है | मृत्यु के समय जो दुर्घटना घटित हो रही होती है | अज्ञान के कारण उसी को मृत्यु का कारण मान लिया जाता है,जबकि रावण विद्वान था | उसे पता था कि उसी प्रकार की दुर्घटना में बहुत लोग पीड़ित होते हैं किंतु मृत्यु सबकी तो नहीं होती है | जिसकी आयु पूरी होती है उसी की होती है |
मृत्यु होने के लिए दुर्घटना आवश्यक नहीं है | बहुत लोग उठते बैठते हँसते खेलते नाचते कूदते बैठे बैठे पूजा पाठ करते समय अकारण ही मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं | उस समय यदि कोई दुर्घटना घटती तो मृत्यु का बहना वो बन जाती | सच्चाई यही है कि मृत्यु समय से ही होती है |
जिस प्रकार से दीपक का घी समाप्त होने के बाद उसे बुझने से नहीं रोका जा सकता | ऐसे ही आयु पूरी होने के बाद मनुष्य को मरने से बचाया नहीं जा सकता !राम जी ऐसा करते तो पिता की मृत्यु को टाल सकते थे | जटायु जी की मृत्यु को टाल देते !मृत्यु को टालना संभव ही नहीं है | इस सच्चाई को समझने के कारण रावण ने किसी की सीख पर भरोसा न करके सीधे मृत्यु का सामना किया !श्रीराम का दर्शन करते करते प्राण छोड़ दिए
मृत्यु होने का कारण समय होता है या दुर्घटनाएँ !किसी
प्रत्येक व्यक्ति की मृत्यु समय से ही होती है |
शरीर का अंत किसी बाण, रोग या दुर्घटना से नहीं, बल्कि आयु पूर्ण होने पर होता है। जीवन ही दीपक है और आयु उसका घी; जब घी समाप्त, तो दीपक बुझना निश्चित है।
मृत्यु इन बाहरी कारणों की मोहताज नहीं है, यह तो अपने समय से ही आती है। इसी अटल सत्य को जानकर मैंने न राम की बात मानी, न सीता की, और न ही मंदोदरी की। मैं जानता था कि मेरी आयु पूर्ण हो चुकी है, और यदि जीवन को नष्ट होना ही है, तो मुझे मारने का श्रेय पुरुषोत्तम श्री राम को मिले, जिससे मेरी मृत्यु अमर हो जाएगी।