बुधवार, 14 अक्टूबर 2026

 

 

 

भले दिया ने से वायु प्रदूषण कम करने में 

   वायुप्रदूषण बढ़ने के बिषय में पूर्वानुमान लगाने के लिए सबसे पहले वायु प्रदुषण बढ़ने का वास्तविक कारण खोजना होता है | वह कारण कितना सही है | यह पता लगाने के लिए उस कारण के आधार पर वायु प्रदूषण बढ़ने के बिषय में पूर्वानुमान लगाया जाता है |  पूर्वानुमान सही निकलते हैं तो उसके लिए जिम्मेदार माने गए कारणों को सही मान लिया जाता है | पूर्वानुमान गलत निकलने पर अनुसंधान की उस प्रक्रिया को सही कैसे माना जा सकता है |  

 


    कुल मिलाकर वायुप्रदूषण संबंधी अनुसंधानों के नाम पर यह सब जो जो कुछ किया जाता है | वह एक काल्पनिक प्रक्रिया का पालनमात्र है | उसके आधार पर निकाले गए निष्कर्षों का आम आदमी के अनुभवों से कोई मेल नहीं खाता है | जिससे ये संशय होना स्वाभाविक ही है कि  इस प्रक्रिया का वायुप्रदूषण बढ़ने से कोई संबंध है भी या नहीं? 

    वैज्ञानिक शोधों की विश्वसनीयता के लिए, जो अनुमान या  पूर्वानुमान लगाए जाते हैं, उनका सत्यापन किए बिना किसी काल्पनिक प्रक्रिया के पालन मात्र को अनुसंधान कैसे माना जा सकता है |


अनुमानों पूर्वानुमानों की सटीकता की जाँच

      कोई मनुष्य सर्दी लगने के कारण कांप रहा होता है, तो उसके कांपने का कारण उसके पेट में चीरा लगाकर तो नहीं खोजा जाएगा कि कंपन क्यों हो रहा है। इसलिए वैध शोध और व्यावहारिक परिणामों के लिए पहले कारणों की स्पष्टता अनिवार्य है, इसके बिना कौन डेटा कैसा विश्लेषण !                                                                                       ऐसे अनुसंधानों में यंत्रों की उपयोगिता भी तभी सार्थक होगी, जब घटनाओं के घटित होने के कारणों का पता लगा लिया जाए | कोई व्यक्ति दाल बना लेता है | उसे पता लग जाए कि दाल कितनी डालनी है, पानी कितना डालना है। मसाला कितना डालना है।पकाना कैसे है |दाल बना ली गई। खा कर स्वाद भी देख लिया गया | यदि सब कुछ अच्छा हो गया |इसके बाद दाल बनाने में कठिनाई कम हो और समय कम लगे इसके लिए कूकर जैसे यंत्रों के उपयोग के बिषय में सोचा जा सकता है |  

    इसीप्रकार से मौसम संबंधी अनुसंधानों के क्षेत्र में उपग्रहों रडारों या सुपर कंप्यूटरों की आवश्यकता तब पड़ेगी जब मौसम संबंधी घटनाओं के पैदा होने का कारण खोज लिया जाए कारणों को खोजे बिना एवं पूर्वानुमान लगाने का विज्ञान खोजे बिना  यंत्रों की मदद से  किया क्या जा सकता है | कुलमिलाकर मूल सिद्धांतों और कारणों की स्पष्टता के बिना तकनीकी उपकरणों या कम्प्यूटर्स का उपयोग करना अनुसंधान को सही आधार नहीं देता है । पहले कारणों को सिद्ध करना ही शोध की पहली आवश्यकता है।

अध्याय १: मूलभूत दार्शनिक आधार, शोध उद्देश्य और कार्य-कारण ढाँचा। इसमें अनुसंधान के वैज्ञानिक सिद्धांतों और वायुमंडलीय गतिशीलता के प्रत्यक्ष कारणों को स्पष्ट करने का प्रावधान रखा गया है, ताकि कम्प्यूटेशनल मॉडल्स का उपयोग केवल तथ्यात्मक सत्य के आधार पर हो।
शोध में वायु प्रदूषण और मौसमी परिवर्तनों के वास्तविक कारणों को पहचानने पर जोर है।



नाम पर समाज पर थोपा जा रहा है | अनुसंधानों के नाम पर किए जा रहे ऐसे निरर्थक कार्यों पर खर्च होने वाला धन समाज क्यों वाहन करे | ऐसे अनुसंधानों की जिम्मेदारी संभाल रहे लोगों को दिया जाने वाला पारिश्रमिक सुखसुविधाएँ पदप्रतिष्ठा आदि पर व्यय की जाने वाली धनराशि को टैक्स रूप में जनता से क्यों वसूला जाए | 

    ऐसी निरर्थक प्रक्रिया को अनुसंधान बताकर जनता के ऊपर थोपने का समाज को एक और नुक्सान होता है |वह भी इन्हें अनुसंधान ही मान लेता है | इसके साथ ही इनसे ये आशा लगा लेता है कि इस घटना से संबंधित जब जो संकट आएगा | वैज्ञानिक उसका समाधान खोज लेंगे | वो अनुसंधान ही इसी लिए कर रहे हैं |दुर्भाग्य से जब जब ऐसी प्राकृतिक घटनाएँ घटित होती हैं तब तब उन कार्यों से समाज को कोई लाभ नहीं हो पाता  है | जिन्हें अनुसंधान बताकर समाज पर न केवल थोपा जाता रहा है प्रत्युत उन अनुसंधानों एवं अनुसंधाकर्ताओं  पर जिस किसी भी प्रकार से व्यय किए  जा रहे धन का बोझ जनता पर नहीं डाला जाना चाहिए | 

   प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में  अनुसंधानों के नाम पर जो कुछ किया जाता है | उससे यदि अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते हैं तो ऐसे विफल व्यक्तियों को सही अनुसंधान करने के लिए अधिकतम 5 वर्षों का समय दिया जाना चाहिए | यदि वे उस घटनाओं के बिषय में सही पूर्वानुमान लगाने में सफल नहीं हो पाते हैं तो उनके विज्ञान वैज्ञानिकता अनुसंधान एवं उन्हें प्रदान की गई पद प्रतिष्ठा पर पुनर्बिचार किया जाना चाहिए |ऐसे गलत अध्ययनों अनुसंधानों के आधार पर किसी को उस घटना का वैज्ञानिक बता दिया जाना अनुसंधान भावना के साथ न्याय नहीं है | किसी को भूकंप वैज्ञानिक बता दिया जाए कि भूकंप विज्ञान के नाम पर उसे जो कुछ पता हो यदि वो सही हो ही न 

   ऐसे लोगों को विज्ञान मान लेने से या उनकी अपनी गढ़ी गई काल्पनिक  बातों को विज्ञान बताकर समाज पर नहीं थोपा जाना चाहिए अन्यथा जब भूकंप आएँगे | उस समय उन लोगों से या उनकी वैज्ञानिकता से समाज को कोई लाभ पहुँचाया जाना संभव नहीं हो पाएगा | 

     कोरोना महामारी में इतने लोगों के संक्रमित होने या इतनी बड़ी संख्या में रोगियों की मृत्यु होने के लिए यह उदासीनता भी जिम्मेदार हो सकती है | अनुसंधानों की सही समय पर समीक्षा न किए जाने के कारण ऐसे अनुसंधानों से उस प्रकार के सुयोग्य लोग नहीं जोड़े जा सके जिनके द्वारा किए जाते रहे अनुसंधान जनता के किसी काम नहीं आ सके |

    मौसम विज्ञान को ही लिया जाए भारतीय मौसम विज्ञान विभाग की स्थापना हुए लगभग डेढ़ सौ वर्ष बीत गए | मौसम संबंधी अनुसंधानों को करने करवाने वाले लोगों को अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में असफल होते हुए डेढ़ सौ वर्ष बीत गए | आज तक मध्यावधि या दीर्घावधि पूर्वानुमान अनुसंधान के आधार पर नहीं लगाए जा सके | इतने लंबे समय तक असफल होते रहने वाले लोगों को भी वैज्ञानिकों की तरह पूजा जाता रहा | उन पर व्यय किया जाने वाला धन जनता से वसूला जाता रहा है जो उचित नहीं है | अनुसंधानों में लगातार असफल होते रहने वाले लोगों को इतने अवसर नहीं मिलने चाहिए |