बुधवार, 28 अक्टूबर 2026

10008

 


 

 प्रथमअध्याय (  परिचय और समस्या की पृष्ठभूमि )  

    वायु प्रदूषण न केवल गंभीर शारीरिक रोगों और महामारियों को जन्म दे रहा है, बल्कि हमारी वनस्पतियों के पोषक गुणों को भी नष्ट कर रहा है। आज अन्न, दालों और फलों का स्वाद और उनकी पौष्टिकता लगातार घटती जा रही है, जिसका सीधा प्रभाव मानव पोषण पर पड़ रहा है।
   वायुप्रदूषण के कारण अन्न तथा फलों का स्वाद एवं उनकी पौष्टिकता दिनोंदिन घटती जा रही है। शाक सब्जियों आनाजों दालों आदि की पौष्टिकता कमजोर होती जा रही है |वनस्पतियों के पोषक गुण भी कमजोर होते जा रहे हैं |     वायुप्रदूषण के कारण लोगों को प्रदूषित वातावरण में साँस लेना पड़ रहा है | इससे गंभीर शारीरिक रोग एवं महामारियाँ पैदा हो रही हैं |वायुप्रदूषण का सबसे भयावह प्रभाव मानव मस्तिष्क पर पड़ रहा है।बच्चों और युवाओं में आक्रामकता, उत्तेजना,असहनशीलता आदि  बढ़ती जा रही है| परिवार बिखर रहे हैं |तलाक की घटनाएँ बढ़ती जा रही हैं |समाज में हिंसा, हत्या आत्महत्या जैसी घटनाओं को बढ़ते देखा जा रहा है।सभीप्रकार के अपराधों का ग्राफ दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है | 
     इसलिए  शारीरिकस्वास्थ्य मानसिकस्वास्थ्य सुरक्षित रखने एवं सामाजिक चिंतन को सहनशील बनाने के लिए  वायुप्रदूषण के स्तर को कम किया जाना अत्यंत आवश्यक है | इसके लिए अत्यंत प्रभावी उपायों को किए जाने की आवश्यकता है| अनुसंधानों से एवं अनुसंधानकर्ताओं से इतनी अपेक्षा उनकी भी रहती है कि वायुप्रदूषण बढ़ने की समस्या का त्वरित समाधान निकाला जाए | 
     वायुप्रदूषण बढ़ने के लिए जिम्मेदार माने गए प्रमुख स्रोतों  को नियंत्रित करने के लिए जो नीतियाँ बनाई गई है | उनका पालन किए कराए जाने पर भी वायुप्रदूषण का स्तर कम होने का कारण खोजा जाना आवश्यक है | संभव है वायु प्रदूषण बढ़ने के लिए जिन स्रोतों को जिम्मेदार माना जाता है वे न हों | वायु प्रदूषण बढ़ने का कारण कुछ और ही हो | इसलिए वायु प्रदूषण बढ़ने के लिए जिम्मेदार वास्तविक कारणों को खोजना होगा | उन्हीं को नियंत्रित करके वायु प्रदूषण का स्तर कम करना होगा | जिन कारणों का निवारण करने पर वायु प्रदूषण का स्तर कम  हो उन्हें ही वास्तविक कारण मानना चाहिए | 
     वायुप्रदूषण के मान्य मानकों में वाहन उत्सर्जन ,औद्योगिक गतिविधियों से,निकलने वाला धुआँ, दशहरा में रावण  जलाने से निकला धुआँ,ईंट भट्ठों से निकला धुआँ,पराली जलाने से निकला धुआँ निर्माण कार्यों से उड़ी धूल  आदि को वायुप्रदूषण बढ़ने के स्रोतों के रूप में चिन्हित किया गया है |वायु प्रदूषण जब बढ़ता है तब ऐसे कार्यों को प्रतिबंधित किया जाता है | 
     ऐसे कार्य करने भी कुछ कार्यों व्यवसायों कृषकों के लिए आवश्यक होते हैं | जिन्हें अचानक बंद कर देने से उनके कार्य व्यापार आदि प्रभावित होते हैं |उनसे संबंधित समाज के कार्यों में भी बाधा होती है | ऐसे प्रतिबंधों से अचानक होने वाले नुक्सान को भी ध्यान रखा जाना चाहिए |उचित होगा कि वायुप्रदूषण बढ़ने के लिए जिम्मेदार वास्तविक कारणों  पर ही प्रतिबंध लगाया  जाए | हजारों साल से चली आ रही दिवाली में पटाखा फोड़ने,दशहरा में रावण  जलाने जैसे त्यौहारों की परंपरा को प्रतिबन्ध तभी लगाए  जाने चाहिए जब ऐसे प्रतिबंधों से वायु प्रदूषण बढ़ने के स्तर को कम करने में मदद मिलती हो |  
      ऐसा इसलिए किया जाना आवश्यक है क्योंकि ये सब करने के बाद भी वायु प्रदूषण का स्तर कम तो होता नहीं है जबकि धुआँ धूल फैलाने वाले सभी कार्यों को बंद करने से बड़ी संख्या में लोगों की दैनिक एवं व्यावसायिक कार्यों में व्यवधान होता है |वायुप्रदूषण के कारण बढ़ती प्राकृतिक समस्याओं,स्वास्थ्य समस्याओं ,महारोगों एवं मनोरोगों से सुरक्षा किया जाना संभव नहीं हो पा रहा है | 
    वायुप्रदूषण बढ़ने के लिए जिन कारणों को जिम्मेदार मान लिया गया है |वही कारण रहने हैं | प्रतिवर्ष वायु प्रदूषण बढ़ता है | यदि उन्हीं कार्यों पर प्रतिवर्ष प्रतिबंध लगाया जाना है | उससे वायु प्रदूषण कम न होने पर भी यदि यही किया जाना है तो इससे संबंधित अनुसंधानों एवं अनुसंधान कर्ताओं की आवश्यकता ही समाप्त हो जाती है | प्रत्येक कार्य की जिम्मेदारी की तरह ही वायु प्रदूषण का स्तर घटाने की जिम्मेदारी भी जिन्हें सौंपी जाती है उन्हें निभानी चाहिए |   
     प्राचीन काल में भी तो ऐसी परिस्थितियाँ पैदा होती रही होंगी | उस समय इनसे सुरक्षा कैसे की जाती रही है | उन बिषयों में भी अनुसंधान होने चाहिए | इसी दृष्टि से मैं इस क्षेत्र में अनुसंधान करता आ रहा हूँ | मेरा यह प्रस्ताव है कि  इस बिषय में हमारे अनुसंधान काफी सहायक हो सकते हैं | इसी बिषय में हमारी पूर्व सफल भविष्यवाणियाँ इस शोध की प्रमाणिकता सिद्ध करती हैं |जिन्हें व्यक्तिगत बैठक में प्रस्तुत करने के लिए सुरक्षित रखा गया है। 
  
                                                                   द्वितीय अध्याय 
                                       वायुप्रदूषण संबंधी अनुसंधान और पूर्वानुमान ! 
        
    वायुप्रदूषण वर्ष के कुछ महीनों में अधिक बढ़ता है |कुछ महीनों के कुछ दिनों में अधिक बढ़ता है फिर घट जाता है |अक्सर  ऐसा होते देखा जाता है | वायुप्रदूषण जब बढ़ने लगता है तब उसे कम करने की योजना बनाई जाती है | मान्य कारणों पर प्रतिबंध लगाया जाता है तब तक वायुप्रदूषण बढ़ने का समय बीत जाता है | वह स्वयं ही कम होने लगता है | इससे ये पता ही नहीं लग पाता है कि  वायु प्रदूषण उन प्रतिबंधों से कम हुआ है कि प्राकृतिक रूप से कम होता चला गया है | ये पता लगाने के लिए आवश्यक है कि वायु प्रदूषण किन किन दिनों में बढ़ेगा पहले इसका पूर्वानुमान लगाया जाए | उसके आधार पर वायु प्रदूषण का स्तर बढ़ने से पहले प्रतिबंध  लगाए जाएँ |यदि उन प्रतिबंधों का प्रभाव पड़ता होगा तो वायु प्रदूषण बढ़ेगा ही नहीं |  
    वर्तमान समय में विभिन्न वायु प्रदूषकों, जैसे पी एम दो दशमलव पाँच, पी एम दस, ओजोन और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड का डेटा एकत्र किया जाता है। इसके लिए सेंसर नेटवर्क, सैटेलाइट इमेजरी और मौसमसंबंधी चरों का उपयोग किया जाता है। फिर इन आँकड़ों को उन्नत कम्प्यूटेशनल मॉडल, जैसे केमिकल ट्रांसपोर्ट मॉडल और मशीन लर्निंग आधारित एल्गोरिदम में डालकर प्रदूषण प्रसार और वायु गुणवत्ता का पूर्वानुमान लगाया जाता है। 
    इसमें विशेष बात ये है कि वायुप्रदूषण के बिषय में इस प्रक्रिया से लगाए गए पूर्वानुमानों के आधार पर यह पता लगाया जाना संभव नहीं हो पा रहा है कि वायु प्रदूषण कब किस तारीख से बढ़ेगा | इसलिए वायुप्रदूषण बढ़ने से रोकने के उपाय नहीं किए जा पा रहे हैं |  
   वर्तमानसमय में अतिउन्नत विज्ञान है| विकास कार्यों के रूप में उन्नत तकनीक विकसित कर ली गई है | उससे अच्छी से अच्छी गाड़ियाँ, विमान, मोबाइल, कंप्यूटर आदि बना लिए जाएँ या अंतरिक्ष गमन संभव हो गया है | ऐसी संपूर्ण उन्नति की सार्थकता तभी है,जब प्राकृतिक आपदाओं से मनुष्यों की सुरक्षा सुनिश्चित कर ली जाए | मनुष्य ही यदि  सुरक्षित स्वस्थ और सुखी नहीं हैं तो बाकी सभी प्रकार की उन्नति का कोई अर्थ नहीं रह जाता है | मनुष्यों के लिए खोजी गई इतनी सारी सुख सुविधाओं का क्या होगा ,जब उनके  उपयोग करने वाले  ही नहीं बचेंगे |     
    वायुप्रदूषण संबंधी समस्या के समाधान के लिए देशवासी अपने खून पसीने की कठिन कमाई से निकाल कर अपने हिस्से का टैक्स समय से जमा करते हैं |जिससे  अनुसंधानकार्यों ,अनुसंधानकर्ताओं एवं अनुसंधान के लिए आवश्यक संसाधनों से संबंधित आवश्यकताओं की पूर्ति होते रहती है | इससे अनुसंधानों कार्यों में लगे लोगों की सैलरी सुखसुविधाओं आदि में धन की कमी बाधा नहीं बनने दी जाती है | अनुसंधानों पर इतना धन खर्च किए जाने के बाद भी वायुप्रदूषण बढ़ने के कारणों के निर्धारण में अनिश्चितता का वातावरण बना हुआ है | 
     समाज यदि अपने कर्तव्य का सफलता पूर्वक निर्वहन कर रहा है तो वैज्ञानिकों के द्वारा किए जा रहे अनुसंधानों के सुखद परिणाम भी किसी न किसी रूप में जनता के जीवन में सहायक होने चाहिए |यदि वास्तविक कारणों को न खोजा जा सके,सही पूर्वानुमान न लगाया  जा सके | वायु प्रदूषण के बढ़ते स्तर को  घटाया न जा सके तो इसके लिए जनता को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है |  यह कमजोरी अनुसंधानकार्यों एवं अनुसंधानकर्ताओं की है किंतु इसके लिए जनता पर जुर्माना लगाकर उसे  दंडित किया जाना तर्कसंगत नहीं है |
     समाज टैक्स देकर ऐसे अनुसंधानों के लिए अपना योगदान देता है | उन अनुसंधानों से यदि ऐसा कुछ नहीं निकल पा रहा है | जिससे वायु प्रदूषण कम किया जा सके तो इसमें जनता का क्या दोष और उससे जुर्माना क्यों  वसूला जाए | उसका रोजी रोजगार क्यों बंद करवाया जाए | ये कमजोरी अनुसंधानों की है और दंड निर्दोष जनता को मिलता है | ऐसा किया जाना तब तक उचित नहीं है,जब तक वायुप्रदूषण बढ़ने के लिए जिम्मेदार निश्चित कारण खोजे जाएँ ताकि निर्दोष लोगों के कारोबार को वायुप्रदूषण बढ़ाने  के लिए जिम्मेदार बताकर उनके ऊपर जुर्माना न लगाकर उन अनुसंधान कार्यों की पद्धति पर पुनर्बिचार किए जाने की आवश्यकता है | यदि उनसे मदद नहीं मिल पा रही है तो उसके विकल्पों की खोज होनी चाहिए |
     ऐसा बिचार करके मैंने प्राचीन विज्ञान  आधार पर वायु प्रदूषण के कारकों के बिषय में आज के 35 वर्ष पहले अनुसंधान करने प्रारंभ किए थे | जिससे प्राप्त हुए अनुभवों के आधार पर वायु प्रदूषण बढ़ने के बिषय में पूर्वानुमान लगाने के जो प्रयत्न किए गए हैं वे वायु प्रदूषण के स्तर को कम करने में सहायक हो सकते हैं | 
 
                                        प्राचीनविज्ञान और वायुप्रदूषण संबंधी पूर्वानुमान 
 
     वायुप्रदूषण बढ़ने का कारण केवल धुआँ और धूल उड़ाने वाले कार्य ही नहीं होते हैं प्रत्युत प्राचीन विज्ञान इसके लिए भौतिक घटनाओं के साथ साथ प्राकृतिक परिवर्तनों को भी जिम्मेदार मानता है | प्रकृति में तैयार होने वाली प्रत्येक समस्या का समाधान प्रकृति स्वयं ही  करती है | प्राकृतिक परिवर्तनों का क्रम वैसा ही बना हुआ है | ग्रीष्मऋतु  में  नदी तालाब आदि सभी सूख जाते हैं तो इसकी भरपाई वर्षाऋतु करती है | नदी तालाब आदि फिर भर जाते हैं | ऐसे ही ग्रीष्मऋतु  में तापमान बढ़ जाता है ,गर्मी अधिक होती है |इसकी भरपाई हेमंत और शिशिर ऋतुएँ करती हैं | तापमान कम  हो जाता है ,सर्दी बढ़ जाती है | एक समय आता है जब ग्लेशियर बनते हैं तो दूसरा समय आता है,जब ग्लेशियर पिघलते हैं | ये सब प्राकृतिक प्रक्रिया है | यही क्रम वायु प्रदूषण बढ़ने और घटने का है | ऐसी प्राचीन वैज्ञानिक मान्यता है | 
     जिसप्रकार से वर्षाऋतु  में वर्षा लगातार एक जैसी नहीं होती है | कुछ दिन अधिक कुछ दिन कम और कुछ दिन बिल्कुल नहीं होती है | इसीप्रकार से शिशिरऋतु में सर्दी एक जैसी नहीं होती  है |कुछ दिन अधिक कुछ दिन कम और कुछ दिन बिल्कुल नहीं होती है | ग्रीष्मऋतु  में गर्मी का स्तर भी ऐसे ही बढ़ते घटते देखा  जाता है | ऋतुओं का प्रभाव इस प्रकार से घटने बढ़ने का कोई मनुष्यकृत कारण नहीं होता है | ये प्राकृतिक क्रम  है |  
    इसीप्रकार से वायुप्रदूषण का स्तर कुछ सप्ताहों तक अधिक बढ़ जाना ,कुछ दिनों के लिए अधिक बढ़ जाना | ये मनुष्यकृत कैसे वायुप्रदूषण को कम करने वाले उपायों पर बिचार करने पर ध्यान देना होता है कि ें हो सकता है| उद्योग वाहन निर्माणकार्य तो लगभग एक जैसे हमेंशा चलते हैं ,लेकिन वायुप्रदूषण का स्तर हमेंशा एक जैसा नहीं रहता है |ईंट भट्ठे जब तक चलते हैं तब तक भी एक जैसा नहीं रहता है |किसान जब तक पराली जलाते हैं तब तक भी वायु प्रदूषण का स्तर एक जैसा नहीं रहता है | 
     कुछ देश कई कई वर्षों तक  युद्ध का सामना  लगातार करते रहते हैं | जहाँ हजारों बम मिसाइलें बार बार फूटती हैं | वो धुँआ दिवाली दशहरा पराली ईंट भट्ठों से निकले धुएँ से बहुत अधिक होता है |वायु प्रदूषण का स्तर वहाँ उसी अनुपात में बढ़ना चाहिए किंतु  इतना अधिक प्रभाव पड़ते नहीं देखा जाता है | 
        ग्रीष्मऋतु में बढ़े गरमी के स्तर को न तो कम किया जा सकता है और न ही सूखे हुए नदी तालाबों को सूखने से  रोका या भरा  जा सकता है |ऐसे ही वर्षा और सर्दी के वेग को मनुष्यकृत प्रयत्नों से न तो घटाया जा सकता है और न ही बढ़ाया जाना संभव है |ऐसे ही वायुप्रदूषण का बढ़ने  घटने की प्रक्रिया यदि प्राकृतिक घटना है तो इसके  बढ़े  हुए स्तर को मनुष्यकृत प्रयत्नों से कम  किया जाना कितना संभव हो पाएगा | यदि ऐसे प्रयत्नों का प्रभाव पड़ता तो बढे हुए वायु प्रदूषण को रोकने के लिए किए गए प्रयत्नों का प्रभाव पड़ता और वायुप्रदूषण का स्तर कम हो जाता किंतु सभी प्रकार के प्रयत्न लगाने के बाद भी तेज हवाओं के चलने या वर्षा होने पर  ही वायुप्रदूषण का स्तर कम होते  देखा जाता है | 
       ऐसी  परिस्थिति में वायुप्रदूषण का स्तर बढ़ने एवं कम होने की प्रक्रिया प्राकृतिक  भी हो सकती है | यदि ऐसा हुआ तो न तो वायु प्रदूषण बढ़ने के लिए मनुष्य जिम्मेदार हैं और न ही कम होने के लिए मनुष्यों को दोष दिया जा सकता है | 
     इसके लिए वायुप्रदूषण बढ़ने और कम होने के लिए जिम्मेदार कारणों के आधार पर पूर्वानुमान लगाना होगा | ऐसे ही वायुप्रदूषण का स्तर कम करने में यदि तेज हवाएँ चलने एवं वर्षा होने का प्रभाव पड़ता है, वायु प्रदूषण घटने के बिषय में पूर्वानुमान लगाने के लिए तेज हवाओं के चलने एवं वर्षा होने के बिषय में पूर्वानुमान लगाना होगा | सही निष्कर्षों पर पहुँचा जाना तभी संभव हो पाएगा |
 
                              वायुप्रदूषण बढ़ने से होने वाला नुक्सान कितना घातक 
     
 प्राचीन विज्ञान 
  
   पूर्वानुमान लगाने की जिन्हें जिम्मेदारी दी जाती है | जिम्मेदारी संभालने से पहले ये उन्हें सोचना है कि उनमें ऐसी जिम्मेदारी का सफलता पूर्वक निर्वहन करने की योग्यता है या नहीं | जिम्मेदारी संभालने का मतलब ही है कि उनमें इस प्रकार की विशेषज्ञता  है | जो आम लोगों में नहीं होती है | वे वायु प्रदूषण बढ़ने के कारण भी खोज सकते हैं और सही पूर्वानुमान भी लगा सकते हैं |
   इसलिए ऐसे प्रश्नों का उत्तर देने के लिए उनसे निवेदन किया जाना चाहिए कि यदि वायु प्रदूषण बढ़ने के लिए वे दीपावली के पटाखे फोड़े जाने को जिम्मेदार मानते हैं तो ऐसा है या नहीं इसका परीक्षण करने का एक ही रास्ता है | दीपावली के दिन बढ़ा हुआ वायुप्रदूषण दीपावली के बाद समाप्त हो जाना चाहिए | यदि समाप्त हो जाता है तब तो वायु प्रदूषण बढ़ने का कारण पटाखा फोड़ना है | यदि नहीं कम होता है तो वायु प्रदूषण बढ़ने से दीपावली में पटाखे फोड़े जाने का संबध सिद्ध नहीं हो पाता है | बिचार यह भी किया जाना चाहिए कि दीपावली में उतने पटाखे तो नहीं ही फोड़े जाते हैं जितने बम मिसाइलें आदि युद्धों में सम्मिलित सेनाओं के द्वारा छोड़े जाते हैं |आखिर उन देशों में इतना सब होने के बाद भी उस अनुपात में वायु प्रदूषण बढ़ता क्यों नहीं है |दीपावली के पटाखों से क्यों बढ़ जाता है |    विशेष ध्यान देने की बात यह है कि चीन जैसे देशों में तो दिवाली नहीं मनाई जाती है वहाँ वायु प्रदूषण बढ़ने का कारण क्या हो सकता है | दूसरी बात कुछ वर्षों में दीपावली आने से कुछ दिन पहले ही वायु प्रदूषण बहुत अधिक बढ़ जाता है | उस समय तो पटाखे फोड़ना शुरू भी  नहीं हुआ  होता  है |
     इसप्रकार से वायु प्रदूषण बढ़ने का कारण निश्चित किए जाने के बाद उसी कारण के आधार पर वायुप्रदूषण बढ़ने के बिषय में पूर्वानुमान लगाया जाना चाहिए | यदि कारण सही होगा तो पूर्वानुमान भी सही निकलेंगे और पूर्वानुमान सही न निकलें तो इसका मतलब खोजे गए कारण वायुप्रदूषण बढ़ने के लिए जिम्मेदार  नहीं हैं | 
     इसीप्रक्रिया से वायु प्रदूषण बढ़ने के लिए बताए जाने वाले उन कारणों का भी परीक्षण किया जाना चाहिए जो वैज्ञानिकों के द्वारा वायु प्रदूषण बढ़ने के लिए जिम्मेदार बताए जाते हैं | कारण यदि पराली जलाना है तो पराली जलाने का समय समाप्त होने के बाद तो वायुप्रदूषण  का स्तर कम होना चाहिए | ऐसा न होने का मतलब पराली जलाने का वायु प्रदुषण बढ़ने में योगदान न होना है | 
    वायुप्रदूषण बढ़ने का कारण सर्दी के समय में हवाओं की गति धीमी होने को बताया जाता है |यदि ऐसा है तो गर्मी के समय तो हवाएँ तेज चल रही होती हैं | उस समय भी वायु प्रदूषण बढ़ता है | उसका कारण खोजना होगा |    
   ऐसे ही उद्योगों वाहनों ईंट भट्ठों निर्माणकार्यों आदि को वायु प्रदूषण बढ़ने के लिए जिम्मेदार बताया जाता है | ऐसी  गतिविधियाँ तो पूरे वर्ष भर चलती हैं ,तब तो वायु प्रदूषण पूरे वर्ष एक जैसा रहना चाहिए फिर एक सप्ताह में कुछ दिन वायु प्रदूषण बढ़ने एवं  कुछ दिन वायु प्रदूषण घटने का कारण क्या है | उसे खोजा जाना चाहिए |
    इस प्रकार से निश्चित कारणों को खोजकर उनके आधार पर पूर्वानुमान लगाया जाए | उसके सही निकलने से जो कारण सही प्रमाणित हो जाएँ | केवल उन्हीं कारणों को रोकने का प्रयास किया जाना चाहिए | 
                 

तीसरा अध्याय 

                             वायुप्रदूषण संबंधी अनुसंधानों का तुलनात्मक विश्लेषण 

          दशहरे में यदि वायुप्रदूषण बढ़ा तो वायुप्रदूषण बढ़ने  का कारण पटाखा फोड़ने को बताया जाता है | जनता मान लेती है दो तीन दिन बढ़ा रहेगा | दीपावली के समय में वायु प्रदूषण बढ़ा तब भी बढ़ने का कारण  पटाखा फोड़ने को बता दिया जाता है | इससे वायु प्रदूषण एक सप्ताह बढ़ा रहेगा जनता ऐसा मान लेती है | उसके बाद भी जब वायु प्रदूषण बढ़ा रहता है | वायु प्रदुषण बढ़ने का कारण पराली जलाने को बता दिया जाता है |जनता धान की फसल समाप्त होने तक वायु प्रदुषण बढ़ेगा ऐसा मान लेती है | उसके बाद भी जब वायु प्रदूषण नहीं कम होता है तो सर्दी में हवाओं की गति कम होने को वायु प्रदूषण बढ़ने को जिम्मेदार बताया जाता है | गर्मी में वायु प्रदुषण बढ़ता है तो हवाओं की तेजगति तेज होने के साथ  धूल उड़ने को वायु प्रदूषण बढ़ने के लिए जिम्मेदार बता लिया जाता है | 

      कुलमिलाकर वायु प्रदूषण बढ़ने के लिए जब ऐसा कोई कारण नहीं होता है तब उद्योगों वाहनों ईंटभट्ठों निर्माण कार्यों आदि से निकलने वाले धुएँ धूल  को वायु प्रदूषण बढ़ने का कारण बता दिया जाता है |जब जैसी घटना घटित होने लगती है तब तैसा कारण बता दिया जाता है | उस कारण के आधार पर पहले से लगाया गया पूर्वानुमान सही न निकलने के कारण जनता को उन पर विश्वास नहीं होता है |प्रकृति में जब जैसी घटनाएँ घटित होती जाएँगी तब तैसा ही बताया जाना है और उस समय जो काल्पनिक कारण हैं उन्हें ही दोषी बता दिया जाना है तो इसमें अनुसंधान जैसा विश्वसनीय कुछ दिखता भी नहीं है |  

      पराली जलाने या पटाखा फोड़ने वायु प्रदूषण बढ़ने की बातों की तुलना जनता कई कई वर्षों से युद्ध झेल रहे देशों से करती है जहाँ रोज हजारों बम मिसाइलें आदि फोड़ी जाती हैं फिर भी वहाँ के वातावरण में यदि उस प्रकार से वायु प्रदूषण नहीं बढ़ता है तो यहाँ उद्योगों वाहनों ईंटभट्ठों निर्माण कार्यों आदि से इतना अधिक वायु प्रदूषण कैसे  बढ़ सकता है | ऐसी शंकाओं का समाधान किए बिना समाज ऐसी  बातों पर समाज विश्वास  नहीं कर पाता है | 

        इसलिए वैज्ञानिकों के द्वारा बताए गए वायु प्रदूषण से संबंधित पूर्वानुमानों एवं उसे कम करने के लिए लगाए जाने वाले प्रतिबंधों पर समाज विश्वास नहीं कर पाता है | इसीलिए उनके द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के पालन में उनकी रुचि नहीं हो पाती है | जिसके लिए सरकारों को जुर्माना आदि दंड विधान करने पड़ते हैं | उनका उतना प्रभाव इसलिए नहीं पड़ता है ,क्योंकि इतने बड़े समाज पर कोई बात थोपी नहीं जा सकती है |अनुसंधानों के द्वारा समाज का विश्वास जीतकर ही उसे कोई बात मनाई भी सकती है | इसलिए अनुसंधानों की विश्वसनीयता  बढ़ाने के लिए प्रयत्न किए जाने चाहिए | 

  कुल मिलाकर वैज्ञानिकों के द्वारा माने गए  वर्तमान मानक केवल उत्सर्जन सीमाएँ  निर्धारित करते हैं, लेकिन उस प्रक्रिया से  समय, स्थान और प्रत्यक्ष कारकों के गतिशील संयोजन न हो पाने के कारण उसके वायु प्रदूषण पर पड़ने वाले प्राकृतिक प्रभावों को समझना कठिन होता है |  

     हमारी शोध पद्धति के अंतर्गत बहु-मापदंडीय अनुदैर्ध्य आँकड़ों का उपयोग किया जाता है । इसमें वायुमंडलीय चर, वर्षण आँकड़े और खगोलीय पंचांग चक्र शामिल हैं | ये आँकड़े अंशांकन और पूर्वव्यापी सत्यापन का आधार बनते हैं। इससे यह सिद्ध हो सके कि मॉडल पूर्वानुमान लगाने में कितना सटीक रहा है ।खगोलीय पंचांग चक्रों और ऐतिहासिक डेटा का उपयोग करके वायुमंडलीय विकारों के पैटर्न को सटीक रूप से पहचाना जा सकता है | जिससे वैज्ञानिक त्रुटियों और अनिश्चितता को काफी कम किया जाता है।  

      इनके सही निकलने पर वायु प्रदूषण  संबंधी पूर्वानुमानों एवं इसे कम करने के  लिए बनाए जाने वाले नियमों पर जनता का भी विश्वास बढ़ेगा | इनका  पालन समाज स्वयं करने लगेगा |जनता भी तो स्वस्थ रहने के लिए वायु प्रदूषण मुक्त वातावरण चाहती है | जनता और सरकारों के संयुक्त  प्रयासों से  वायु प्रदूषण से स्वास्थ्य सुरक्षा करने में मदद मिलेगी |  


                            वायु प्रदूषण बिषयक  हमारे पूर्वानुमान  
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
                                                              तृतीयअध्याय 

पूर्वानुमान का आधार और प्रस्तावित दृष्टिकोण (प्रस्तावित कार्यप्रणाली और समाधान) नई खोज का विवरण दें, जिसमें आप तकनीकी पहलुओं और समाधानों को स्पष्ट करें।अपनी पूर्वानुमान लगाने की प्रक्रिया और उपयोग किए गए गणितीय मॉडलों का विस्तार से वर्णन करें।

  प्राकृतिक घटनाओं के घटित होने में भौतिक कारणों की जगह परोक्ष घटनाओं का प्रभाव अधिक होता है |इसलिए भौतिक घटनाओं के साथ साथ प्राकृतिक घटनाओं परिवर्तनों के अध्ययनों की भी आवश्यकता होती है |

  इस शोधप्रणाली में भौतिक और परोक्ष कारकों का एकीकरण करना होता है|जिसमें पारंपरिक खगोलीय प्रभावों को प्रत्यक्ष भौतिक आंकड़ों से जोड़कर अध्ययन करना होता है।दीर्घकालिक संकेतों का मानचित्रण ,जिसमें पिछले दस से चौदह वर्षों के विशिष्ट खगोलीय संकेतों के बिषय में लगातार पता लगाना होता है।समय चक्र और ऐतिहासिक आँकड़ों का विश्लेषण करना होता है, ताकि वायुमंडलीय विकारों के स्वरूप को पंचांग चक्रों से मिलाया जा सके। उसका साक्ष्य आधारित अंशांकन और पूर्वव्यापी सत्यापन, जहाँ बहु-मापदंडीय आंकड़ों से पूर्वानुमानों की सटीकता सुनिश्चित की जाती है ।

     पिछले 35 वर्षों से मेरे द्वारा किए जा रहे अध्ययनों अनुसंधानों अनुभवों का उपयोग इस अनुसंधान में किया जाता है | इसमें भौतिक घटनाओं से संबंधित अनुसंधानों का अनुभव सम्मिलित किया गया है |प्राकृतिक घटनाओं के घटित होने में खगोलीय घटनाओं का प्रभाव भी पड़ता है | इसलिए इनका अध्ययन किए बिना प्राकृतिक वातावरण में घटित होने वाली घटनाओं का अध्ययन अनुसंधान आदि किया जाना संभव नहीं है |

    इसलिए  ग्रहों के संचार का गणितीय अध्ययन तथा  सूर्यचंद्र ग्रहणों का प्रभाव , संध्या,तामस कीलक जैसी घटनाओं का भी अध्ययन किया जाता है |सूर्यचंद्र मंडलों एवं आकाश में होने वाले रंग परिवर्तनों को सम्मिलित किया जाता है | ग्रहों की स्थितियों का विवरण शामिल है।वातावरण में समय समय पर प्राकृतिक रूप से धुआँ धूल  की मात्रा बढ़ा देने वाली घटनाओं से संबंधित अध्ययनों अनुसंधानों से प्राप्त अनुभवों का भी उपयोग किया गया है | 

    इसके साथ ही साथ हमारे शोध में पिछले अनेकों वर्षों के वास्तविक आंकड़ों का उपयोग किया गया है। इसमें हवा, बारिश ,तापमान का बढ़ना घटना एवं पिछले वर्षों में वायुप्रदूषण बढ़ने घटने का समय और स्तर आदि अनेकों प्राकृतिक घटनाएँ शामिल हैं | 

    भूकंपों आँधी तूफानों एवं वर्षा के अभाव एवं भौगोलिक परिस्थितियों को भी ऐसे अध्ययनों में सम्मिलित किया जाता है |   

   वैज्ञानिक रूप से, प्रदूषण का स्तर केवल तात्कालिक गतिविधियों पर नहीं, बल्कि वायुमंडल की स्थिति, हवा की गति और तापमान जैसे मौसमी पैटर्न्स पर भी बहुत निर्भर करता है।  इन जानकारियों को आधार मानकर हम अपने अनुमान लगाने वाले मॉडल की सटीकता की जांच करते हैं।

कुल मिलाकर इस शोध पद्धति के अंतर्गत ऐतिहासिक आंकड़ों और खगोलीय पंचांग के तालमेल से प्रदूषण के चक्रों को भांपना होता है | पारंपरिक ज्ञान और विज्ञान के संयुक्त अध्ययनों अनुसंधानों के बिना किसी भी प्राकृतिक घटना के बिषय में अध्ययन अनुसंधान आदि किया जाता है |

 पारंपरिक भारतीय समयविज्ञान, जैसे ॠतु चक्र और खगोलीय व्यवस्था  को आधार बनाकर वायु प्रदूषण के मुख्य कारणों का अनुमान लगाया जाता है |इससे  ऐतिहासिक डेटा और व्यापक पर्यावरणीय मापदंडों के अंतर्संबंधों एवं सहसंबंधों को समझना होता है।


                                                                  चतुर्थ अध्याय 
 

परिणामों का विश्लेषण और अनुमानित प्रभाव  

    इस अध्याय में अक्टूबर, नवंबर और दिसंबर महीनों के लिए तैयार किए गए वायु गुणवत्ता सूचकांक और वातावरणीय पूर्वानुमान प्रस्तुत किए गए हैं। ये पूर्वानुमान हमारे विकसित गणितीय मॉडलों की सटीकता को दर्शाने और वायु प्रदूषण चक्रों के वैज्ञानिक सत्यापन हेतु अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।



 

 



                       
 
 
  ग्राफिक्स

संलग्न ग्राफिक्स और डेटा तालिकाओं में प्रस्तुत निष्कर्ष आने वाले महीनों के मौसमी और प्रदूषण के रुझानों का स्पष्ट विवरण देते हैं। यह विश्लेषण हमारे शोध की प्रभावशीलता को सिद्ध करता है और इसके अगले चरण में इन अनुमानित प्रवृत्तियों की विस्तृत समीक्षा की जाएगी।

                                                                       अध्याय 5
       
     प्राचीन खगोलीय गणितीय प्रणालियाँ आधुनिक डेटा के साथ मिलकर भविष्य के आपदा जोखिमों का सटीक अनुमान लगाने में सक्षम हैं।यह शोध मौसम विज्ञान के क्षेत्र में एक नए प्रतिमान की स्थापना करता है |    प्राचीनविज्ञान के सिद्धांत वायुगुणवत्ता में होने वाले सूक्ष्म परिवर्तनों को समझने में मदद कर सकते हैं | इस तरह के शोध का उपयोग मौसमीयोजना और आपदा प्रबंधनतंत्र को अधिक मजबूत और पूर्वसक्रिय बनाने के लिए किया जा सकता है।प्राचीनविज्ञान का उपयोग दिल्ली और उत्तरभारत में वायुगुणवत्ता के मौसमी पूर्वानुमान और आपातकालीन तैयारियों के लिए किया जा सकता है।
 
   यह शोध  प्राचीन ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के बीच की खाई को पाटता है।इससे आधुनिक तकनीकी उपकरणों और पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों को मिलाकर सटीक परिणाम प्राप्त करने में मदद मिल सकती है | यह शोध पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के संगम से वायुमंडलीय पूर्वानुमान की एक नई और सटीक दिशा प्रदान करता है, जो भविष्य के आपदा प्रबंधन में महत्त्वपूर्ण मदद कर सकता है ।

    इस  पारंपरिकविज्ञान को राष्ट्रीय जलवायु रणनीतियों में एकीकृत किया जा सकता है|यह शोध प्राचीन खगोलीय समय चक्रों को आधुनिक पर्यावरण नीतियों में एकीकृत करने का सबसे प्रभावी और वैज्ञानिक तरीका प्रदान करता है। जिससे स्थानीय मौसमी चक्रों के आधार पर दीर्घकालिक नीतिगत बदलाव लाए जा सकते हैं।यह राष्ट्रीय स्तर पर वैज्ञानिक अनुसंधान की प्रतिष्ठा को बढ़ाता है | 
    यह शोध प्राकृतिक चक्रों को समझने का एक समग्र दृष्टिकोण प्रदान करता है,अंतर-विषयक अध्ययनों के लिए यह एक नया मार्ग प्रशस्त करता है, जो भविष्य में अन्य वैज्ञानिक क्षेत्रों में भी उपयोगी सिद्ध होगा।
    विशेष बात यह है कि यह शोध आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अनूठा वैज्ञानिक मार्गदर्शन प्रदान करता है | जिसे शैक्षणिक संस्थानों के पाठ्यक्रम में भी शामिल किया जा सकता है।यह महत्वपूर्ण बात है कि यह शोध आम जनता के बीच वायु गुणवत्ता को लेकर जागरूकता बढ़ाने में एक बड़ा बदलाव ला सकता है।  पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण का महत्व भी बताता है | भविष्य के वैज्ञानिकों को इस पद्धति में प्रशिक्षित करने का आधार तैयार करता है। यह पद्धति पारंपरिक ज्ञान को पुनर्जीवित करने के साथ-साथ आर्थिक रूप से भी कम खर्चीली और अधिक व्यवहारिक विकल्प प्रदान करती है।
    शोध संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों, जैसे जलवायु कार्रवाई, में योगदान दे सकता है।इससे विश्व के अनेकों देशों को अपने क्षेत्रीय मौसम और आपदा प्रबंधन में मदद मिल सकती है ।
       

      |इसलिए ऐसे अनुसंधानों से वायुप्रदूषण बढ़ने के लिए जो जिम्मेदार कारण पता लगते हैं और जो पूर्वानुमान लगाए जाते हैं | वे कारण और पूर्वानुमान कितने सही निकलते हैं | इसकी समीक्षा समय समय पर सरकारों को करनी चाहिए | जिससे ऐसे अनुसंधानों की सार्थकता कितनी है | ये पता लगता रहे | सार्थकता का अर्थ इससे समाज को कितना लाभ मिलता है |

  इनकी सार्थकता परखने के लिए ये बिचार करना उचित होगा कि यदि ऐसे अनुसंधानों को कुछ समय के लिए बंद कर दिया जाए और अनुसंधानों को बढ़ने के लिए जिन जिन कारणों को जिम्मेदार माना गया है | उनके विरुद्ध कोई कार्यवाही न की जाए तो  क्या वायुप्रदूषण इससे भी अधिक बढ़ जाएगा |इससे वायु प्रदूषण बढ़ने से होने वाले रोग क्या और अधिक बढ़ जाएँगे | 

    इस कसौटी पर कसकर यह पता लगाया जाना चाहिए कि ऐसे अनुसंधानों से वायु प्रदुषण संबंधी समस्या को समझने में इसके कारण पहचानने में एवं इसके बिषय में पूर्वानुमान लगाने में कितनी मदद मिलती है | इसके बिषय में पता लगाना चाहिए | 

 

                                                                   मेरे अनुसंधान 

सन 1996 में दिल्ली में बढे डेंगू के मामलों से हो रही मौतों के लिए वायुप्रदूषण बढ़ने को भी जिम्मेदार बताया गया था | मैंने तभी से वायु प्रदूषण बढ़ने के कारण खोजने एवं पूर्वानुमान लगाने के प्रयास करने प्रारंभ कर दिए थे |   


 

 

 

                                                 अनुसंधानों में जनता का योगदान और लाभ 
    वायु प्रदुषण बढ़ने से नुक्सान जनता का होता है और इससे संबंधित अनुसंधानों की संपूर्ण प्रक्रिया में धन भी जनता का ही लगता है तो इनसे लाभ कितना होता है ये भी जनता की ही दृष्टि से देखा जाना चाहिए |  
    जनता अपने खून पसीने की कमाई से सरकारों को टैक्स देती है| सरकारें वो धन ऐसे अनुसंधानों पर खर्च करती हैं |  

वो सब न किया जाए और जनता की कमाई का वह पैसा ऐसे वैज्ञानिकों उनके अनुसंधान कार्यों पर यदि खर्च न किया जाए ,अर्थात ऐसे अनुसंधान ही बिल्कुल बंद कर दिए जाएँ तो समाज का ऐसा क्या क्या नुक्सान हो सकता है | जो ऐसे अनुसंधानों के होने से बच जाता है | इसका पता सरकारों को लगाना चाहिए | समय समय पर इसकी समीक्षा होते रहनी चाहिए | 

    अनुसंधानों की समीक्षा करते समय तीन बातों पर अवश्य बिचार किया जाना चाहिए |पहली बात उन अनुसंधानों से समाज को लाभ क्या मिलता है | दूसरा समाज को लाभ न मिले तो नुक्सान भी न हो यहाँ तक ठीक है | यदि अनुसंधानों से निष्कर्ष गलत तो नहीं निकाले जा रहे हैं |ये समीक्षा पूर्वक पता लगाया जाना चाहिए |

     कई बार ऐसे गलत निष्कर्ष निकाल लिए जाने के कारण उसी निर्दोष जनता को  दोषी मानकर दंडित किया जाने लगता है | जिसमें उसका दोष ही नहीं होता है | सही अनुसंधान न कर पाने के कारण दोषी वे लोग होते हैं जिन्होंने ऐसे गलत निष्कर्ष निकाले हैं जबकि दोषी उस जनता को बताया जाता है | जो ऐसे अनुसंधानों का आर्थिक भार वहन कर रही होती है | 

                      वायु प्रदूषण बढ़ने के कारणों अनुमानों पूर्वानुमानों की सटीकता की जाँच हो !

 उसका परीक्षण करके यह पता लगाया जाना चाहिए कि वायुप्रदूषण बढ़ने के लिए जिम्मेदार माने गए कारणों के आधार पर वायुप्रदूषण  बढ़ने घटने के बिषय में लगाए गए पूर्वानुमान सच होते हैं ,तब तो जिन कारणों को वायुप्रदूषण बढ़ने के लिए जिम्मेदार माना गया है | वे सही हैं और यदि वायुप्रदूषण  बढ़ने घटने के बिषय में लगाए गए पूर्वानुमान सही नहीं निकलते हैं तो केवल  पूर्वानुमान ही गलत नहीं होंगे प्रत्युत जिन कारणों के आधार पर वे पूर्वानुमान लगाए गए हैं | वे कारण भी गलत होंगे | इसका मतलब वायुप्रदूषण बढ़ने घटने से उन कारणों का कोई संबंध नहीं है | इसके साथ ही अनुसंधानों की उस प्रक्रिया को भी सही नहीं माना जा सकता है | जिसके आधार पर वे पूर्वानूमान लगाए गए थे | 

   इसका मतलब ये हुआ कि वायु प्रदूषण बढ़ने के लिए जिम्मेदार मानकर उद्योंगों ईंट भट्ठों वाहनों निर्माण कार्यों को पराली जलाने वाले किसानों के कार्यों को रोक कर उन सबका नुक्सान भले कर दिया जाए किंतु ऐसा करके वायु प्रदूषण बढ़ने की समस्या को कम नहीं किया जाना संभव नहीं होगा | 

    इसके साथ ही बिचार यह भी किया जाना चाहिए कि ऐसे सभी कार्यों से जो धुआँ या धूल निकलती है | क्या वो सभी स्वास्थ्य के लिए एक जैसा खतरनाक होता है |वाहनों उद्योगों से निकले धुएँ के बराबर ही क्या पराली जलाने से पैदा हुआ धुआँ भी खतरनाक होता है | इसका भी अध्ययन किया जाना चाहिए | जो धुआँ स्वास्थ्य के लिए जितना अधिक खतरनाक  हो  उसे रोकने के लिए उतने सघन प्रयास किए जाने चाहिए |जो धुआँ स्वास्थ्य के लिए अहित  कर न हो | उसे अकारण प्रतिबंधित किया जाना कितना उचित है | जो धुआँ  स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है | उसका स्तर कम हो या अधिक उसे हमेंशा के लिए प्रतिबंधित किया जाना चाहिए | 




 प्रस्ताव: वायु प्रदूषण बढ़ने के वैज्ञानिक कारणों का तार्किक विश्लेषण और स्थायी समाधान हेतु कार्ययोजना

अध्याय 1: अनुसंधान का उद्देश्य और उपयोगिता की समीक्षा
किसी भी वैज्ञानिक अनुसंधान का प्राथमिक उद्देश्य किसी जटिल समस्या की जड़ तक पहुँचना और उसके निवारण हेतु व्यावहारिक विधियाँ खोजना होता है। वर्तमान में वायु प्रदूषण के नियंत्रण के लिए विभिन्न शोधों पर प्रतिवर्ष भारी बजट व्यय किया जाता है, जिसमें से एक बड़ा हिस्सा प्रशासनिक व्यय और कर्मचारियों के वेतन में चला जाता है। यदि इन अनुसंधानों के बाद भी प्रदूषण बढ़ने के वैज्ञानिक कारण पता न चलें, निवारण की विधियां न मिलें, और सटीक पूर्वानुमान न लगाया जा सके, तो ऐसे शोधों की उपयोगिता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। शोध का परिणाम केवल कागजी रिपोर्ट न होकर वास्तविक और प्रभावी समाधान होना चाहिए। 
अध्याय 2: सरकारी नीतियों में निहित कमियां 
 वायु प्रदूषण नियंत्रण के नाम पर सरकार की वर्तमान नीतियां अधिकतर दंडात्मक और प्रतिक्रियाशील हैं, न कि निवारक। सरकार ने प्रदूषण के लिए कई क्षेत्रों को सीधे रूप से उत्तरदायी माना है, लेकिन वैज्ञानिक दृष्टिकोण से प्रदूषण बढ़ने का कोई एक निश्चित और सटीक कारण अब तक सिद्ध नहीं हो पाया है। जब तक प्रदूषण का सटीक और वैज्ञानिक आधार सिद्ध नहीं होता, तब तक कारण के अभाव में विभिन्न प्रतिबंध लगाना तार्किक रूप से उचित नहीं है।
अध्याय 3: दंडात्मक कार्रवाइयों का तार्किक विश्लेषण
प्रशासन द्वारा वाहन चालकों, उद्योगों, ईंट-भट्ठा मालिकों, और किसानों पर जुर्माना लगाकर उन्हें प्रताड़ित किया जा रहा है, जबकि इन सभी स्रोतों का संचालन पूरे वर्ष निरंतर होता है। यदि वाहन या उद्योग ही प्रदूषण के मुख्य कारक होते, तो वायु गुणवत्ता का स्तर पूरे वर्ष एक समान खराब होना चाहिए था, जिसमें मौसमी उतार-चढ़ाव नहीं होते। इसी प्रकार, दिवाली के पटाखों के कारण होने वाले प्रदूषण का प्रभाव कुछ दिनों तक ही सीमित होना चाहिए, लेकिन समस्या का लंबे समय तक बने रहना सिद्ध करता है कि वास्तविक कारण कुछ और है।
अध्याय 4: वायुमंडलीय चक्रों पर आधारित स्थायी सुधार
प्रदूषण की समस्या को केवल सतही मानवीय गतिविधियों का परिणाम मानने के बजाय, इसे विशिष्ट वायुमंडलीय चक्रों और मौसमी बदलावों से जोड़कर समझने की आवश्यकता है। पारंपरिक मौसम विज्ञान और गणितीय गणनाओं के एकीकरण के माध्यम से एक ऐसे पूर्वानुमान आधारित तंत्र का निर्माण आवश्यक है जो प्रदूषण के चरम स्तर की सटीक पूर्वसूचना दे सके, ताकि समय रहते बचाव के उपाय किए जा सकें और दंड आधारित रवैये को बदला जा सके।
अध्याय 5: कार्ययोजना और प्रशासनिक सहयोग
राष्ट्रीय स्तर पर वायु प्रदूषण के कारकों का अध्ययन करने के लिए व्यापक संसाधनों और विशेषज्ञों की आवश्यकता होती है, जिसमें भारी लागत (लगभग एक करोड़ रुपये प्रति वर्ष) आती है। यदि सरकार इस वित्तीय आवश्यकता को वहन करने में सहयोग करती है, तो अनुसंधानों की गुणवत्ता को और अधिक बढ़ाया जा सकता है। संस्थान स्वेच्छा से प्रशासनिक निकायों और अनुसंधान संस्थानों के साथ मिलकर एक समर्पित टास्क फोर्स का गठन करने का प्रस्ताव रखता है, जिससे सरकार साक्ष्य-आधारित निर्णय लेने में सक्षम हो सके और समाज को वास्तविक सुरक्षा प्राप्त हो।