समय विज्ञान और प्राकृतिक नियमों के अनुसार किसी भी व्रत या कर्मकांड से न तो किसी की मृत्यु टाली जा सकती है और न ही आयु बढ़ाई जा सकती है | किसी के भाग्य में पति सुख जितना लिखा है उतना ही मिलेगा जिस समय मिलने को लिखा है उस समय ही मिलेगा जितने समय तक मिलना है उतने समय तक ही मिलेगा | ऐसे समय प्रश्न उठता है कि जब सब कुछ पूर्व निर्द्धारित ही है तो फिर ऐसे व्रतों का फल मिलता ही नहीं है क्या ?किंतु ऐसा नहीं है |
अनुष्ठानों आदि का फल ऐसे अनुभव किया जा सकता है | जिसके भाग्य में जो सुख न बदा हो उसके मन सुख को पाने की इच्छा ही न पैदा हो | किसी रोगी को चिकित्सा के साधन मिलें ये संपत्ति का सुख है किंतु किसी उसे यदि चिकित्सा की आवश्यकता ही न पड़े अर्थात वह रोगी ही न हो | यह व्रतों का अनुष्ठानों का ईश्वर कृपा का लाभ है | ऐसे ही किसी स्त्री के पति की जितनी आयु बदी उतने समय तक उसका सुख समर्पण स्नेह आदि प्राप्त होता रहे और आयु समाप्त होने पर यदि उसका वियोग सहना ही पड़े तो उस समय आत्म संतुष्टि इतनी हो कि पति सुख की आशा किसी और से मन में भी न पैदा हो | ईश्वर कृपा से इस प्रकार के संयम का अभ्यास बन जाए |आत्मिक सुख और संयम मिलता रहे । यही व्रत उपवास अनुष्ठान आदि का फल है | अगले जन्म में संपूर्ण जीवन सौभाग्यवती के रूप में व्यतीत करने का सौभाग्य प्राप्त होता है |
जिस प्रकार चिकित्सा का परिणाम निश्चित नहीं होता, ठीक उसी प्रकार व्रत, जप, तप और यज्ञ अनुष्ठानों का फल भी अनिश्चित होता है। दोनों ही श्रद्धा और विश्वास पर टिके हैं।
कुछ लोग व्यंग्य करते हैं कि क्या करवा चौथ का व्रत करने से पति की मृत्यु टाली जा सकती है; उन्हें यह विचार करना चाहिए कि क्या चिकित्सा कराने, टॉनिक पिलाने या सघन चिकित्सा कक्ष में भर्ती कराने से मृत्यु टाली जा सकती है? वेंटिलेटर पर पड़े साधन-संपन्न लोगों की भी मृत्यु होते देखी जाती है।
भगवान कृष्ण ने श्रीमद्भागवत गीता में कहा है कि आपका अधिकार केवल कर्म करने पर है, परिणाम हमारे हाथ में नहीं है। जैसे अस्वस्थ होने पर चिकित्सा का सहारा लिया जाता है, वैसे ही पुण्यों के संचय और आध्यात्मिक लाभ के लिए पूजा-पाठ, मंत्र जाप और धार्मिक अनुष्ठान करने चाहिए।