रविवार, 15 जुलाई 2018

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पूर्वानुमान 
    कोई भी काम किया जा रहा हो या हो रहा हो वो भविष्य में कैसा किया जा सकेगा या नहीं किया जा सकेगा अथवा कैसा हो पाएगा या कितना हो पाएगा या नहीं हो पाएगा इसकी अनुमानित जानकारी होना बहुत आवश्यक है ! ऐसा जीवन के सभी क्षेत्रों में किया जाना चाहिए !
    पूर्वानुमान से लाभ - 
     जीवन से संबंधित जो भी काम या परिस्थिति भविष्य में जैसी होने वाली है उसका पता यदि हमें कुछ पहले से लग जाता है तो हम अपने लाभ हानि हित अनहित आदि का बिचार करके अभी से उसके समर्थन या विरोध में अपने प्रयास प्रारंभ कर सकते हैं जिससे के अनुशार वो हमारे लिए अच्छी है उससे हमें लाभ हो सकता है जैसी हम चाहते हैं यदि
  


 
समयविज्ञान  और पूर्वानुमान
    पूर्वानुमान तो समय के आधार पर ही लगाया जा सकता है क्योंकि घटनाएँ समय के अनुशार ही घटते देखी जाती है |'समयविज्ञान' जैसी किसी भी चीज पर आधुनिक विज्ञान भरोसा नहीं करता है समय संबंधी पूर्वानुमानों को आधुनिक वैज्ञानिक किस दृष्टि से देखेंगे मुझे नहीं पता ! किन्तु भविष्यवाणी और  पूर्वानुमान के क्षेत्र में आधुनिक विज्ञान के पास अभी तक ऐसा कोई सुदृढ़ आधार है ही नहीं जिसके बल पर दृढ़ता पूर्वक मौसम संबंधी या भूकंप संबंधी कोई पूर्वानुमान लगाया जा सके !समय वैज्ञानिक दृष्टि से मैं कह सकता हूँ कि मौसम से लेकर भूकंप तक और मानव जीवन से जुड़े समस्त विषयों पर पूर्वानुमान संबंधी विषयों में आधुनिक विज्ञान की कोई भूमिका है ही नहीं !आधार विहीन तीर तुक्कों को विज्ञान नहीं माना जा सकता है |  उपन्यासों की कहानियों से ज्यादा कल्पित होते हैं मौसमविज्ञान से संबंधित पूर्वानुमान !
  वस्तुतःमौसम आदि प्राकृतिक घटनाएँ एवं सभी प्रकार के शारीरिक या मानसिक रोग समय का ही विषय हैं और समय की गणना सूर्य और चंद्र की गति के आधार पर की जाती है सूर्य और चंद्र  की गति सिद्धांत गणित के सुदृढ़ सूत्रों से गुँथी हुई है जिनमें गलती की कोई गुंजाइस ही नहीं होती है | जिस सिद्धांतपक्ष के द्वारा सूर्य और चंद्र ग्रहणों की गणित की जाती है और एक एक सेकेण्ड सही निकलती है उन्हीं से मौसम संबंधी गणित की जाए तो पूर्वानुमान बड़ी सीमा तक सटीक घटित हो सकते हैं ! उसी के आधार पर प्राचीन काल में चिकित्सा से लेकर प्राकृतिक आदि सभी परिस्थितियों का पूर्वानुमान लगाया जाता रहा है |
  प्राकृतिक विषय में- वर्षा बाढ़ आँधी तूफान और भूकंप आदि प्राकृतिक आपदाओं के घटित होने के बाद राहत और बचाव कार्यों में जितनी तत्परता वरती जाती है उससे कम आवश्यक नहीं होता है कि ऐसी प्राकृतिक घटनाओं का पूर्वानुमान लगाकर जन जागरण पूर्वक एवं पहले से सावधान किए गए लोगों को स्वसुरक्षा पूर्वक बचाने का प्रयास किया जाए !इसके माध्यम से सरकार के द्वारा चलाए जा रहे आपदा राहत के लिए किए जाने वाले प्रयासों को और अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है          
    वर्षा बाढ़ आँधी तूफान और भूकंप  जैसी प्राकृतिक आपदाओं के विषय में लगाए जाने वाले पूर्वानुमान यदि सही घटित होने लगें तो जन धन के मामले में होने वाली जन धन की क्षति को भारी मात्रा में घटाया जा सकता है इससे मानवता का बहुत बड़ा भला हो सकता है !कई विषयों में अनेक आधुनिकवैज्ञानिक पद्धति से शोध करने  के लिए बहुत परिश्रम किया जाता है बड़े साधनों का उपयोग होता है बहुत सारा धन खर्च किया जाता है सरकार भी उसमें बहुत रूचि लेती है इसीलिए सफलता भी मिलती है इसमें भी कोई संदेह नहीं है इसी कारण से लोगों का विश्वास विज्ञान पर बना हुआ है|
   इसके साथ साथ हमें एक इस बात का भी ध्यान रखना आवश्यक है कि जो विषय आधुनिकविज्ञान से संबंधित हैं उसमें तो आधुनिकविज्ञान बहुत अच्छा कार्य कर ही लेता है किंतु जो विषय आधुनिकविज्ञान से संबंधित नहीं होते हैं उनमें आधुनिकविज्ञान  की कोई विशेष भूमिका नहीं होती है |मौसम आदि ऐसे प्रकरणों में भी विज्ञान के नाम पर व्यक्त किए जाने वाले पूर्वानुमान संबंधी संकेत वैज्ञानिक कम अपितु तीर तुक्के अधिक लगते हैं क्योंकि उनका कोई सुपुष्ट आधार नहीं होता है इसलिए वो प्रायः झूठ निकल जाते हैं जो विज्ञान के नाम पर शोभा नहीं देते !क्योंकि विज्ञान सिद्धांतसूत्रों  से निबद्ध है !जहाँ दो दो मिलकर चार होते ही हैं ऐसी ही आशा मौसम संबंधी पूर्वानुमानों के संबंध में भी की जाती है किंतु इन विषयों से विज्ञान के नाम पर की जा रही भविष्यवाणियाँ विश्वसनीय नहीं लगती हैं क्योंकि वो अक्सर सच होते नहीं देखी जाती हैं |
      भविष्यवाणी हो या पूर्वानुमान इनका आधार एक मात्र समय होता है क्योंकि संसार की अच्छी बुरी सभी घटनाएँ समय के अनुशार ही घटित हो रही होती हैं इन सबका एक कालक्रम बना हुआ है उसी के अनुशार सारी घटनाएँ घटती जा रही हैं !प्रकृति विधान से ये सब कुछ होना बहुत पहले से सुनिश्चित हो चुका होता है कोई माध्यम बने न बने ये उसकी इच्छा किंतु घटनाएँ तो समय के अनुशार घटेंगी ही और घटती ही रहती हैं वो मनुष्य कृत प्रयासों के आधीन नहीं होती हैं यदि ऐसा न होता तो जो मनुष्य को अच्छा लगता वैसी ही घटनाएँ घटित होतीं जो अच्छा न लगता वैसी घटनाएँ होतीं ही नहीं किंतु ऐसा न होने का कारण समय सब कुछ स्वयं करता जा रहा है उसमें से जो कुछ करने के लिए हम प्रयास कर रहे होते हैं यदि वैसा हो जाता है तो उसे हम अपने द्वारा  किया हुआ मान लेते हैं और जो कुछ ऐसा हो जाता है जिसके लिए प्रयास हम नहीं कर रहे होते हैं फिर भी वो हो जाता है उसे टालने का प्रयास करने पर भी होते देखा जाता है वो हमारे लिए हानिकरक या हमारी इच्छा के विरुद्ध हो रहा होता है वो समय प्रेरित होने के कारण टलता नहीं है !कई चिकित्सकों के द्वारा सघन चिकित्सा करने के बाद भी रोगियों की मृत्यु होते देखी जाती है ऐसे समय चिकित्सक निरुत्तर हो जाते हैं कुछ लोग तो ऐसे विपरीत परिणामों के लिए समय भाग्य कुदरत या परमात्मा को जिम्मेदार ठहराने लगते हैं जबकि यदि वैसा हो जाता जैसा वो चाह रहे थे या जिसके लिए प्रयास कर रहे थे तब तो उसके होने का संपूर्ण श्रेय (क्रेडिट)वे स्वयं ले लेते और अपने द्वारा किए जाने वाले प्रयासों की पीठ थपथपाने लग जाते !
    ‘समय’ के क्षेत्र में सूर्य चंद्र आदि ग्रहों  की भूमिका !     
  सूर्य चंद्र आदि ग्रहों के अनुसार समय चलता है वर्ष अयन ऋतुएँ महीना पक्ष तिथियाँ सर्दी गर्मी वर्षात आदि मौसम एवं मौसम संधियाँ सब सूर्य और चंद्र की गति के अनुशार ही बनती हैं इन्हीं दोनों के प्रभाव प्रदान से जल और वायु अर्थात जलवायु का निर्माण होता है ! वस्तुतः वायु वर्षा एवं भूकंप आदि के कारण तो सूर्य चंद्र ही हैं |प्रकृति में घटित होने वाली हर घटना की जड़ में सूर्य और चंद्र का प्रभाव ही होता है !समुद्र में उठने वाली लहरें ज्वार भाँटा एवं भूकंप आदि घटनाएँ सूर्य और चंद्र के प्रभाव से ही घटित हो रही हैं |
   इसलिए सूर्य और चंद्र का समय पर पड़ने वाला प्रभाव एवं समय का प्रकृति पर पड़ने वाला प्रभाव,प्रकृति का मौसम पर पड़ने वाला प्रभाव एवं मौसम का स्वास्थ्य पर पड़ने वाला प्रभाव तथा इन सभी के द्वारा मन पर पड़ने वाले संयुक्त प्रभाव को समझने के लिए  इनके पारस्परिक संबंधों एवं एक दूसरे पर पड़ने वाले असर को आधार बना कर वैदिक विद्या से शोध किया जा सकता है| सूर्य और चंद्र  की गति युति संस्कृति विकृति आदि के साथ समय एवं समय के साथ मौसम और मौसम के साथ सीधा संबंध होने के कारण सभी प्रकार की प्राकृतिक आपदाओं एवं  सभी प्रकार के रोगों के प्रमुख कारणों पर शोध होना चाहिए |सूर्य और चंद्र ही इसके प्रमुख कारण हैं | सूर्य और चंद्र के संचार का पूर्वानुमान यदि गणित के द्वारा लगाया जा सकता है तो इन्हीं के द्वारा निर्मित होने वाली प्राकृतिक घटनाओं आपदाओं और रोगों का पूर्वानुमान भी गणित के द्वारा ही लगा लिया जाए तो इसमें आश्चर्य  क्यों होना चाहिए !आकाशस्थ ग्रहणों का पूर्वानुमान भी तो सैकड़ों वर्ष पहले ही केवल गणित के सिद्धांतों के द्वारा ही किया जाता रहा है |रोग मनोरोग सामूहिक रोग एवं मौसम और भूकंप संबंधी पूर्वानुमानों को गणित के द्वारा संबद्ध करके शोधपूर्वक समय विज्ञान के अनुशार गणित विधा से  इनका पूर्वानुमान लगाया जा सकता है इसके अलावा कोई और रास्ता नहीं है | यद्यपि बहुत आसान वो भी नहीं हैं किंतु श्रमसाध्य है और अर्थसाध्य तो है  और शोध पूर्वक वास्तविकता तक पहुँचा जा सकता है !
                            
    
   समय के अनुशार प्रकृति और प्रकृति  के अनुशार समाज शासन एवं सरकार -
     प्राकृतिक समय जब अच्छा होता है तो सभी ऋतुएँ उचित मात्रा में सर्दी गर्मी वर्षात के द्वारा चराचर जगत का पोषण करती हैं प्रकृति अच्छी मात्रा में पेड़ पौधे फल फूल फसलें शाक आदि उत्पन्न करने लगती  है आरोग्यता प्रदान करने वाली उत्तम वायु बहने लगती है सभी स्त्री पुरुष स्वाभाविक रूप से प्रसन्न रहने लगते हैं सब कुछ अच्छा अच्छा होता चला जाता है! लोगों की सोच सात्विक अर्थात अच्छी बनने लगती है लोग पुराने मुद्दे निपटाने के प्रयास करने लगते हैं वर्षों की बुराइयाँ समाप्त होने लगती हैं टूटी हुए नाते रिस्तेदारियाँ समय के प्रभाव से जुड़ने लगती हैं विखरता समाज फिर से संगठित होने  लगता है परिवारों में समरसता बढ़ते देखी जाती है समाज से हिंसक प्रवृत्तियाँ समाप्त होने लगती हैं ! ऐसी सभी अच्छाइयाँ समाज में प्रत्येक 12 वर्षों में स्वाभाविक रूप से अपने शीर्ष स्तर पर होती हैं फिर 6 वर्षों तक ये सभी प्रकार की अच्छाइयाँ क्रमशः धीरे धीरे घटती चली जाती हैं उसके बाद यही अच्छाइयाँ एक एक कला बढ़ते बढ़ते क्रमशः 6 वर्षों में अपने शीर्ष स्थान अर्थात पूर्ण रूप से अच्छे प्रभाव में पहुँच जाते हैं ये क्रम अनवरत चला करता है !जैसे जैसे अच्छाइयाँ घटती जाती हैं वैसे वैसे क्रमशः बुराइयाँ बढ़ती चली जाती हैं !तब इसी समाज में उनके लक्षण अधिकता में दिखाई देने लगते हैं विपरीत होने पर आँधी तूफान सूखा बाढ़  और भूकंप आदि प्राकृतिक उपद्रव अधिक होते देखे जाते हैं सामूहिक महामारी रोग आदि पैदा होने लगते हैं पेड़ पौधे फल फूल फसलें शाक आदि सब कुछ नष्ट होने लगते हैं !समाज में उन्माद फैलने लगता है अपराध की मात्रा बढ़ती चली जाती है फसलें धोखा देने लगती हैं सामाजिक संघर्ष कलह आदि बढ़ते दिखाई पड़ने लगते हैं !
       इसी प्रकार  समय के प्रभाव से जैसे जैसे समयजन्य अच्छाइयाँ अर्थात सात्विकता धीरे धीरे घटते घटते  क्रमशः जब अपने सबसे निचले स्तर पर पहुँच जाती है वैसे वैसे बुराइयाँ बढ़ती चली जाती हैं और 6 वर्षों में वे क्रमशः अपने सबसे ऊपरी स्तर पर पहुँच चुकी होती हैं उसके बाद वे क्रमशः 6 वर्षों में घटती चली जाती हैं और अच्छाइयाँ  अपने सबसे ऊपरी स्तर पर पहुँच जाती हैं इस प्रकार से हर अच्छा और बुरा समय एक दूसरे का विरोधी होने के कारण एक दूसरे के विपरीत ही चलता जाता है !ये प्रत्येक 12 -14 वर्षों में दोनों प्रकार के समय अपना एक चक्र पूरा करके अपने पुराने स्थान पर पहुँच जाते हैं !
    समय की अच्छाई और बुराई जाँचने परखने के लिए इसके अलावा तीन प्रकार और होते हैं उसमें से एक प्रकार लगभग 30 वर्ष में अपना चक्र पूरा कर लेता है ,दूसरा प्रकार एक वर्ष में एवं तीसरा प्रकार 25 -30 दिनों में अपना चक्र पूरा कर लेता है!ऐसे सभी चक्रों में समय की दृष्टि से लगभग एक दूसरे से बिल्कुल विपरीत समय की अच्छाई और बुराई के दो ध्रुव होते हैं जो क्रमशः परस्पर विरोधी समयों में आते हैं और विरोधी प्रभाव छोड़ते चले जाते हैं !जैसे जैसे एक बढ़ता जाता है वैसे वैसे दूसरा घटता जाता है !इनका समय लगभग निश्चित होता है इसी प्रकार से कुछ अनिश्चित समय भी होते हैं किंतु पूर्वानुमान उनका भी लगाया जा सकता है !
      समय चक्र के अनुशार जब जैसे जैसे अच्छे समय का प्रभाव बढ़ता चला जाता है तो समाज में सभी प्रकार की अच्छाइयाँ विकास संतोष सात्विकता आदि बढ़ती चली जाती है बादल समय पर उचित मात्रा में जलवृष्टि करते हैं फल फूल फसलें अन्न शाक आदि भरपूर मात्रा में पैदा होने के कारण समाज में स्वाभाविक खुशहाली का वातावरण बन रहा होता है ऐसे समय में जिस दल की जो सरकारें सत्ता में होती हैं वो काम कम भी करें तो भी समाज उन पर दोषारोपण नहीं करता है अपितु अपनी व्यवस्थाओं से संतुष्ट होता है !समय अच्छा होने के कारण अधिकाँश लोग खुशहाल संतोषी एवं अच्छा अच्छा सोच जाने वाले होते हैं !उनकी खुशहाली का श्रेय सरकार ले जाती है यदि ऐसे समय कोई चुनाव हो जाए तो उसी दल की सरकार को दुबारा आने का अवसर मिल जाता है !
   इसी प्रकार से समय चक्र के अनुशार जब जैसे जैसे बुरे समय का प्रभाव बढ़ता चला जाता है तो समाज में सभी प्रकार की बुराइयाँ विकार असंतोष असात्विकता आदि बढ़ती चली जाती है बादल समय पर या तो बरसते नहीं हैं या फिर उचित मात्रा में जलवृष्टि नहीं करते हैं इस कारण फल फूल फसलें अन्न शाक आदि भरपूर मात्रा में नहीं पैदा हो पाते हैं इससे समाज में स्वाभाविक खुशहाली का वातावरण नहीं बन पाता है आराजकता असंतोष आपराधिक एवं उन्मादी वातावरण बनता चला जाता है !बुरे समयजन्य ऐसे सभी विकारों के लिए समाज वर्तमान सरकार को ही जिम्मेदार ठहरा लेती है ! ऐसे समय में जिस दल की जो सरकारें सत्ता में होती हैं जनता का आक्रोश उन्हीं पर निकलने लगता है उसकी अपनी व्यवस्थाएँ जो समय के कारण बिगड़ रही होती हैं उसके लिए भी वो जनता को जिम्मेदार ठहरा रहा होता है !ऐसी सरकारें काम कितना भी अच्छा और अधिक कर रही होती हैं तो भी अपनी व्यवस्थाएँ बिगड़ जाने के कारण उनके प्रति समाज के मन में आक्रोश अधिक बढ़ता चला जाता है ! समाज उन पर न केवल दोषारोपण किया करता है अपितु अपनी व्यवस्थाओं से असंतुष्ट होने के कारण सरकार को ही कटघरे में खड़ा किया करता है !
  प्राकृतिक आपदाओं का समय -
      सभी प्रकार की प्राकृतिक आपदाएँ घटित होने के तीन से छै महीने पहले  बननी शुरू हो जाती हैं जिनके सूक्ष्म लक्षण प्राकृतिक परिवर्तनों में दिखने शुरू हो जाते हैं उनका निर्माण जब आधे से अधिक हो चुका होता है तब उन्हें घटित होने से रोक पाना  बहुत कठिन होता है इसलिए किसी भी रोग मनोरोग या प्राकृतिक आपदा के आने से पहले ही यदि उसके आने की आहट पता लगाई जा सके अर्थात पूर्वानुमान किया जा सके और उस प्राकृतिक आपदा ,रोगों या मनोरोगों के निवारण के लिए प्रिवेंटिव प्रयास किए जाएँ जो संभव है कि प्राकृतिक आपदाओं रोगों और मनोरोगों तनावों आदि के वेगों को बहुत हद तक कमजोर किया जा सकता है |
             साधन महत्त्वपूर्ण है या समय ?
   साधन और समय इन दोनों का जीवन में अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान है !जीवन के किसी भी क्षेत्र में प्रयास करने के लिए हमें साधन चाहिए और उसका परिणाम समझने के लिए हमें भाग्य को समझना होगा क्योंकि जो चीज हमारे भाग्य में बदी होगी उसे ही हम प्रयास पूर्वक प्राप्त कर सकते हैं किंतु जो सुख सफलता आदि हमारे भाग्य में बदी ही नहीं होगी उसके लिए कितना भी परिश्रम पूर्वक प्रयास क्यों न किया जाए वो हमें नहीं ही मिलेगी !इस प्रकार से 'समयविज्ञान' के द्वारा पूर्वानुमान लगाकर यह जाना जा सकता है कि हमें जीवन के किस क्षेत्र में प्रयास पूर्वक कितनी सफलता मिल सकती है तथा इसका पूर्वानुमान केवल समय विज्ञान के द्वारा ही लगाया जा सकता है !
     आज विज्ञान के महान सहयोग एवं वैज्ञानिकों के अथक परिश्रम से बड़े बड़े रोगों की चिकित्सा करना तो संभव हो पाया है किंतु चिंता तब विशेष बढ़ जाती है जब सारे साधन उपलब्ध होने के बाद भी जरूरत पड़ने पर रोगियों को मिल नहीं पाते हैं|
     कईबार अचानक भयंकर रूप ले लेने वाले प्राणांतक रोगों से पीड़ित रोगियों के लिए अस्पताल पहुँच पाना तक मुश्किल हो जाता है कई रोगी तो रास्ते में ही प्राण छोड़ देते हैं या कई बार प्रारंभ में सामान्य से दिखने वाले रोग वास्तव में बहुत भयंकर होते हैं जिनकी शुरुआत सामान्य जुकाम बुखार से होती है ऐसे रोगों को अनजान के कारण लोग सामान्य ही समझने की भूल लगातार करते रहते हैं उसी प्रकार की चिकित्सा पर भरोसा करते हैं और आगे बढ़ते जाते हैं धीरे धीरे वे रोग बहुत भयंकर रूप धारण कर लेते हैं तब तक उन्हें बचाना चिकित्सा व्यवस्था के बश की भी बात नहीं रह जाती है |ऐसे रोगों की गंभीरता के विषय में यदि पहले से ही पूर्वानुमान लगा लेना संभव हो पाता तो परिणाम कुछ और अच्छे हो सकते थे | रोगों को इतना बढ़ने से बचाने के प्रयास तो किए ही जा सकते थे परिणाम कुछ  भी होता !ऐसी परिस्थिति में चिकित्सा से संबंधित अत्यंत उत्तम अनुसंधान भी उनके काम नहीं आ पाते हैं | वैदिक विज्ञान के आधार पर सारे जीवन से संबंधित ऐसे पूर्वानुमान जन्म के समय के आधार पर कभी भी लगाए जा सकते हैं जो साठ से सत्तर प्रतिशत तक सच भी हो सकते हैं |
    इसी प्रकार से प्राकृतिक आपदाओं से बचाने के लिए ये सच है कि विज्ञान ने हमें अनेकों प्रकार के साधन उपलब्ध करवा दिए हैं जिससे कि बचाव कार्य बहुत आसान हो जाता है इसमें कोई संदेह नहीं है किंतु आँधी-तूफान ,वर्षा-बाढ़ और भूकंप आदि प्राकृतिक आपदाओं के अचानक आक्रमण से बचाव कार्यों की व्यवस्था के लिए जो समय लग जाता है उससे जन धन की हानि को तुरंत कम कर पाना बहुत कठिन हो जाता है |ऐसी अचानक प्राप्त परिस्थितियों का सामना करने के लिए तैयारी करते करते  बहुत कुछ बिगड़ चुका होता है| जिससे वैज्ञानिकों के वे प्रभावी अनुसंधान उस समय समाज के उतने काम नहीं आ पाते हैं जितनी मदद उनसे ली जा सकती थी | ऐसी परिस्थिति में रोग ,मनोरोग ,सामूहिक महामारियाँ आदि या आँधी-तूफान ,वर्षा-बाढ़ और भूकंप आदि प्राकृतिक आपदाओं को रोक पाना संभव भले न हो पावे किंतु इनके विषय में पूर्वानुमान करने की क्षमता का विस्तार करना आवश्यक ही नहीं अपितु अपरिहार्य हो गया है ! विज्ञान पर भरोसा करके केवल आशा के आधार पर अब बहुत अधिक समय बिताना ठीक नहीं होगा | इसके पूर्वानुमानों के लिए केवल आधुनिक विज्ञान के आश्वासनों पर समय और  अधिक निरर्थक बिताना ठीक नहीं होगा |अचानक प्रकट होने वाले रोगों पर और प्राकृतिक आपदाओं के अचानक आक्रमण करने पर सारे संसाधन लाचार से दिख रहे होते हैं उनका लाभ जितना लिया जाना चाहिए उतना मिल ही नहीं पाता है |
   चिकित्सा और प्राकृतिक आपदाओं के विषय में वैज्ञानिक अनुसंधानों का पूर्णतः लाभ लेने एवं पथ्य परहेज सतर्कता आदि प्रिवेंटिव प्रयोगों के द्वारा जन धन की हानि को कम करने के लिए पूर्वानुमानों की खोज किए जाने की बहुत बड़ी आवश्यकता है|जिससे रोगों और प्राकृतिक आपदाओं के प्रकट होने से पूर्व ही पथ्य परहेज सतर्कता आदि के द्वारा अधिक न बढ़ने देने के लिए प्रभावी प्रयास किए जा सकें एवं प्राकृतिक आपदाओं के विषय में समय रहते बचाव कार्यों के इंतजाम किए जा सकें |                                                                              स्वास्थ्य और समय -            प्रकृति से लेकर शरीर तक की सभी घटनाएँ समय के अनुशार घटित होती हैं इसलिए पूर्वानुमानों के विज्ञान को विकसित करने के लिए समय और परिस्थिति दोनों पर शोध होना चाहिए केवल परिस्थितियों पर नहीं | दोनों का अनुपात भी आधा आधा है इसलिए समय के प्रभाव को समझे बिना केवल  चिकित्सकीय आधार पर पूर्वानुमान लगा पाना संभव ही नहीं है सभी प्रकार की अच्छी बुरी घटनाएँ समय के गर्भ में घटित होती हैं और समय को ही भुला दिया जाए तो  घटनाओं के अनुभवों के आधार पर भावी घटनाओं का पूर्वानुमान करना सही नहीं होगा क्योंकि हो सकता है वो पहले वाली घटनाओं से अलग हों !इसलिए पूर्वानुमानों का आधार समय और परिस्थिति दोनों को बनाया जाना चाहिए |