सनातन हिन्दू धर्म में बहुत संतानों को जन्म देने की परंपरा रही है इसीप्रकार बहुत संतानें हों ऐसे आशीर्वाद भी पहले से ही दिए जाते रहे हैं।पहले जन संख्या कम थी ये तब की बातें हैं किन्तु जब देश में न केवल पर्याप्त जनसंख्या हो गई अपितु बढ़ने लगी तो हिन्दू लोगों ने राष्ट्रहित में अपनी बहुत संतानों को जन्म देने वाली परम्पराओं को रोक कर हम दो हमारे दो वाले सरकारी उद्घोष का सम्मान किया और देश हित को ध्यान में रखते हुए दो बच्चों को जन्म देने लगे !किन्तु इसमें समस्या तब पैदा होती है जब दूसरे धर्मों को मानने वाले लोग सरकार एवं समाज की इस चिंता में सम्मिलित नहीं दिखाई देते हैं प्रत्युत अपने धर्म का हवाला देते हुए बहुत संतानों को जन्म देने की न केवल वकालत करते हैं अपितु इसी भावना से अपने सम्प्रदाय के अनुयायिओं की संख्या बढ़ाते जा रहे हैं !ऐसी परिस्थिति में देश की जनसंख्या का ध्यान उन्हें भी क्यों नहीं रखना चाहिए !
देश की बढ़ती हुई जनसंख्या को रोक कर रखने की सारी जिम्मेदारी केवल हिंदुओं की क्यों है ? अन्य सम्प्रदाय के अनुयायिओं की क्यों नहीं ?क्या इस देश को वे अपना नहीं समझते हैं यदि नहीं तो क्यों ?और यदि हाँ तो कैसे ?यदि द्देश की जनसंख्या इस प्रकार से बढ़ेगी तो यह चिंता का विषय उनके लिए भी क्यों नहीं होना चाहिए !और यदि वो लोग नहीं मानते हैं तो हिन्दू ही क्यों मानें!और वह क्यों न दे पाँच संतानों को जन्म ?
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