शुक्रवार, 14 मार्च 2014

राजनेता हैं या धृतराष्ट एवं राजनैतिक पार्टियाँ हैं या पैतृक संपत्ति !

 टिकट केवल अपने और अपनों के लिए ! बस बारे लोक तंत्र !!!   

         जिन पार्टी के नेताओं को वर्षों से चीखते  चिल्लाते  और यह कहते सुना जा रहा था कि चुनावों का सामना करने के लिए हमारी पार्टी  तैयार है उन्हीं पार्टियों में वही लोग टिकटों का बँटवारा भी शांति पूर्वक नहीं कर सके कई कई दिन तक मीडिया में मचा रहा हो हल्ला और बाद में सच साबित हुईं मीडिया की आशंकाएँ!क्या दस पंद्रह साल में उन्हें इतनी भी तैयारी करके नहीं रख लेनी चाहिए थी?अब कैसे मान लिया जाए कि वो सरकार बनाकर मंत्री पद इतनी आसानी से बाँट सकेंगे !

     वाह ! वारे शीर्ष नेता !बड़ी अच्छी है शीर्ष नेताओं की सोच! जो  बड़े तो हैं किन्तु बड़प्पन ऐसा !जो शीर्ष नेतृत्व अपनी पार्टी के छोटे नेताओं को अपने आचरण से प्रेरणा नहीं दे सकता  वो उनसे अनुशासित रहने की उमींद कैसे कर सकता है ! जो लोग टिकट पाने के लिए खुद मारा मारी कर रहे हों वो लोग टिकटार्थियों को किस मुख से संयम सिखावेंगे !

     जिन पार्टियों  के बड़े नेता अपने लिए सुरक्षित सीट तलाशते भटक रहे हों वहाँ छोटे नेता अपनी जीत पर कैसे करें भरोस ?

     जो  कहते हैं कि हमारी लहर है अरे !मुख में लहर और हृदय में असुरक्षा का भय!वैसे भी लहरें तो उठती ही मिट जानें के लिए हैं समुद्र में तो बड़ी ऊँची ऊँची लहरें उठती हैं किन्तु आज तक किसी लहर को रोक कर नहीं रखा जा सका है लहरों का क्या आस्तित्व और कितना भरोस ?इसलिए लहरों के सहारे न रहकर अब तो करना ही होगा समर्पण पूर्वक जन सेवा का काम!अब सोचने बिचारने का समय ही कहाँ है!  

      जिन नेताओं को लोक सभा तथा विधान सभा के कई कई चुनावों में लगातार पार्टी की नैया डुबोने में महारथ हासिल रहा हो उन्हें यदि लोकसभा टिकट दिए जाएँ तो स्वाभाविक तौर पर स्पष्ट ही है कि पार्टी ऐसे शूरमाओं से क्या काम लेना चाहती है! ऐसी परिस्थिति में पार्टी की आशाओं पर क्यों नहीं खरे उतरेंगे वो पार्टी दुलारे !आखिर क्यों नहीं देंगे वो अपनी उसी बहादुरी का परिचय जिसके बल पर लगातार चुनाव हारने में कामयाबी मिली है उन्हें ! इसलिए उन्हें लोक सभा के टिकट देकर प्रोत्साहित तो किया ही जाना चाहिए अन्यथा विपक्षी पार्टी  होने का ख़िताब कहीं हाथ से निकल न जाए !

      किसी भी पार्टी के कितने टिकट बाँटे गए कितने बेचे गए ये परखने का एक ही तरीका है कि जिसे टिकट मिला हो , यदि उससे अधिक कर्मठ और लोकप्रिय कोई दूसरा कार्यकर्ता  उसी क्षेत्र में रहता है और उसकी उपेक्षा की गई है तो टिकट बेंचा गया है और यदि ऐसा नहीं है तो लोकतंत्र का पालन करते हुए टिकट न्याय पूर्वक दिया गया है।वहाँ सर्वे करा लिया जाए!!

     किसी भी पार्टी में जिसे टिकट दिया जाए उससे यह तो पूछ ही लिया जाना चाहिए कि इस क्षेत्र से आपको टिकट क्यों दिया जाना चाहिए यहाँ आपको जानते कितने लोग हैं और इस क्षेत्र के लिए आपने अभी तक सेवा कार्य क्या किए हैं आखिर क्यों मढ़ दिया जाए आपको इस क्षेत्र की जनता के मत्थे !कौन सा पाप किया है इस क्षेत्र के मतदाताओं ने ?

        कई लोग पैसों के बल पर पार्टी के किसी बड़े नेता से सेटिंग करके चुनावों के साल छै महीने पहले ही अपनी टिकट पक्की कर लेते हैं और होली दीवाली लोहड़ी पंद्रह अगस्त आदि की शुभ कामनाएँ देते हुए अपने पोस्टर लगवाने लगते हैं चुनावों के साल छै महीने पहले से ही फिर पा जाते हैं टिकट! ऐसे लोगों ने पार्टी से पहले कभी कोई सम्बन्ध भी बनाने की जरूरत नहीं समझी है उस क्षेत्र में उनके हवाले कर दी जाती है पार्टी! क्या ये पार्टी, पार्टी विचार धारा एवं पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ गद्दारी नहीं है?

       कुछ क्षेत्रों में टिकट न मिलने के कारण विरोधी पार्टियों के नाराज नेताओं को न केवल गले लगाया जाता है अपितु उन्हें टिकट भी दिया जाता है!आखिर क्यों इस प्रवृत्ति को राजनैतिक वेश्यावृत्ति न कहा जाए !क्योंकि किसी समर्पित कार्यकर्त्ता के लिए उसकी पार्टी माँ के समान होती है और पार्टी की विचारधारा ही आदर्श आचरण होते हैं जिन्हें विपक्ष में होने के नाते वो दलबदलू नेता न केवल गाली देता रहा होता है अपितु पुलिस प्रशासन से मार पीट तक करा चुका होता है उस नेता को क्षेत्रीय कार्यकर्ता अपने नेता के रूप में कैसे स्वीकार करें ! उसकी आत्मा नहीं मानती है ऐसे में पार्टी अनुशासन के नाम पर पार्टी का शीर्ष नेतृत्व क्यों करता है अपने समर्पित कार्यकर्ता की भावना से खिलवाड़!और क्यों लेता है उसके धैर्य की परीक्षा !यही न कि वो बेचारा क्या कर लेगा !किन्तु जैसे बूँद बूँद से सागर भरता है वैसे ही पार्टी के प्रति समर्पित  छोटे से छोटा  कार्यकर्ता  बहुमूल्य होता है,दूसरी पार्टियों से आए हुए बड़े से बड़े कार्यकर्ता की तुलना में!

     इसलिए जो पार्टियाँ अपने कार्यकर्ता की भावनाओं को ऐसी ही ठेस लगातार पहुँचाती रहती हैं ऐसे कार्यकर्ताओं का मसीहा बन कर हर तेरहवें वर्ष कोई न कोई केजरी वाल खड़ा हो जाता है और छीन लेता है पार्टी के मुख तक आई हुई सत्ता!पार्टी बेचारी असहाय सी देखती रह जाती है !!!

     इसलिए ऐसे आगंतुक राजनेताओं को कम से कम पाँच वर्ष का प्रायश्चित्त व्रत करवाना चाहिए बाद में दी जानी चाहिए पार्टी की टिकट !नई नवेली बहू को कभी भी आते ही तिजोरी की तालियाँ  नहीं पकड़ा दी जाती हैं तो सरकार बनाने की तिजोरी की ताली अर्थात लोकसभा टिकट ऐसे नेताओं को कैसे और क्यों दिए जा सकते हैं ?

     लगभग सभी पार्टियाँ आम जनता को धोखे में रखकर क्यों लेना चाहती हैं वोट !आश्चर्य !!! क्या नेता लोग जनता को इतना गंदा या मूर्ख समझते हैं ! ऐसे नेताओं का क्यों न किया जाए बहिष्कार ?  जो राज नेता लोग राजनीति को अपना पैतृक व्यापार मानकर केवल अपने बेटा बेटी ससुर दामाद भाई भतीजा साला  साली  को ही किसी सम्मान जनक राजनैतिक पद प्रतिष्ठा  के लायक समझते हैं बाक़ी सारे देश वासियों को मूर्ख ,अयोग्य या नालायक समझते हैं !ऐसे नेताओं के देश एवं समाज प्रेम पर देशवासियों को कितना विश्वास करना चाहिए ?

       ऐसे स्वाभाविक पाप प्रवृत्ति वाले लोगों की सदैव एक ही कल्पना रहती है कि हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई समेत सभी धर्मों एवं जातियों के लोग अभी तक हमें राजा महाराजा समझकर हमारे सामने दुम हिलाते रहे अब हमारे बेटा बेटी बहुओं को राजकुमार  राजकुमारी राजबहू का सम्मान देकर उनके सामने दुमहिलाते, गिड़गिड़ाते,चाटुकारिता करते रहें और बताते रहें कि आपके फला फला न होते तो अब तक हम मर गए होते!आदि आदि !

       कुछ नेता पद प्रतिष्ठा एवं चुनावी टिकट देते समय केवल अपने बच्चों,सगे सम्बन्धियों,अपनी जाति   अपना गाँव,जिला, प्रदेश आदि सब कुछ अपना अपना ही ध्यान रखना चाहते हैं जैसे अपनी प्रिय जन्म भूमि पर सैफई महोत्सव !आदि आदि । आखिर क्यों सैफई ही क्यों ?किसी नेता के पैदा हो जाने से कोई गाँव तीर्थ हो गया क्या! बाकी सभी लोग कुत्ते बिल्ली हैं क्या ?लगभग  सभी नेता इसीप्रकार से कुछ न कुछ करते या करना चाहते हैं ! पैसा जनता का खर्च हो उत्सव नेताओं के नाम पर उनके नाते रिश्तेदारी गाँव घर जिला जँवार आदि में मनाया जाए !लोकतंत्र में बड़ी ही दुर्भाग्य पूर्ण है ऐसी सोच एवं महत्वाकाँक्षा !

      मैंने सुना है  कि कुछ नेता अपने सगे सम्बन्धियों या बेटा बेटियों को दे रहे हैं चुनावी टिकट, आखिर क्यों ?क्या उस लोकसभा क्षेत्र में रहने वाले पार्टी के सभी नेताओं और कार्यकर्ताओं  की कोई मेडिकल जाँच करवाई गई थी और  उसमें केवल नेता जी के बेटा बेटी ही सबसे अधिक फिट पाए गए थे ?या कोई ऐसी परीक्षा आयोजित की गई थी जिसमें नेता जी के बेटा बेटियों के ही सबसे अधिक  नंबर आए थे या उन्होंने ही  टाप किया था बाक़ी सब फेल हो गए थे ? अथवा नेता जी के बेटा बेटियों ने सामाजिक या जनहित का कोई बड़ा काम किया था जिसमें पार्टी के अन्य कार्यकर्ता बेचारे  पिछड़ गए थे और नेता जी के बेटा बेटी सबसे आगे निकल गए !आखिर उनमें कौन सी ऐसी अच्छाई थी जिसकी बराबरी नहीं कर सके पार्टी के लिए वर्षों से समर्पित रहे बेचारे कार्यकर्ता! क्यों उन्हें उनके अधिकार से बंचित रखा गया और दिए गए नेताओं के बेटा बेटियों को टिकट ?

     पार्टी ऐसे पक्षपाती प्रकरणों में किस पारदर्शी  नियम सिद्धांत एवं विचारधारा का पालन करती है किसी  भी कार्यकर्ता के लिए उसकी अपनी पार्टी माँ के समान होती है और पार्टी का शीर्ष नेतृत्व पिता के समान होता है किन्तु जब माता पिता ही अपने बेटा बेटियों के साथ करने लगें सौतेला व्यवहार तो कहाँ जाएगा लोकतंत्र? यह तो लोकतंत्र की दृष्टि से गम्भीर  खिलवाड़ ही कहा जाएगा।क्या अपने कार्यकर्ताओं को अपनी ही पार्टी इतनी गिरी दृष्टि से देखती है!जो भी पार्टी आदर्श लोकतंत्र पर विश्वास रखती है कम से कम उसे तो इस प्रकार की लापरवाही से बचना   चाहिए ! 

       पार्टी के प्रति समर्पित कार्यकर्ता खून पसीना बहा कर इसी दिन के लिए तो संघर्ष पूर्वक पार्टी का दीपक जलाया करते हैं कि कभी तो मेरा भी नंबर आएगा और हमें भी मिलेगा टिकट !  लोकतंत्र में इसी अवसर का तो सबको सहारा होता है जिसका कि लोकतांत्रिक दृष्टि से अपने अपने समर्पण के अनुशार प्रत्येक कार्यकर्ता वास्तविक अधिकारी होता है किन्तु जब  उस जन सेवक पार्टी प्रहरी का नंबर आवे उसदिन पार्टी के दबंग नेता अपने बेटा बेटियों को लेकर पहुँच जाएँ और उस समर्पित कार्यकर्ता की जगह टिकट दिलाने के लिए   पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर दबाव बनावें और शीर्ष नेतृत्व उनके आगे घुटने टेक दे और स्वीकार कर ले उनकी वो शर्त तो उस पार्टी में किस बात का लोकतंत्र !सबसे संकोच की बात तो यह है कि जिन पार्टियों में शीर्ष नेतृत्व ही इस बीमारी का न केवल शिकार हो अपितु पार्टी के बरिष्ठ पदों पर आया ही पार्टी को लूटने खाने या दलाली करने हो,जहाँ सेवा भावना का लेशमात्र सम्मान ही न हो !उससे पार्टी कार्यकर्ता क्या आशा करें ?

     जिन पार्टियों का कुंद बुद्धि अपाहिज सा शीर्ष नेतृत्व अपनी ही पार्टी के कार्यकर्ताओं को उनकी योग्यता के अनुरूप पद प्रोत्साहन एवं सम्मान न दे सकता हो,जिसमें पात्रता की परीक्षा लेने की क्षमता ही न हो ऐसे नेतृत्व से क्या आशा की जाए !

     जिन पार्टियों का शीर्ष नेतृत्व अपनी आत्मा की आवाज सुनने में ही समर्थ न हो जो स्वयं बंशवाद की गम्भीर पीड़ा से पीड़ित हो या यूँ कह लें कि इस बड़ी बीमारी से ग्रसित हो !पार्टी के बाहर से पार्टी में सम्मिलित होने की इच्छा रखने वाले प्रतिभा सम्पन्न योग्य कार्यकर्ता इस भय से पार्टी में न लिए जा रहे हों कि कहीं कल हमारे ऊपर ही भारी न पड़ जाएँ !ऐसे धृतराष्टों से समाज को क्या और कितनी आशा करनी चाहिए !जहाँ पार्टी एवं पार्टी कार्यकर्ताओं के प्रति लोक तांत्रिक न्याय की संभावनाएँ ही न हों पार्टी के प्रति समर्पित कायर्कर्ताओं का शोषण हो रहा हो ऐसी पार्टियाँ जो आम जनता पर अलोकतांत्रिक एवं भावनात्मक अत्याचार कर रही हैं !इनसे बचा जाना चाहिए फिर भी जो पार्टियाँ या राजनेता ऐसा करते हैं उनका न केवल बहिष्कार किया जाना चाहिए अपितु उनसे पूछा जाना चाहिए कि जब आप आम जनता को किसी लायक समझते ही नहीं हैं आपके बेटा बेटी ही सबसे अधिक काबिल हैं तो आप आम जनता से वोट की अपेक्षा करते ही क्यों हैं ?अर्थात क्यों चाहिए आपको हमारा वोट ?

      मित्रो ! इसी सन्दर्भ में एक चिंतनीय प्रसंग की चर्चा करना चाहता हूँ कि नेताओं के ऐसे आचरणों का दुष्प्रभाव कैसे पड़ता है समाज पर !बात बनारस की है वहाँ शैक्षिक एवं वैचारिक समाज के प्रति समर्पित होने के कारण अपने छात्र मित्रों को खूब मन लगाकर पढ़ाई करने एवं सदाचारी और ईमानदार बनने का उपदेश मैं अक्सर दिया करता था। कवि होने के नाते एक दिन किसी कवि  संगोष्ठी में बुलाया गया जिसमें मध्यम स्तरीय भीड़ थी हमने सदाचरण पर ही कवितायेँ सुनाईं जिससे उस समय तो खूब तालियाँ बजीं किन्तु बाद में कवि  मित्रों ने कहा कि आज कल  पढ़े लिखे सदाचारी और ईमानदार लोगों को पूछता कौन है?जब बिना गलत काम किए पैसे नहीं आते और पैसों के बिना जीवन नहीं चलता है जहाँ तक बात पढ़ाई लिखाई की है कितना भी पढ़ लो जातिगत आरक्षण की तलवार के द्वारा बड़ी ही निर्ममता पूर्वक काट छाँट दिए जाएँगे  !मैंने कहा तो क्या हुआ समाज सेवा करते हुए सक्रिय राजनीति में चले जाना वहाँ तुम्हारी शिक्षा,सदाचार और ईमानदारी का सम्मान होगा वहाँ रहकर परिवार पोषण भी कर सकते हो देश सेवा भी !उन्होंने कहा किन्तु ऐसे लोगों को कौन पूछता है राजनीति में भी ! अपना मन जीवित रखकर अपनी आत्मा की आवाज का अनुपालन करने के कारण कितने लोग स्वीकार किए जा पाते हैं राजनीति में भी कहना बहुत कठिन है !पहली बात तो  ऐसे लोगों से कोई नेता मिलना ही नहीं चाहता है यदि मिलेगा तो या तो चंदा माँगने का काम सौंपेगा या वोट माँगने का! उनकी ईमानदारी इसी तरह कैस की जा सकती है किन्तु ये दोनों काम बिना पढ़े लिखे और बिना किसी ईमानदारी के भी किए जा सकते हैं फिर इन सब बातों की आवश्यकता ही क्या है ?

     उन लोगों की ऐसी नकारात्मक बातें सुनकर उनकी अच्छी खासी योग्यता के प्रमाणपत्रों की कापियाँ लेकर साथ में उनकी पार्टी में काम करने के लिए एक एक प्रार्थना पत्र लगवाकर देश की लगभग हर बड़ी राजनैतिक पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के पास मैंने भेजवाए जिनमे मेरा भी परिचय एवं प्रार्थना पत्र सम्मिलित था किन्तु कहीं से कभी कोई उत्तर नहीं आया इसके बाद तो ऐसे पत्र लिखने का व्यसन सा हो गया लगभग हर चुनाव से पहले मैं अपनी योग्यता के प्रमाण पत्रों के साथ अपने बारे में और भी सबकुछ लिखकर हर चुनाव से पहले लगभग हर पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के पास भेज देता हूँ किन्तु कहीं से कभी कोई जवाब नहीं आता है अबकी बार भी ऐसा ही किया है लगभग 45 दिन बीत गए हैं अभी तक तो कहीं से कोई जवाब आया नहीं है और न ही आने की आशा ही है! हो सकता है कि मुझसे कोई कमी ही रह जा रही हो लिखने बताने समझाने में या हो सकता है मैं उस लायक होऊँ ही न इसलिए राजनैतिक लोग मुझे अपने मुख नहीं लगाना चाहते हैं खैर जो है सो तो ठीक ही है किन्तु अपने पाठक मित्रों के साथ अपनी उस योग्यता का विवरण इसी के साथ लिंक कर रहा हूँ यदि आप पढ़ना चाहें तो अवश्य पढ़ें और साथ ही हमें हमारी कमियों से अवगत करने की कृपा करें मैं आपका आभारी रहूँगा -

( seemore...अपने को योग्य कहूँ या अयोग्य किन्तु राजनेता तो हम जैसों को किसी लायक नहीं मानते हैं !snvajpayee.blogspot.in/2014/03/blog-post_14.html                     

        इसे गद्दारी क्यों न कहा जाए कि अच्छा अच्छा सब अपने एवं अपनों के लिए और वोट चाहिए जनता से !जनता कहीं पिछले कामों का हिसाब किताब न पूछने लगे तुम्हारे घपले घोटाले न उठाने लगे तुम्हारे भ्रष्टाचार पर जवाब न माँगने लगे इस लिए जनता के क्रोध की तोप का मुख जाति, क्षेत्र, समुदाय के नाम पर दूसरों की और मोड़ देते हैं कितनी कुटिलता  भरी है मनों  में !इसी प्रकार दलितों के नेता कहलाने वाली राजनैतिक आत्माएँ जनता के पैसे से खुद तो करोड़ों के घाँघरे पहनें और जहाजों पर चढ़े घूमें कोठियों पर कोठियाँ खरीदें महँगी महँगी गाड़ियों के मालिक मालकिन बन बैठे हों और जब दलितों की गरीबत की बात आवे तो उनके मन में सवर्णों के प्रति घृणा पैदा करना कि तुम्हारा शोषण सवर्णों ने किया है उन्हें सवर्णों से लड़ने के लिए उत्तेजित करना !ऐसे दुराचरणों को नीचता और गद्दारी न कहा जाए तो क्या कहा जाए ?

     इसी प्रकार अपने को दलित कहलाने के शौकीन नेता लोग जो दलितों की दुर्दशा के लिए सवर्णों को कोसते या दोषी ठहराते हैं उनमें यदि थोड़ी भी शर्म संकोच हो तो सवर्णों की संपत्ति की जाँच करवा लें और अपनी संपत्ति की भी करवा लें जिसके पास ज्यादा निकल जाए सो लुटेरा मान लिया जाए ! इसके बाद सवर्णों के शोषण सम्बन्धी बात को आधार हीन मान लिया जाए और ये जाँच आम जनता के द्वारा कराई जाए !साथ ही यह भी पता लगाया जाए कि जब आप राजनीति में आए थे तब आपके पास कितनी संपत्ति थी और आज कितनी है कहाँ से आई ये संपत्ति !और जो नेता कहते हैं कि हमारे पास पहले से ही है तो उस आय के स्रोत क्या थे उसका भी पता लगाया जाए !और यदि वास्तव में पहले से ही थी इतनी सम्पत्ति तो दलित किस बात के ?

         इसका सीधा सा अर्थ है कि इन दलित मगरमच्छों ने स्वयं ही दलितों को लूटा है और सवर्ण मगर मच्छों ने सवर्णों को लूटा है आखिर सवर्णों में भी तो गरीब हैं !या फिर दलित हों कि सवर्ण सभी वर्ग के संपत्तिसिन्धुओं के आर्थिक स्रोतों की जाँच की जाए जिसके आय स्रोत पवित्र और पारदर्शी हों उन्हें प्रोत्साहित किया जाए बाकी की संपत्ति देश के कोष में जमा की जाए जो जनता के काम आवे !

          ऐसे अकर्मण्य नेताओं में पनपी सत्ता की भयंकर भूख  गरीब सवर्णों को मार डालने पर अमादा है क्या है आरोप है  इन गरीब सवर्णों पर ! यही न कि इनके पूर्वजों ने कभी दलितों के पूर्वजों का शोषण किया होगा !केवल इस आशंका के कारण जातिगत आरक्षण के रूप में सवर्णों से बदला लिया जा रहा है!आखिर क्या है सच्चाई इस आरोप में ?बहु संख्यक दलितों ने आखिर क्यों सहा होगा अल्प संख्यक सवर्णों के द्वारा किया गया शोषण !ऐसे तर्कहीन अंधविश्वासी आरोपों पर क्यों दी जा रही है गरीब सवर्णों को सजा ? क्या इस देश में गरीब सवर्णों के कोई अधिकार ही नहीं होने चाहिए ?जहाँ सभी नागरिकों के समान अधिकार न हों वह कैसा लोकतंत्र ?ऐसे अंधविश्वास के सहारे कब तक ढोया जाएगा यह प्रभाव विहीन पूर्वाग्रह ग्रस्त लोकतंत्र ?

        जब वी.पी.सिंह सरकार के समय  सरकारी शोषण से ऊभकर गरीब सवर्ण लोमहर्षक आत्मदाह कर रहे थे तब कहाँ था लोकतंत्र ? आत्मदाह कोई सुख से नहीं कर सकता है कितना कठिन होता है एक अंगुली भी जलाना ! आखिर कोई असह्य पीड़ा तो रही ही होगी उनकी जिसे सहने की अपेक्षा आत्मदाह करना उन्हें अधिक आसान लगा !ऐसे गरीब सवर्णों की पीड़ा पर किसी का ध्यान क्यों नहीं गया ऐसे कठोर क्रूर लोकतंत्र को गरीब सवर्ण कैसे क्यों और कब तक लगाए रहें सीने से जो तर्क हीन अंधविश्वास के सहारे केवल सत्तालु नेताओं का पेट भरने के लिए चलाया जा रहा हो! इस जातीय अंधविश्वास के कारण गाँवों में उन गरीबों को आपस में लड़ाया जा रहा है जो पहले कभी एक दूसरे के पास बैठकर मन के सुख दुःख बता लिया करते थे एक दूसरे के सहारे मिलजुल कर आपस में कर लिया करते थे अपने बेटा बेटियों के काम काज ! अब नेताओं की सत्ता भूख ने नष्ट कर दी गाँवों की सुषमा सुंदरता सद्भावना भाईचारा आदि और घटित हो रहे हैं मुजफ्फर नगर  जैसे असह्य  नर संहार!

          इसलिए अब आवश्यक हो गया है जब ऐसे सत्ता लोलुप  नेताओं को मुख लगाना ही बंद कर दिया जाए और इनसे कहा जाए कि आप केवल भ्रष्टाचार रहित स्वच्छ प्रशासन दीजिए बस !बाकी हम लोग अपनी अपनी तरक्की स्वयं कर लेंगे हमें आपकी नरेगा ,मरेगा,मनरेगा एवं भोजन बिल जैसी किसी सुविधा की आवश्यकता ही नहीं है हम लोग परिश्रम पूर्वक अपना परिवार चला  लेने में सक्षम हैं !

 

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