मंगलवार, 3 नवंबर 2026

प्रस्ताव

 

 

आदरणीय सचिव महोदय जी 

                                                          सादर नमस्कार  

 बिषय : वायुप्रदूषण बिषयक पूर्वानुमानों के बिषय में मिलने का  समय देने हेतु विनम्र निवेदन ! 

       महोदय,  

     वायुप्रदूषण बढ़ने का वास्तविक कारण क्या है और ये कब कब बढ़ता है | इसका पता लगाए बिना केवल आशंका के नाम पर कुछ कार्यों पर प्रतिबंध लगाया जाना कितना उचित है | ऐसे ही वायु प्रदूषण बढ़ने के बिषय में पूर्वानुमान पता लगाए बिना कुछ दिनों  सप्ताहों महीनों  के लिए प्रतिबंध लगा दिया जाना तब तक उचित नहीं है जब तक ऐसा किया जाना आवश्यक न हो !क्योंकि ऐसे कार्य रोके जाने से इनसे संबंधित आजीविका वाले लोगों का नुक्सान हो जाता है | 

     मौसम के बिषय में मैं पिछले 35 वर्षों से अनुसंधान करता आ रहा हूँ |उनसे प्राप्त अनुभवों में धुआँ और धूल उड़ाने वाले कारणों के अलावा कुछ दूसरे कारण भी वायुप्रदूषण बढ़ने के लिए जिम्मेदार हैं|जिनका प्रभाव मनुष्यकृत धुआँ  और धूल से भी अधिक होता है | उनके आधार पर लगाए गए वायुप्रदूषण बिषयक पूर्वानुमान सही होते देखे जाते हैं | जो पिछले  कई वर्षों से सही निकलते देखे जा रहे हैं | जो पीएमओ की मेलों पर प्रायः प्रतिवर्ष भेजे जाते हैं | सोशल मंचों पर प्रकाशित भी किए जाते हैं |उन्हीं दूसरे कारणों के आधार पर वायु प्रदूषण के बिषय में लगाए गए पूर्वानुमान मैं आपको भेज रहा हूँ | इनका परीक्षण करवाकर देखा जाए | आपको भी यदि ये सही लगते हैं तो इनके आधार पर समाज को  अनावश्यक प्रतिबंधों से बचाया जा सकता है और वायु प्रदूषण के बिषय में आगे से आगे पूर्वानुमान पाए जा सकते हैं | वायु प्रदूषण से सुरक्षा के लिए समय रहते प्रभावी प्रयत्न किए जा सकते हैं | 

    हमारी बहुबिषयक अनुसंधान प्रक्रिया हमारे संस्थान की बौद्धिक संपत्ति है | इसलिए इससे संबंधित निजता को सुरक्षित रखते हुए भी वे पूर्वानुमान उपलब्ध करवाए जा सकते हैं | जो वायुप्रदूषण से समाज की सुरक्षा के लिए अग्रिम तैयारियाँ करने में सहायक हो सकें | इससे संबंधित कुछ तथ्यों को प्रत्यक्ष रूप से प्रस्तुत करने के लिए आपसे मिलने का समय चाहिए | 

 निवेदक -: 

  डॉ. शेष नारायण वाजपेयी  
  M.A. Ph.D. B.H.U. 
 संस्थापक :राजेश्वरी प्राच्य विद्या शोध संस्थान  
  A-7\41,सेकेंडफ्लोर  ,शनिबाजार,लालक्वार्टर
 कृष्णानगर ,दिल्ली -110051 
   (फोन : 98 11 22 69  83)   
 

                                                           अनुसंधान की आवश्यकता     

          वायु प्रदूषण के बिषय में अनुसंधानों की आवश्यकता केवल पाँच बातों के लिए होती है | एक तो वायुप्रदूषण  बढ़ने के वास्तविक कारण खोजे जाएँ | दूसरे वायुप्रदूषण बढ़ेगा कब इसके बिषय में सही पूर्वानुमान लगाया जाए |तीसरा प्रतिबंधों को लगाने से क्या वास्तव में वायु प्रदूषण कम होता है | चौथा वायुप्रदूषण बढ़ने से क्या वास्तव में संक्रमण (रोग) बढ़ता है |पाँचवाँ वायु प्रदूषण बढ़ने की प्रक्रिया क्या वास्तव में मनुष्यकृत ही है |इसके लिए प्राकृतिक परिस्थितियाँ तो जिम्मेदार नहीं हैं | 

    इन पाँचों प्रश्नों के उत्तर खोजने के लिए मैं विगत 35 वर्षों से प्राचीन एवं आधुनिक विज्ञान के संयुक्त अध्ययन के आधार पर अनुसंधान करता आ रहा हूँ | उससे जो अनुभव प्राप्त हुए हैं वो हमारी बौद्धिक संपदा है | उसे तब तक उद्घाटित करना उचित नहीं होगा जब तक किसी निश्चित निष्कर्ष पर न पहुँच  जाया जाए |इससे प्राप्त परिणाम यदि वायु प्रदूषण संबंधी रहस्य को समझने एवं इस संकट का समाधान खोजने में सहायक हो सकें तो उसके लिए मैं यह प्रस्ताव प्रस्तुत करना चाहता हूँ | 

     मैंने बिचार किया कि किसी रोग को पहले पैदा होकर बढ़ने दिया जाए बाद में उसे शांत करने का प्रयास किया जाए | ऐसी स्थिति में जिस किसी उपाय से यदि रोग को  शांत किया जाना अपने बश में है तो उस रोग को बढ़ने ही क्यों दिया जाए | उसे पैदा होते ही शांत कर दिया जाए | ऐसे ही वायुप्रदूषण के स्तर को कम किया जाना यदि वाहनों उद्योगों ईंटभट्ठों एवं निर्माणकार्यों पर प्रतिबंध लगाने से संभव है, तो वायुप्रदूषण बढ़ने के कुछ पहले से प्रतिबंध लगाकर वायु प्रदूषण के बढ़ने की प्रक्रिया को प्रारंभ में ही क्यों न रोक दिया जाए | उसे बढ़ने की प्रतीक्षा ही क्यों की जाए |  

    इस बिषय में हमारे अनुसंधानों के आधार पर जो साक्ष्य प्राप्त हुए हैं | उनके आधार पर यह कहा जा सकता है कि ऐसा इसलिए नहीं किया जा  सकता है ,क्योंकि ऐसे प्रतिबंधों से वायु प्रदूषण  कम  किया जाना  संभव ही नहीं है | इसका कारण वायु प्रदूषण बढ़ाने में उन कारकों की भूमिका ही नहीं है | जिनपर प्रतिबंध लगाकर वायु प्रदूषण को घटाने की आशा की जाती है | इसे विश्वसनीय बनाने के लिए एक बार समय पूर्व प्रतिबंध लगाकर प्रतिबंधों के प्रभाव का परीक्षण कर लिया  जाना चाहिए | 

      वायु प्रदूषण बढ़ने से रोग बढ़ता है यह बात विद्वान् स्वास्थ्य वैज्ञानिकों के द्वारा अक्सर कही जाती है |कोरोना काल में भी उनके द्वारा संक्रमण बढ़ने या संक्रमितों की संख्या बढ़ने के लिए वायु प्रदूषण बढ़ने को जिम्मेदार  बताया गया था |इसी के आधार पर वरिष्ठ स्वास्थ्यविशेषज्ञों ने 2020 के अक्टूबर नवंबर में वायु प्रदूषण बढ़ने के कारण संक्रमितों की संख्या बढ़ने की भविष्यवाणी की थी |उन्होंने कहा था कि अक्टूबर-नवंबर 2020 में दिल्ली में संक्रमण की तीसरी लहर आएगी और रोजाना मामले 15,000 तक जा सकते हैं |

    इन बातों के परीक्षण में ये अनुमान सही नहीं निकले प्रत्युत  इससे उलट देखा गया | वायु प्रदूषण तो उस  समय बहुत बढ़ा किंतु 2020 के अक्टूबर से दिसंबर के बीच कोरोना संक्रमण दिनोदिन घटता चला जा रहा था | जिससे ये सिद्ध होता है कि कोरोना संक्रमितों की संख्या बढ़ने के लिए वायु प्रदूषण का बढ़ाना जिम्मेदार नहीं था |ऐसे ही कोरोना की दूसरी सबसे भयंकर लहर मार्च अप्रैल 2021 में आई थी | उस समय वायु प्रदूषण रहित आकाश इतना  स्वच्छ था कि  पंजाब के अमृतशर एवं बिहार के सीतामढ़ी आदि जिलों से हिमालय दिखाई देने लगा था |ये तथ्य वायु प्रदूषण के प्रभाव से कोरोना संक्रमण बढ़ने घटने की बात का समर्थन नहीं करते हैं | 

    ऐसे में निवेदन यह है कि रोगी होने का कारण वायु प्रदूषण का बढ़ना है और वायुप्रदूषण बढ़ने का कारण  धुआँ धूल उड़ाने वाले कारक हैं | ऐसा मान लिया गया है और परीक्षण में ये दोनों बातें गलत निकल जाती हैं |इन गलत  पूर्वानुमान के लिए जिम्मेदार वे हैं जिन्होंने ऐसा करने की  सँभाली हुई है | यदि वे सही अनुमान नहीं लगा पाते हैं तो उन लोगों का क्या दोष है | जिन कार्यों पर प्रतिबंध  लगाने से उनसे जुड़े लोगों की आजीविका बाधित होती है | जिनके टैक्स से प्राप्त पैसा ऐसे अनुसंधानों पर भी खर्च किया जाता होगा | उन्हीं अनुसंधानों के आधार पर प्राप्त किए गए तथ्यों से यदि उन्हीं का नुक्सान हो | उसमें उनकी कोई  हो तो ये उनके साथ न तो न्याय है और न ही तर्कसंगत है |

     इसी या इससे भी कठिन कसौटी पर वायु प्रदूषण बिषयक हमारे द्वारा यहाँ प्रस्तुत किए जा रहे पूर्वानुमानों का भी  परीक्षण किया जाए | यदि ये सही निकलते हैं तो जनहित के उद्देश्य से हमारे पूर्वानुमानों को स्वीकार किया जाना चाहिए और हमारे अनुसंधानों का भी स्वतंत्रसहयोग किया जाना चाहिए | ऐसा विश्वास किया जाना चाहिए कि हमारे अनुसंधानों से जो सच निकलेगा | वो विश्व की किसी वैज्ञानिक सभ्यता के लिए आश्चर्य कारक होगा | उसके उद्घाटन का भी समय आएगा और परिस्थिति बनेगी | 

                                                    हमारा विनम्र निवेदन  

 अध्याय 1: अनुसंधान का उद्देश्य और उपयोगिता की समीक्षा

    किसी भी वैज्ञानिक अनुसंधान का प्राथमिक उद्देश्य किसी जटिल समस्या की जड़ तक पहुँचना और उसके निवारण हेतु व्यावहारिक विधियाँ खोजना होता है। वर्तमान में वायु प्रदूषण के नियंत्रण के लिए विभिन्न शोधों पर प्रतिवर्ष भारी बजट व्यय किया जाता है, जिसमें से एक बड़ा हिस्सा प्रशासनिक व्यय और कर्मचारियों के वेतन में चला जाता है। यदि इन अनुसंधानों के बाद भी प्रदूषण बढ़ने के वैज्ञानिक कारण पता न चलें, निवारण की विधियाँ  न मिलें, और सटीक पूर्वानुमान न लगाया जा सके, तो ऐसे शोधों की उपयोगिता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। शोध का परिणाम केवल कागजी रिपोर्ट न होकर वास्तविक और प्रभावी समाधान होना चाहिए। 
अध्याय 2: सरकारी नीतियों में निहित कमियाँ  
    वायुप्रदूषण नियंत्रण के नाम पर सरकार की वर्तमान नीतियां अधिकतर दंडात्मक और प्रतिक्रियाशील हैं, न कि निवारक। सरकार ने प्रदूषण के लिए कई क्षेत्रों को सीधे रूप से उत्तरदायी माना है, लेकिन वैज्ञानिक दृष्टिकोण से प्रदूषण बढ़ने का कोई एक निश्चित और सटीक कारण अब तक सिद्ध नहीं हो पाया है। जब तक प्रदूषण का सटीक और वैज्ञानिक आधार सिद्ध नहीं होता, तब तक कारण के अभाव में विभिन्न प्रतिबंध लगाना तार्किक रूप से उचित नहीं है। धुआँ और धूल उड़ाने वाले कार्यों पर प्रतिबंध लगाने के बाद भी वायु प्रदूषण का स्तर बढ़ते जाना ये सिद्ध करता है कि प्रतिबंधित किए गए कार्य वायु प्रदूषण बढ़ने के लिए पूरी तरह जिम्मेदार नहीं हैं |इसलिए सच्चाई सामने आने से पहले ऐसे कार्यों को प्रतिबंधित करना न तर्कसंगत है और न ही सहायक है |      
अध्याय 3: दंडात्मक कार्रवाइयों का तार्किक विश्लेषण
    वायुप्रदूषण बढ़ने पर  प्रशासन द्वारा वाहन चालकों, उद्योगों, ईंट-भट्ठा मालिकों, और किसानों पर जुर्माना लगाया जाता है | उन कार्यों को प्रतिबंधित किया जाता है , जबकि इनमें से अनेक स्रोत ऐसे हैं जिनका संचालन पूरे वर्ष किया जाता है | यदि वाहन या उद्योग ही प्रदूषण के मुख्य कारक होते, तो वायु गुणवत्ता का स्तर पूरे वर्ष लगभग एक समान खराब होना चाहिए था, जिसमें मौसमी उतार-चढ़ाव नहीं होते। इसीप्रकार दिवाली के पटाखों के कारण होने वाले प्रदूषण का प्रभाव कुछ दिनों तक ही सीमित होना चाहिए | प्रतिबंध लगाने के बाद वायु प्रदूषण कम होना चाहिए |वायुप्रदूषण  का लंबे समय तक बने रहना, प्रतिबंधों के बाद भी वायुप्रदूषण बढ़ते जाना ये सिद्ध करता है कि वायुप्रदूषण बढ़ने के वास्तविक कारण कुछ और हैं । जिन्हें खोजे बिना ऐसे कार्यों पर प्रतिबंध लगाया जाना तर्क संगत नहीं है | बहुत लोगों की आजीविका ऐसे कार्यों से जुड़ी होती है | उनमें काफी लोगों की आजीविका दैनिक आय पर आश्रित  होती है | प्रतिबंध लगाते समय इसे भी ध्यान रखा जाना चाहिए | 
अध्याय 4: वायुमंडलीय चक्रों पर आधारित स्थायी सुधार
प्रदूषण की समस्या को केवल सतही मानवीय गतिविधियों का परिणाम मानने के बजाय, इसे विशिष्ट वायुमंडलीय चक्रों और मौसमी बदलावों से जोड़कर समझने की आवश्यकता है। पारंपरिक मौसम विज्ञान और गणितीय गणनाओं के एकीकरण के माध्यम से एक ऐसे पूर्वानुमान आधारित तंत्र का निर्माण आवश्यक है जो प्रदूषण के चरम स्तर की सटीक पूर्वसूचना दे सके, ताकि समय रहते बचाव के उपाय किए जा सकें जिनके परिणाम स्वरूप वायु प्रदूषण का स्तर कम होते दिखाई भी पड़े जिससे ऐसे आवश्यक प्रतिबंधों के स्वतः पालन के लिए समाज को सहमत किया जा सके ।
अध्याय 5: कार्ययोजना और प्रशासनिक सहयोग
राष्ट्रीय स्तर पर वायु प्रदूषण के कारकों का अध्ययन करने के लिए बहु बिषयक गंभीर व्यापक संसाधनों और विशेषज्ञों की आवश्यकता होती है, जिसमें भारी लागत (लगभग एक करोड़ रुपये प्रति वर्ष) आती है। यदि सरकार इस वित्तीय आवश्यकता को वहन करने में सहयोग करती है, तो अनुसंधानों की गुणवत्ता को और अधिक बढ़ाया जा सकता है। संस्थान स्वेच्छा से प्रशासनिक निकायों और अनुसंधान संस्थानों के साथ मिलकर एक समर्पित टास्क फोर्स का गठन करने का प्रस्ताव रखता है, जिससे सरकार साक्ष्य-आधारित निर्णय लेने में सक्षम हो सके और समाज को वास्तविक सुरक्षा प्राप्त हो।

  

 

परिणामों का विश्लेषण और अनुमानित प्रभाव  

 

 अक्टूबर, नवंबर और दिसंबर महीनों के लिए तैयार किए गए वायु गुणवत्ता सूचकांक और वातावरणीय पूर्वानुमान प्रस्तुत किए गए हैं। ये पूर्वानुमान हमारे विकसित गणितीय मॉडलों की सटीकता को दर्शाने और वायु प्रदूषण चक्रों के वैज्ञानिक सत्यापन हेतु अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।




 

 



 


                       

 
 
  ग्राफिक्स

संलग्न ग्राफिक्स और डेटा तालिकाओं में प्रस्तुत निष्कर्ष आने वाले महीनों के मौसमी और प्रदूषण के रुझानों का स्पष्ट विवरण देते हैं। यह विश्लेषण हमारे शोध की प्रभावशीलता को सिद्ध करता है और इसके अगले चरण में इन अनुमानित प्रवृत्तियों की विस्तृत समीक्षा की जाएगी।मैं विश्वास पूर्वक कह सकता हूँ कि ये पूर्वानुमान यदि शत प्रतिशत सही न भी निकले तो 70 प्रतिशत से अधिक सही निकलने की आशा करता हूँ | भविष्य में जैसे जैसे अनुसंधानों का विस्तार होता जाएगा वैसे वैसे अनुमानों पूर्वानुमानों में निखार आता जाएगा | 
 
                                                                     बिचारणीय 

       प्रतिबंधित किए गए उद्योंगों वाहनों ईंट भट्ठों निर्माणकार्यों आदि से बहुत लोगों की आजीविका जुडी होती है | उनमें से बहु संख्य लोग ऐसे भी होते हैं | जिन्हें रोज कमाना रोज खाना होता है |ऐसे  प्रतिबंधों से उन लोगों के सामने आजीविका का संकट खड़ा होता जाता है | ऐसे ही उद्योगों से प्राप्त होने वाले उत्पादों को  उपभोक्ताओं तक पहुँचाने वाले वर्ग को भी आजीविका संबंधी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है |

वस्तुतः वर्तमान वायुप्रदूषण पूर्वानुमान प्रणालियाँ केवल कार्बन उत्सर्जन पर आधारित हैं | वास्तविक प्रदूषण कारकों को स्पष्ट नहीं करतीं। इन सीमित विश्लेषणों के आधार पर लगाए गए प्रतिबंध प्रदूषण स्तर को कम करने में असमर्थ हैं | यह प्रक्रिया प्राकृतिक वातावरण व खगोलीय प्रभावों व स्थानीय वायुमंडलीय प्राकृतिक घटनाओं के प्रभाव को स्पष्ट नहीं करतीं। इसलिए धुआँ-धूल उड़ाने वाले कारकों को प्रदूषण का एकमात्र जिम्मेदार मानकर प्रतिबंध लगाना न्यायसंगत नहीं है |इसी लिए ऐसे प्रतिबंधों के लगाने के बाद भी वायुप्रदूषण कम होने के बजाय अपनी गति से बढ़ता रहता है | जो यह सिद्ध करने में सक्षम है कि वायु प्रदूषण का स्तर कम करने में वर्तमान प्रतिबंध प्रभावी नहीं हैं।

  हमारे अनुसंधान में प्राचीन ग्रंथों और वैज्ञानिक पद्धतियों के समन्वय से एक बहुविषयक वायु गुणवत्ता और मौसम पूर्वानुमान प्रणाली विकसित करने का प्रयास किया जा रहा है |हमारा शोध प्राकृतिक वातावरण, समय, स्थान, खगोलीय प्रभावों और 'ग्रह गणित पद्धति' का समावेश किया जाता है | इस 'ग्रह गणित पद्धति' का उपयोग सूर्य-चंद्र ग्रहणों का पूर्वानुमान लगाने में भी किया जाता है |इसके आधार पर लगाए गए दीर्घावधि व सटीक पूर्वानुमान इन सीमित प्रतिबंधों की निरर्थकता व हमारे शोध की आवश्यकता को सिद्ध करता है।उचित संसाधनों और सहयोग से यह प्रणाली प्राकृतिक घटनाओं के दीर्घावधि पूर्वानुमान और वायु प्रदूषण स्तर का आकलन करने में सक्षम है।ऐसे अनुसंधानों को स्वतंत्र रूप से बड़े स्तर पर किए जाने की परम आवश्यकता है |

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