भाजपा ने अपने शीर्ष नेता
से उत्तराधिकार लिया है या उन्होंने दिया है !और यदि अपनी इच्छा से दिया
है तो उनकी आँखों में आँसू क्यों ? छलकने लगे हैं
इधर
कुछ वर्षों महीनों से कई स्थलों पर देखा गया है कि अपनी प्रशंसा सुनते ही
अडवाणी जी की आँखों में अक्सर आँसू आ ही जाते हैं ! मैं ये बात उस
महापुरुष के विषय में निवेदन कर रहा हूँ जिनका हृदय इतना कमजोर नहीं है यह
भी सच है कि हमारे लौह पुरुष विरोधियों से घिरने पर भी कभी भयभीत नहीं
दिखे किन्तु अपनों से मिली ठेस न कही जा सकती है और न ही सही जा सकती है
इस ठेस से धधकते हृदय आँसुओं से शीतलता का अनुभव करते हैं इसलिए आँसू अक्सर
आ ही जाते हैं !कहें कैसे सहें कैसे वाली स्थिति है ।
यह स्थिति उनकी है
जिन्होंने अपनी पार्टी एवं पार्टी कार्यकर्ताओं को बहुमूल्य अपनापन दिया है
सम्पूर्ण समर्पण के साथ अपनी पार्टी को खड़ा किया है मैंने चर्चाओं में
सुना है कि श्रद्धेय अटल जी को प्रधान मंत्री पद के लिए न केवल उन्होंने
सहर्ष स्वीकार किया था अपितु उन्होंने ही उनके नाम को प्रस्तावित किया था
!उस समय अडवाणी जी की लोकप्रियता कम नहीं थी यदि उनमें पद लोलुपता होती तो
अटल जी को प्रधानमंत्री बनाकर वे प्रसन्न न हुए होते! अटल जी के
प्रधानमंत्री बनने के बाद कृतकार्यता का कितना उत्साह था उनके मुखमंडल पर
!इस युग में कहाँ पाए जाते हैं ऐसे राजनेता ! जो किसी और को कुछ बनाकर
प्रसन्न होते देखे जाते हों !उन्होंने अपने स्तर पर बंशवाद को भी बढ़ावा
नहीं दिया है !वो आंदोलन से उपजे नेता हैं अपने त्याग तपस्या संयम साधना से
देदीप्यमान व्यक्तित्व के स्वामी हैं सत्ता में रहकर भी उन पर भ्रष्टाचार
सम्बन्धी किसी प्रकार कोई आरोप नहीं लगा सका, लाखों विरोधियों की कलम कुंद
हो गई किन्तु खोज नहीं पाए कोई दाग जिनका व्यक्तित्व ही इतना निर्मल
है!विरोधी भी जिनकी प्रशंसा करते हों उस महापुरुष की आँखों के आँसू अकारण
और निरर्थक नहीं कहे जा सकते हैं और न ही इन आँसुओं के पीछे उनका कोई निजी
कारण लगता है यदि ऐसा होता तो उनकी यह पीड़ा सार्वजनिक मंचों पर प्रकट नहीं
होती जहाँ की पीड़ा है वहीँ प्रकट होगी स्वाभाविक है !अतएव इन आँसुओं की
भाषा पढ़ा जाना भाजपा की भलाई के लिए बहुत जरूरी है अभी समय है अभी बहुत कुछ
बिगड़ा नहीं है।निजी तौर पर मैं उनके तपस्वी जीवन एवं विराट व्यक्तित्व को
नमन करता हूँ और आशा करता हूँ आज की युवा पीढ़ी अटल जी एवं अडवाणी जी जैसे
राजनैतिक ऋषियों की पारदर्शी एवं कर्मठ जीवन शैली से पवित्र प्रेरणा ले !
सच्चाई क्या है मुझे नहीं
पता है किन्तु हम तो आम आदमी है हममें बुद्धि कितनी ! किन्तु भावना तो हम
में भी है उसे प्रकट करने का अधिकार हमें भी होना चाहिए उसी के तहत मैं
अपनी बात लिख रहा हूँ । बीते कुछ महीनों वर्षों में पार्टीजनों की
गतिविधियों से समाज में ऐसा संदेश गया है कि पार्टी अपने वृद्ध जनों को सह
नहीं पा रही है! हो सकता है कि वास्तविकता ऐसी न हो किन्तु यदि ऐसा है तो
पार्टी के द्वारा शीघ्रातिशीघ्र प्रभावी सन्देश दिया जाना चाहिए जिससे
समाज का भ्रम भंजन हो सके जो वर्तमान परिस्थितियों में भाजपा के लिए
संजीवनी सिद्ध हो सकता है! अन्यथा भाजपा के प्रति समाज में एक सोच पनप रही
है कि भाजपा को छोड़कर हर पार्टी में एक
स्थिर मुखिया है ऐसा भाजपा में क्यों नहीं हो सकता ?आखिर लोग किसको देखकर
दें भाजपा वोट ?जबकि समय समय पर हर कोई हिलने लग जाता है !
यद्यपि टी. वी. देखने का
मुझे समय नहीं मिल पाता है फिर भी एक कोई कार्यक्रम टी. वी. पर मैंने देखा
था जिसमें एक घर की परिकल्पना होती है उस घर वालों को बिग बॉस नाम के किसी
प्राणी की अज्ञात आवाजों के इशारों के अनुशार चलना होता है अथवा यूँ कह लें
कि उस कल्पित पूरे परिवार के हर छोटे बड़े सदस्य को उस सशक्त वाणी के सामने
केवल दंडवत करना होता है जो ऐसा न करना चाहे उसे घर के बाहर जाना होता है
क्या भाजपा भी अब बिग बॉस का घर बनती जा रही है !एक पार्टी के रूप में उसे
भी तो अपने पार्टी परिवार के स्थाई मुखिया के पद को भी प्रतिष्ठित बनाकर
रखना ही चाहिए !हर परिवार का कोई न कोई मुखिया तो होता ही है इसलिए भाजपा
का भी होना चाहिए !
भाजपा
कहते ही श्री अटल जी
एवं श्री अडवाणी जी का चित्र मानस पटल पर सहज ही उभर आता है माना जा सकता
है
कि आज अटल जी का स्वास्थ्य अनुकूल नहीं है किन्तु ईश्वर कृपा से श्री
अडवाणी जी भाजपा की द्वितीय पंक्ति के नेताओं की अपेक्षा कम सक्रिय नहीं
हैं उन्होंने भाजपा को आगे बढ़ाने के लिए श्रम भी कम नहीं किया है फिर
भी यदि उन्हें उनके पदों या उनके योग्य प्रतिष्ठा से हिलाया जाएगा तो
उनका दुखी होना स्वाभाविक है दूसरी बात यदि ऐसा होता है तो भाजपा
की पहचान किसके बल पर बनेगी ?वैसे भी घरों की तरह ही दलों में भी क्रमिक
उत्तराधिकार की व्यवस्था है अच्छा होता कि उसका सम्मान पूर्वक क्रमिक
अनुपालन होता रहता
किन्तु मीडिया तक पहुँचने से अच्छा नहीं रहा !खैर ,जो भी हो किन्तु भाजपा
के हाईकमान में ऐसे कितने सदस्य हैं जिनका निजी व्यक्तित्व जनाकर्षक हो
!जबकि राजनैतिक दलों का विकास ही जनाकर्षण से जुड़ा होता है ऐसी परिस्थिति
में लोका- कर्षक नेताओं का यदि वजूद बरकार नहीं रखा जाएगा तो संगठन चलेगा
किसके बल पर ?जिसमें माननीय अडवाणी जी तो निष्कलंक ,सदाचारी एवं स्पष्ट
वक्ता हैं उन्हें अपनी कही हुई बातों की सफाई नहीं देनी पड़ती है उन्हें यह
नहीं कहना पड़ता है कि हमारी बात को मीडिया ने गलत छाप दिया होगा वैसे भी वो
अप्रमाणित बात नहीं बोलते शिथिल बात नहीं बोलते हैं सम्भवतः ऐसी ही तमाम
उनकी अच्छाइयों के कारण उनका सामजिक राजनैतिक आदि गौरव सुरक्षित बना हुआ
है कुछ दलों के कुछ छिछोरे नेताओं को छोड़कर बाकी लोग आज भी उनका नाम बड़े
सम्मान पूर्वक ढंग से लेते वैसे भी यदि हम अटल जी का सम्मान करते हैं तो
हमें यह भी याद रखना चाहिए कि अटल जी भी उनसे स्नेह करते हैं इसलिए उनकी
लोकप्रिय अच्छाइयाँ स्पष्ट हैं न जाने क्यों उनका गौरव सुरक्षित रखने में
जाने अनजाने बाहर की अपेक्षा अंदर से इस उम्र में उतना गम्भीर सहयोग नहीं
मिल पा रहा है जितना मिलना चाहिए !
भाजपा के वर्त्तमान
केंद्रीय हाईकमान में शीर्ष पदों पर रह चुके लोग अपने गृह प्रदेश में इतने
विश्वसनीय और लोकप्रिय नहीं हो सके कि अपने बल पर वहाँ पार्टी को चुनाव
जीता सकें आखिर क्यों वहाँ भी मोदी जी का ही सहारा है आखिर उन्होंने उन
प्रदेशों में वरिष्ठ पदों पर रहकर किया क्या है यदि मोदी जी ने अपना प्रदेश
भी सम्भाला है और दूसरे प्रदेशों में भी अपनी लोकप्रियता बधाई है तो ऐसे
ही कद्दावर पदों पर रह चुके अन्य लोगों ने ऐसा क्यों नहीं किया या कर नहीं
पाए और यदि कर नहीं पाए तो हाई कमान किस बात के ?
आखिर क्यों और कैसे बन जातीहै काँग्रेस की सरकार बार बार! और क्यों देखती रह जाती है भाजपा ?
कल मैंने किसी बड़े नेता के भाषण में सुना कि सपा बसपा जैसी क्षेत्रीय पार्टियाँ काँग्रेस जैसी पार्टी की ही देन हैं !
जहाँ तक काँग्रेस का हाईकमान तो
विश्व विदित है । इस प्रकार से जनता हर पार्टी की हाईकमान एवं उसकी
स्वाभाविक स्थिरता और विचारधारा पर भरोसा करके उसका साथ देती है कि ये
हारे चाहें जीते किन्तु ये समय कुसमय में हमारा साथ देगा!
जैसे -
मुलायम सिंह जी सपा में कभी भी कोई भी निर्णय ले सकते हैं वे स्वतंत्र
हाईकमान हैं ,इसी प्रकार बसपा में मायावती,नीतीशकुमार जी जद यू में,लालू
प्रसाद जी जनतादल में,तृणमूल काँग्रेस में ममता बनर्जी जी ,अकाली दल में
प्रकाश सिंह जी बादल ,इसी प्रकार उद्धव ठाकरे जी,राज ठाकरे जी ,ओम प्रकाश
चोटाला जी ,शरद पवार जी,करुणा निधि जी , जय ललिता जी, नवीन पटनायक जी
,चन्द्र बाबू नायडू जी आदि और भी छोटे बड़े सभी दलों के हाईकमान अपनी अपनी
पार्टी में सदैव सम्माननीय एवं प्रभावी बने रहते हैं चुनावों में उनकी हार
जीत कुछ भी हो तो होती रहे किन्तु इनके सम्मान एवं अधिकारों में कटौती
नहीं होती है ये स्वतन्त्र रूप से निर्णय लेने में सक्षम बने रहते हैं
उन्हें ही देखकर उनके स्वभाव को समझने वाली जनता यह समझकर वोट देती है कि
ये हारें या जीतें किन्तु यदि हम इनका साथ देंगे तो ये हमारे साथ भी खड़े
होंगे!इसी प्रकार से पार्टी कार्यकर्ता भी अपने हाईकमान को पहचानने लगते
हैं कि ये जैसा कहेंगे इस पार्टी में रहने के लिए हमें वैसा ही करना होगा
किन्तु जिन पार्टियों में हाईकमान गुप्त है वहाँ कार्यकर्ता भी चुप रहता
है और समर्थक तो चुप ही रहते हैं।
भाजपा में ऐसा नहीं
है यहाँ कब कौन किसका कब तक हाईकमान रहेगा फिर कब कौन किस कारण से कहाँ से
हटाकर कहाँ फिट कर दिया जाएगा ये सब काम कौन क्यों कहाँ से किसकी प्रेरणा
से कर रहा है या किसी अज्ञात शक्ति की प्रेरणा से होता रहता है आम जनता इसे
जानने की हमेंशा इच्छुक रहती है किन्तु किसी को कुछ बताने कि जरूरत ही
नहीं समझी जाती है इतनी बड़ी राष्ट्रीय पार्टी में कब क्या उथल पुथल चल रहा
होता है जनता में से किसी को कुछ पता नहीं होता है।यहाँ तक कि बड़े बड़े
कार्यकर्त्ता तक अखवार पढ़ पढ़ कर समाज को समझा रहे होते हैं कि अंदर क्या
कुछ चल रहा है ,जैसे आम परिवारों में माता पिता की लड़ाई में बच्चों की
स्थिति होती है न माता की बुराई कर सकते हैं और न ही पिता की न सच्चाई ही
किसी को बता सकते हैं केवल मौन रहना ही उचित समझते हैं ये स्थति भाजपा के
आम कार्य कर्ता की होती है जब हाईकमान हिलता है ।
मैं इस तर्क से सहमत नहीं
हूँ क्योंकि जब ये बात में सोचता हूँ तो एक सच्चाई सामने आती है कि
काँग्रेस हमेशा से गलतियाँ करती रही है पहले जब भाजपा का हाईकमान हिलता
नहीं था अर्थात हिमालय की तरह सुस्थिर था तब तक काँग्रेस का विरोध करने की
क्षमता भाजपा में थी इसीलिए भाजपा आगे बढती चली गई !
किन्तु जब सर्व सम्मानित अटल
जी एवं अडवाणी जी को संन्यास लेने की सलाहें अंदर से ही आने लगीं। इस पर
उस समाज को भयंकर ठेस लगी जिसके मन में भाजपा का नाम आते ही अटल जी एवं
अडवाणी जी सहसा कौंध जाया करते थे उसने सोचना शुरू किया कि यदि ये नहीं तो
कौन?जनता को इसका उचित उपयुक्त एवं सुस्थिर जवाब अभी तक नहीं मिल सका है
क्योंकि बार बार बनने बिगड़ने बदलने वाला निष्प्रभावी हाईकमान जनता को अभी
तक मजबूत सन्देश देने में सफल नहीं हो सका है जो पार्टी में हार्दिक रूप
से सर्वमान्य हो !
भारत वर्ष में एक ऐसी भी बड़ी पार्टी है जिसका हाईकमान सरस्वती नदी की तरह
अदृश्य रहता है आखिर क्यों ? इसकी कीमत देश की जनता को बार बार चुकानी पड़ती है।इस
पार्टी की कई वर्षों तक सरकार चलने के बाद भी भगवान् श्री राम के कार्य को
भूल जाने के कारण लगता है कि उस पार्टी को शाप लगा है कि इसका हाइकमान हमेशा चलता
फिरता रहेगा !
भाजपा के इस ऊहा पोह के
दिशाभ्रम से बल मिलता है क्षेत्रीय पार्टियों को !ये केंद्र सरकार के
विरुद्ध उठे जनाक्रोश को काँग्रेस का विरोध करके पहले कैस करती हैं और फिर
काँग्रेस को ही बेच लेती हैं इस प्रकार से फिर से बन जाती है काँग्रेस की
सरकार !भाजपा काँग्रेस को कोसती रह जाती है!
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