निर्दयी सरकारों में बैठे लोग इस प्रकार के आधार और तर्क हीन जातीय आरक्षण का खेल आखिर कब तक खेलते रहेंगे?
दुर्भाग्य की बात है कि जिस राजनीति ने सन 1989-90 में इसी तरह के जातीय आरक्षण के विरुद्ध सवर्णों को आत्म दाह करने के लिए मजबूर कर दिया हो छात्रों पर गोलियाँ चलाई हों फिर भी सरकारों ने कोई सबक न लिया !बिना कुछ काम किए चुनाव जीतने की लालसा से किए जाते हैं ऐसे सारे संकीर्ण फैसले ! कितने सवर्ण छात्र जातीय आरक्षण नाम के अत्याचार के विरुद्ध आत्म दाह जैसी कठोर यातना सहने के लिए विवश हुए थे कितने सवर्ण छात्रों को गोलियों से भून दिया गया था तब इन नेताओं का हृदय क्यों नहीं हिला था क्यों नहीं दिया ध्यान ?
इस प्रकार से हमारे जैसे कितने स्वाभिमानी नौजवानों की जिंदगी से खेले हैं ये नेता लोग! अपना अपना पाप हर किसी को भोगना पड़ता है ये भी भोगेंगे इन्हें जनता जरूर सबक सिखाएगी इन पापों का प्रायश्चित्त जरूर करना होगा हमें तो भगवान् पर भरोसा है ।
जातिगत आरक्षण का विरोध करने के कारण हमारे सवर्ण बंधुओं को गोलियों से भून दिया जा रहा था या वे बेचारे लोमहर्षक आत्मदाह करने को मजबूर हो रहे थे उनके पवित्र बलिदान को मैं आज तक सह नहीं पाया हूँ मेरी आत्मा मुझे रात रात भर सोने नहीं देती थी ।
इसका मतलब यह कतई नहीं है कि हमारे उन भाइयों के साथ अन्याय हो जिन्हें आरक्षण का लाभ मिलने का तथाकथित दावा किया जा रहा है !किन्तु मेरी प्रार्थना मात्र इतनी है कि यदि यहाँ सक्षम लोकतंत्र है तो फिर इस वैज्ञानिक युग में ऎसे अंधविश्वास के साथ क्यों जीना कि दलित या किसी और जाति का पहले कभी शोषण किया गया होगा अरे! पहले जो हुआ होगा सो हुआ होगा हमें वर्त्तमान में जीना चाहिए और इस देश का जो भी नागरिक गरीब हो वह किसी भी जाति संप्रदाय का क्यों न हो उसका यथा सम्भव सहयोग किया जाए किन्तु आरक्षण का प्रावधान केवल विकलांगों अपाहिजों के लिए हो क्योंकि ये तो मानने वाली बात है कि जिनके हाथ पैर ठीक न हों शरीर और दिमाग स्वस्थ न हो उन्हें आरक्षण दिया जाना चाहिए बाकी स्वस्थ और सक्षम लोगों को आरक्षण किस बात का इन्हें आरक्षण क्यों दिया जाए ?
सब कुछ ठीक होने पर भी अगर कुछ लोगों के अंदर इस बात के लिए हीन भावना है कि वो अपने संघर्ष बल पर सवर्णों की बराबरी नहीं कर सकते हैं तो मैं कहना चाहता हूँ कि आखिर क्यों ? क्या कमी है ऐसे लोगों में ?वैसे भी यदि गरीब सवर्ण का बच्चा संघर्ष करके आगे बढ़ सकता है तो अन्य लोगों का क्यों नहीं? केवल यही न कि सवर्णों के अलावा अन्य जातियों को आरक्षण का सहारा होता है जबकि सवर्णों को अपने संघर्ष का ही भरोसा होता है और अपने सहारे रहने वाला कभी पराजित नहीं होता है और यदि होता है तो कुछ अनुभव लेकर लौटता है जो भविष्य की तरक्की में सहायक होता है!फिर भी यदि किसी को लगता ही है कि वो अपने संघर्ष के बल पर सवर्णों की बराबरी नहीं कर सकते इसलिए उन्हें जातीय तौर पर आरक्षण चाहिए तो ये कोई दिमागी बीमारी है जिसकी जाँच होनी चाहिए और प्रापर इलाज उपलब्ध कराया जाए! हो न हो इसी बीमारी का शिकार होने के कारण ही अतीत में भी ये तरक्की न कर पाए हों !जिसके लिए आज भी सवर्णों पर आधार हीन शोषण करने के आरोप लगाए जाते रहते हैं !इसलिए सभी जातियों के लोगों को चाहिए कि सवर्णों की तरह ही अपनी भुजाओं का भरोसा करें उसी से सब कुछ ठीक हो जाएगा !अन्यथा आरक्षण से साठ नहीं छै सौ वर्ष में भी तरक्की नहीं हो सकती है भीख से किसी का भला नहीं हो सकता है!
मेरा निवेदन मात्र इतना है कि बात हमारी भी सुनी जाए !तब फैसला लिया जाए कि जातिगत आरक्षण दिया जाना चाहिए या नहीं किन्तु सरकार ने हम लोगों की माँगों पर विचार करना कभी जरूरी नहीं समझा !
उचित होगा कि काँग्रेस अपने पुराने पापों का प्रायश्चित्त करते हुए ऐसे अवसर वादी हथकंडों से ऊपर उठकर देश हित में विचार करे, प्रजा प्रजा में भेद नहीं किया जाना चाहिए अन्यथा जैसे को
तैसा !!जय श्री राम !!!
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