भाजपा ने आखिर स्वभाव विरुद्ध ये समझौता किया ही क्यों ? "अथ श्री पासवान शरणागतिः"
कार्यकर्ता संकल्प लें कि और कुछ भी हो किन्तु अब भाजपा को अपने मुद्दों से भटकने नहीं दिया जाएगा !समाज में भाजपा के प्रति समर्पित साधकों से निवेदन है कि कई बार हो सकता है कि पार्टी के
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भाजपा ने क्या समझकर किया यह बेमेल समझौता !धन्य हो !!!
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जो सी. एम. के रूप में मोदी जी को नहीं पचा पाया वो पी.एम.के रूप में कैसे पचा पाएगा ?
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यह समझौता भाजपा ने केवल धोखा खाने के लिए किया है क्या ?
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भाजपा और लोजपा ने गठबंधन करते समय कौन कौन से मुद्दे पकडे और क्या क्या छोड़ा ?
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जिसकी सरकार में आरक्षण के नाम पर सवर्णों के साथ और राम भक्तों पर इतना अत्याचार हुआ हो तब मौन देखते रहे हों किन्तु गुजरात के नाम पर राजग छोड़कर भाग गए !आश्चर्य !!
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भाजपा और लोजपा का समझौता सैद्धांतिक तो नहीं ही कहा जा सकता है !
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भाजपा जैसी पार्टी लोजपा के साथ समझौता करके सवर्णों को आखिर क्या सन्देश देना चाहती है ?
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वी पी सिंह जी की सरकार में क्या आरक्षण इतना जरूरी था कि किसी पर गोली चला दी जाए !
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कार्यकर्ता संकल्प लें कि और कुछ भी हो किन्तु अब भाजपा को अपने मुद्दों से भटकने नहीं दिया जाएगा !
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भाजपा
ही एक मात्र ऐसी पार्टी है जो सभी जातियों सम्प्रदायों क्षेत्रों वर्गों
को समान रूप से न्याय दिलाने की प्रतिज्ञा से बँधी हुई है
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भाजपा को कोई प्रकोष्ठ बनाना चाहिए जहाँ पार्टी से जुड़े लोगों की भी पार्टी विरोधी गतिविधियों की सूचना दी जा सकती हो
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प्रत्याशी के किन गुणों से प्रभावित होकर पार्टी ने उसे टिकट दिया है यह प्रक्रिया भी पारदर्शी होनी चाहिए
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भाजपा
किसी खानदान दान विशेष की जागीर पार्टी नहीं है जहाँ केवल एक परिवार के
आगे हाथ जोड़कर खड़े रहना होता है और मुट्ठी भर नेता लोग ले लेते हैं बड़ा से
बड़ा निर्णय! बाक़ी असंख्य कार्यकर्ताओं को केवल हाँ जी!हाँ जी!करना होता
है बस !
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भारतीय जनता पार्टी बनी कैसे ?
दुर्गा
सप्तशती में जैसे वर्णन मिलता है कि असुरों के आतंक से हैरान परेशान होकर
जब देवता मारे मारे फिर रहे थे और असुर अपनी मनमानी करते जा रहे थे उस समय
सभी देवताओं के शरीर से तेज निकला और उसी तेज से भगवती दुर्गा का प्राकट्य
हुआ !खैर ,ये तो बात हुई माता दुर्गा की किन्तु इस बात को वर्त्तमान
परिदृश्य में देखते हैं तो लगता है कि आजादी के बाद देश में जब केवल
काँग्रेस ही सर्वे सर्वा थी लोग उसका विरोध करें तो जाएँ कहाँ ?कोई विकल्प
ही नहीं था तब देश की सतोगुणी शक्तियाँ एकत्र हुईं और सभी ने अपना अपना तन
मन धनात्मक सहयोग देकर एक संगठन को प्रकट किया जो कालांतर में बदलकर
भाजपा के नाम से जाना गया !यह कार्यकर्ताओं के तेजस का साक्षात दूसरा
स्वरूप ही है जिसे भाजपा कहते हैं ।
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हमें भूलना नहीं चाहिए कि राम भक्तों के पवित्र बलिदान से पोषित है भाजपा !
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भाजपा और लोजपा जैसे दोनों दलों के बीच समझौता आखिर कैसे हुआ है राम मंदिर के समर्थन में भाजपा है जबकि पासवान नहीं हैं!
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भाजपा और लोजपा के बीच का समझौता कैसे ?
भाजपा सभी समुदायों के विकास के लिए काम करना चाहती है जबकि लोजपा केवल दलितों के हित के विषय में सोचते दिखती है!
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भाजपा और लोजपा के बीच का समझौता कैसे ?
भाजपा मोदी पर गर्व करती है जबकि लोजपा मोदी पर शर्म करते करते राजग छोड़कर भाग गई थी !
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भाजपा का सवर्णों को सन्देश आखिर क्या है ?
सवर्ण
वर्ग आजतक भाजपा को अपने हृदय से लगाए हुए बैठा है किन्तु भाजपा के द्वारा
आज जब उस दिग्भ्रमित दलित नेता से समझौता किया गया है इस समय भाजपा ने
अपने प्रति समर्पित उस सवर्ण वर्ग को ऐसा कोई सन्देश देना जरूरी क्यों नहीं
समझा कि इस दलित नेता के साथ समझौता करते समय भाजपा के द्वारा सवर्णों के
हितों के साथ किन किन बिंदुओं पर कितने कितने प्रतिशत किस किस प्रकार का
समझौता किया जाएगा !
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पासवान जी की शरणागति का अभिप्राय क्या है
जब कहीं कोई सहारा नहीं रहा सब ने धोखा दिया "तब ताकेसि रघुनायक सरना"अर्थात तब निराश हताश होकर रामजी की पार्टी भाजपा की ओर चला !
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राम
जी की पार्टी होने के कारण भाजपा ने भी दलित नेता की आशा के अनुरूप ही बर्ताव किया
है!भाजपा ने भी "बूड़त विरह नाव जनु पाई ।" और उसका मुख मीठा कराने में बिलकुल देरी नहीं की और तर्क देने लगी कि -- जौं सभीत आवा शरनाई । रखिहउँ ताहि प्रान की नाईं॥
इसके बाद भाजपा ने - माँगा तुरत सिंधु कर नीरा । और बिहार की सात सीटों पर उसका अभिषेक कर दिया !
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पिछले दस वर्षों से सत्ता रूपी सीता की खोज में बन बन भटकती
रही भाजपा यथा -
हे खग हे मृग हे मधुकर श्रेनी । तुम देखी सत्ता मृगनयनी॥
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कोई भी राजनैतिक दल यदि अपने नेताओं की सत्ता भूख के आगे स्वभाव के विरुद्ध केवल स्वार्थ साधन के लिए फैसले लेते समय अपने समर्थकों की परवाह ही नहीं करता है तो उसे अपने समर्थकों को भी बंधुआ मजदूर तो नहीं ही समझना चाहिए
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सन
1989 में वी.पी.सिंह सरकार के सवर्ण एवं हिन्दू विरोधी अत्याचारों से आहत
होकर उस समय देश का भयभीत सवर्ण और हिन्दू भाजपा से सम्भवतः इसीलिए चिपका
था कि यह पार्टी हमारे साथ भी न्याय करेगी यही कारण है कि उसके बाद भाजपा
की सीटें भी अचानक बहुत बड़ी मात्रा में बढ़कर आई थीं !
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इस
वैज्ञानिक युग में ऎसे अंधविश्वास के साथ क्यों जीना कि दलितों का पहले
कभी शोषण किया गया होगा अरे! पहले जो हुआ होगा सो हुआ होगा हमें वर्त्तमान
में जीना चाहिए और इस देश का जो भी नागरिक गरीब हो उसका यथा सम्भव सहयोग
किया जाए
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माना कि भाजपा के लोग तो ऐसे समझौतों को इस लोभ से बर्दाश्त कर लेंगे कि उन्हें सांसद ,मंत्री ,प्रधानमंत्री आदि बनने को मिल जाएगा और
किसी को चुनाव जीतने का उत्साह होगा तो किसी को चुनाव जितवाने का, सबका
अपना अपना स्वार्थ होगा! किन्तु आम जनता का क्या स्वार्थ !आखिर वह ऐसे तथ्यहीन बेमेल समझौते क्यों बर्दाश्त करे !आखिर उसे क्या मिल जाएगा ?
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आरक्षण
का प्रावधान केवल विकलांगों अपाहिजों के लिए हो किन्तु जिनके हाथ पैर ठीक
हों शरीर और दिमाग स्वस्थ हो उन्हें आरक्षण किस बात का और क्यों दिया जाए ?
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यदि
गरीब सवर्ण का बच्चा संघर्ष करके आगे बढ़ सकता है तो दलित का क्यों नहीं?
केवल यही न कि दलितों को आरक्षण का सहारा होता है जबकि सवर्णों को अपने
संघर्ष का ही सहारा होता है
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यदि
किसी को लगता ही है कि वो अपने संघर्ष के बल पर सवर्णों की बराबरी नहीं कर
सकते इसलिए उन्हें जातीय तौर पर आरक्षण चाहिए तो ये कोई दिमागी बीमारी है
जिसकी जाँच हो और प्रापर इलाज उपलब्ध कराया जाए!
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