अथ श्री पासवान शरणागतिः
कार्यकर्ता संकल्प लें कि और कुछ भी हो किन्तु अब भाजपा को अपने मुद्दों से भटकने नहीं दिया जाएगा !
समाज में भाजपा के प्रति समर्पित साधकों से निवेदन है कि कई बार हो सकता है कि पार्टी के प्रति आपकी कर्तव्य निष्ठा एवं जनता के साथ ईमानदार व्यवहार से आपकी पार्टी के ही ज्येष्ठ लोग आपसे ईर्ष्या घृणा आदि बहुत कुछ करने लगें इतना ही नहीं वो आपके विरुद्ध पार्टी में ही षडयंत्र करने लगें आपको आपके योग्य पद प्रतिष्ठा आदि न मिलने दें आपको जलील किया जाए आपसे आपकी प्रतिष्ठा के अनुरूप काम न लिया जाए आप पर आधार हीन आरोप लगवा कर पुलिस प्रशासन से पीड़ित करवाया जाए संगठन को आपकी मदद न करने दी जाए जिस विषय में आपकी शिकायतें पार्टी में भी न सुनी जाएँ इतना सब कुछ होने पर भी आप भाजपा को उसके लक्ष्य से भटकने न देने के अपने व्रत पर कायम रहें और प्राण प्रण से सम्पूर्ण मनोयोग पूर्वक प्रयास करें और भाजपा को भटकने से रोकें यदि आप सफल हो गए तो ठीक और प्रयास करने के बाद भी आप सफल न हो सके तो भी प्रयासजन्य पुण्य का लाभ तो होगा ही।
यहाँ एक विशेष बात यह भी ध्यान देने लायक है कि आगामी लोकसभा के चुनावों में भाजपा को कितनी सफलता मिलेगी या नहीं मिलेगी मोदी जी प्रधान मंत्री बनेंगे या नहीं ये तो समय और परिस्थितियों के गर्त में है किन्तु इस बात से इंकार भी नहीं किया जा सकता है कि मोदी जी ने अत्यंत कठोर परिश्रम के द्वारा पार्टी को एक बार फिर से न केवल खड़ा कर दिया है अपितु लोगों को यह सोचने पर मजबूर भी कर दिया है कि हो न हो केंद्र में भाजपा नीत गठबंधन की ही सरकार बन जाए ! उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे प्रदेशों में निराश पड़ी भाजपा में अचानक आशा का संचार हुआ है यहाँ के निराश हताश कार्यकर्ताओं में मोदी जी ने जिस उत्साह का संचार किया है अब परिणाम जो भी निकलें किन्तु देश, समाज ,पार्टी कायकर्ताओं तथा पार्टी पर जो उनका प्रभाव दिख रहा है उसके लिए वो बधाई के पात्र हैं। साथ ही विपक्ष की दुर्बलता के कारण उन्मत्त हो रही काँग्रेस को नकेल लगाने में वो सफल हुए हैं इसके लिए भी उन्हें बधाई दी जानी चाहिए ये मोदी जी के परिश्रम का प्रभाव ही है कि U.P.A. भगदड़ मची हुई है भाजपा को कोसने वाले बिना पेंदी के लोटे जिनकी पार्टियों का आस्तित्व संकट में पड़ गया है कि चुनाव परिणामों के बाद उनकी पार्टी का वजूद बचेगा भी या नहीं इस भय से वे आज भाजपा के यहाँ शरणागत हैं!काँग्रेस ने C.B.I. का लट्ठ दिखाकर एकदल की ऐसी दुर्दशा की है कि वो अभी तक तो भाटों चारणों की तरह काँग्रेसियों की विरुदावलि गाता रहा अब वह गठबंधन के लिए गिड़गिड़ा रहा है किन्तु काँग्रेस अब उसे मुख लगाने की हिम्मत नहीं कर पा रही है उसे अपना आस्तित्व बचाना मुश्किल पड़ा हुआ है किसी और का पाप कैसे ढोवे! ऐसे भाड़े के प्रशंसाकर्मी दलों के दल, दल दल में फँसते दिख रहे हैं । ये सब मोदी जी के परिश्रम का ही कमाल है मोदी जी की इस विलक्षणता के लिए उन्हें बार बार बधाई ! मोदी जी को जो करना था वो तो खूब कर रहे हैं अब दायित्व पार्टी कार्यकर्ताओं का है कि यह जोश ठंडा न पड़ने दें चुनाव परिणाम कुछ भी हों किन्तु अपनी विश्वसनीयता में कमी न आने दें !
वैसे भी भाजपा केवल एक राजनैतिक दल ही नहीं है अपितु नैतिक विराट विचार निष्ठा पर केंद्रित सर्व जाति एवं सर्व धर्म समभाव की भावना भावित पार्टी है बाक़ी पार्टियों में से कुछ पार्टियाँ जातिवाद से प्रेरित हैं कुछ संप्रदायवाद से कुछ क्षेत्रवाद से कुछ परिवारवाद से एवं कुछ किसी एक परिवार की जागीर बन कर रह गई हैं किन्तु भाजपा ही एक मात्र ऐसी पार्टी है जो सभी जातियों सम्प्रदायों क्षेत्रों वर्गों को समान रूप से न्याय दिलाने की प्रतिज्ञा से बँधी हुई है माना कि अब यहाँ भी पदलोलुप लोगों की कमी नहीं है कुछ लोग निजी स्वार्थों को साधने की इच्छा से प्रभावित होकर कुछ ऐसे निर्णय कर बैठते हैं जिनका पार्टी की मूल विचार धारा से कोई लेना देना ही नहीं होता है जबकि कुछ लोग उसे पार्टी का भटकाव समझने लगते हैं और पार्टी के प्रति समर्पित लोग भी निराश होकर पार्टी से किनारा करने लगते हैं ऐसी परिस्थिति से निपटने एवं उस कार्यकर्ता को संतुष्ट करने के लिए भाजपा को कोई प्रकोष्ठ बनाना चाहिए जहाँ पार्टी से जुड़े लोगों की भी पार्टी विरोधी गतिविधियों की सूचना दी जा सकती हो अथवा कार्यकर्ता अपनी मनोभावना से अपनी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को अवगत करा सके बाद में पार्टी अपने स्तर से जाँच करवावे उत्तर दे !ताकि वह कार्यकर्ता सुनी सुनाई बातों की अपेक्षा और अधिक मजबूत विचारों के साथ आगे बढ़ सके ! साथ पार्टी को चाहिए कि अब ऊपर से आया हुआ आदेश मानने के लिए कार्यकर्ता को बाध्य करने की बजाए कार्यकर्ताओं की सहमति लेकर ही ऊपर से आदेश पारित किए जाएँ क्योंकि समाज से जूझना तो कार्यकर्ता को ही पड़ता है ऊपर से बलपूर्वक थोपे गए आदेशों का पालन कार्यकर्ता मन से नहीं कर पाता है और बेमन किया हुआ कार्य पूरा होना अत्यंत कठिन होता है ।
टिकट देने की प्रक्रिया भी पारदर्शी रखी जानी चाहिए पार दर्शिता का मतलब है कि प्रत्याशी के किन गुणों से प्रभावित होकर पार्टी ने उसे टिकट दिया है यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए अन्यथा कार्यकर्ताओं को आशंका बनी रहती है कि अर्थ प्रभाव से टिकटों का बटवारा हुआ है इसलिए पारदर्शिता बहुत आवश्यक होती है प्रत्याशी की तैयारी ऐसी हो कि वो चुनौती देकर कह सकता हो कि हमारे क्षेत्र में किसी घर का दरवाजा खटखटाकर देख लो यदि उससे निकलने वाला सदस्य आपके कार्यकर्ता एवं उसके व्यवहार से परिचित है तो कार्यकर्ता चुनावी प्रतियोगिता में सहभागी होने का हक़दार है यह पर्सेंटेज जितना अधिक होता है उतना अधिक उस कार्यकर्ता में प्रत्याशीपन माना जाना चाहिए अन्यथा पार्टी के संस्कारों से अपरिचित सैलिब्रेटी टाइप के उड़ते उड़ाते व्यक्ति को पकड़ कर प्रत्याशी बना देने से वह सीट जीत कर भी हारी हुई इसलिए मानी जानी चाहिए क्योंकि वहाँ पार्टी के संस्कारों से प्रभावित होकर विजय नहीं मिली है जबकि होना ऐसा ही इसलिए चाहिए था क्योंकि संस्कारों से जुड़े हुए मतदाताओं से पार्टी का एक सम्बन्ध बनता जाता है औरों से नहीं !
भाजपा किसी खानदान दान विशेष की जागीर पार्टी नहीं है जहाँ केवल एक परिवार के आगे हाथ जोड़कर खड़े रहना होता है और मुट्ठी भर नेता लोग ले लेते हैं बड़ा से बड़ा निर्णय! बाक़ी असंख्य कार्यकर्ताओं को केवल हाँ जी!हाँ जी!करना होता है बस !इसके अलावा कुछ बोले तो गई नौकरी !यद्यपि भाजपा पर ये बात लागू नहीं होती है क्योंकि दुर्गा सप्तशती में जैसे वर्णन मिलता है कि असुरों के आतंक से हैरान परेशान होकर जब देवता मारे मारे फिर रहे थे और असुर अपनी मनमानी करते जा रहे थे उस समय सभी देवताओं के शरीर से तेज निकला और उसी तेज से भगवती दुर्गा का प्राकट्य हुआ !खैर ,ये तो बात हुई माता दुर्गा की किन्तु इस बात को वर्त्तमान परिदृश्य में देखते हैं तो लगता है कि आजादी के बाद देश में जब केवल काँग्रेस ही सर्वे सर्वा थी लोग उसका विरोध करें तो जाएँ कहाँ ?कोई विकल्प ही नहीं था तब देश की सतोगुणी शक्तियाँ एकत्र हुईं और सभी ने अपना अपना तन मन धनात्मक सहयोग देकर एक संगठन को प्रकट किया जो कालांतर में बदलकर भाजपा के नाम से जाना गया !यह कार्यकर्ताओं के तेजस का साक्षात दूसरा स्वरूप ही है जिसे भाजपा कहते हैं ।
भाजपा को वर्तमान स्वरूप में लाने के लिए कार्यकर्ताओं ने असंख्य यातनाएँ झेली हैं लाठी डंडे खाए हैं जेल गए हैं धार्मिक एवं राम भक्त होने के कारण राजनैतिक अस्पृश्यता का शिकार होते रहे हैं राजनैतिक दल भाजपा को हमेंशा शक एवं शंका की निगाह से देखते रहे हैं वह दंश भी झेला है भाजपा के समर्पित साधकों ने। वैसे भी राम भक्तों के पवित्र बलिदान से पोषित है भाजपा !
इसलिए किसी भी गठबंधन में जाने के लिए पार्टी को अपने कार्यकर्ताओं को भी विश्वास में लेना चाहिए अभी किसी दलित नेता से भाजपा ने चुनावी समझौता किया है किन्तु समाज को यह बताना भी जरूरी नहीं समझा गया है कि किन बिंदुओं पर कितना समझौता क्यों किया गया है और किन पर नहीं !अभी तो यह समझ में ही नहीं आ रहा है कि परस्पर विरोधी स्वाभाव वाले भाजपा और लोजपा जैसे दोनों दलों के बीच समझौता आखिर कैसे हुआ है राम मंदिर के समर्थन में भाजपा है जबकि पासवान नहीं हैं!
इसी प्रकार से भाजपा सभी समुदायों के विकास के लिए काम करना चाहती है जबकि लोजपा केवल दलितों के हित के विषय में सोचते दिखती है!
भाजपा मोदी पर गर्व करती है जबकि लोजपा मोदी पर शर्म करते करते राजग छोड़कर भाग गई थी !इस प्रकार से कई मुद्दों पर भाजपा और लोजपा पर आपसी वैचारिक टकराहट जग जाहिर है फिर इन दोनों में आपसी गठबंधन सम्भव कैसे हो पाया यह जिज्ञासा समाज में है । वैसे भी पार्टी कार्यकर्ताओं एवं आम समाज में आशंका होनी स्वाभाविक भी है! आखिर जो
नेता जी अभी तक अकारण ही सवर्णों को दलितों का शत्रु मानते रहे हों वो कहते रहे हों कि सवर्ण लोग दलितों का शोषण करते रहे हैं न केवल इतना अपितु उस वी.पी. सिंह की सरकार में भी वे सहभागी रहे हैं जिस सरकार के क्रिया कलापों से कई जगहों पर न केवल सवर्ण लोग पुलिस की गोली से मारे गए थे अपितु दुखी होकर छात्र स्वयं ही आत्मदाह कर रहे थे।
सरकार से भयभीत होकर सवर्णों ने भाजपा की शरण ली थी और भाजपा ने उनकी भावनाओं का आदर किया था वो सवर्ण वर्ग आजतक भाजपा को अपने हृदय से लगाए हुए बैठा है किन्तु भाजपा के द्वारा आज जब उस दिग्भ्रमित दलित नेता से समझौता किया गया है इस समय भाजपा ने अपने प्रति समर्पित उस सवर्ण वर्ग को ऐसा कोई सन्देश देना जरूरी क्यों नहीं समझा कि इस दलित नेता के साथ समझौता करते समय भाजपा के द्वारा सवर्णों के हितों के साथ किन किन बिंदुओं पर कितने कितने प्रतिशत किस किस प्रकार का समझौता किया जाएगा !साथ ही वो दलित नेता सवर्णों के विरुद्ध लगाए जाने वाले आधार हीन अपने पुराने आरोपों पर अभी भी उसी तरह से कायम हैं या उसमें कुछ परिवर्तन हुआ है !
भाजपा और लोजपा के गठबंधन को आम समाज आखिर किस तरह से ले !यह गठबंधन कैसे हुआ यह ईमानदारी पूर्वक संयुक्त प्रेसवार्ता करके स्पष्ट किया जाना चाहिए था ! आखिर ऐसे समझौते अपने समर्थकों से लुक छिपकर क्यों किए जा रहे हैं क्या आम जनता की इसमें कोई भूमिका नहीं होगी आखिर दोनों पार्टियों में से कोई तो अपने मुद्दों से आगे पीछे हटा ही होगा तब तो हुआ होगा गठबंधन !किन्तु कौन कितना हटा है या किसने कितने छोड़े हैं अपने मुद्दे! यह भी तो पता लगना चाहिए आम जनता को !
इसी प्रकार से एक दल ने श्री राम मंदिर के समर्थन के लिए पूरे देश से कार सेवकों का आह्वान करके अयोध्या में जमावड़ा लगाया था तो दूसरे ने इस कृत्य को न केवल असंवैधानिक माना गया था अपितु केंद्र में इनकी ही सरकार थी जब कारसेवकों पर गोलियाँ चलवाई गई थीं।
इन सब आशंकाओं के मद्दे नजर आज भाजपा का कर्तव्य बन जाता है कि उसे स्पष्ट करना चाहिए कि वो राम मंदिर के समर्थन में है या विरोध में दूसरा उस दलित नेता को भी स्पष्ट करना चाहिए कि इस विषय में उसने क्या सोचकर समझौता किया है भाजपा और लोजपा दोनों को ही अपने अपने समर्थकों एवं समाज को स्पष्ट रूप से बताना चाहिए कि अपने अपने मुद्दों पर दोनों पार्टियों में से कौन किसके प्रति कितना झुककर समझौता कर रहा है यह जनता को स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए ! अन्यथा आज लुक छिप कर समझौता किया गया है तो जब मन आएगा ये न केवल राजग को राम राम कह जाएँगे अपितु गठबंधन के विषय में जैसा मन आएगा वैसा बकते घूमेंगे कि हमारा तो ऐसा ऐसा तय हुआ था उस समय क्या भाजपा गंगाजली लिए घूमेंगी सफाई देते कि हमारा तो ऐसा नहीं वैसा तय हुआ था किन्तु तब कोई क्यों करेगा विश्वास ! वैसे भी इसे पटरी लम्बी खानी नहीं है क्योंकि इनका मन अभी भी वहीँ रखा हुआ है जहाँ किसी ने मुख लगाना ठीक नहीं समझा है किन्तु कल सीटें मिलेंगी तो वो भी बुला लेंगे वो कौन कम हैं और ये चल देंगे इनका कितना भरोसा ! महाभारत में स्पष्ट कहा गया है कि -
पर भावानुरक्ता हि नारी व्यालीमिवस्थितम् ॥
आखिर
पिछली बार ये महाशय जिनके कारण तब राजग छोड़कर गए थे तब वे गुजरात के
मुख्यमंत्री थे किन्तु आज तो वो प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी हैं यदि
संयोगवश केंद्र में सरकार बनती है तो आज उनके नेतृत्व में बनी सरकार के
आधीन रहकर ही काम इस दलित नेता को भी करना होगा !अब ये नेता जी अपना मुख उस समुदाय को कैसे दिखाएँगे जिसके
दुलारे बनने के लिए उस समय 'राजग' को दुदकार कर चले गए थे किन्तु आज ये उनके अंडर में रहकर काम करने को तैयार हैं आखिर क्यों ?यदि ये कहा जाए कि आज मोदी जी को क्लीन चिट मिल गई है इसलिए जुड़ गए हैं इसमें हम दो बातें कहना चाहेंगे पहली तो ये कि मोदी जी जब उस नरसंहार में सम्मिलित ही नहीं थे तो इतना उतावलापन दिखने की जरूरत क्या थी सरकार में रहकर भी अपनी बात कही जा सकती थी मोदी जी पर इतनी बड़ी शंका हो गई कि सरकार में सम्मिलित सभी लोग अविश्वसनीय हो गए थे अरे !अटल जी ,अडवाणी जी ,जोशी जी जैसे और भी बड़े नेता जिस केंद्र सरकार में सम्मिलित थे उनका विश्वास तो किया ही जा सकता था ये लोग या और भी कई नेता राजनीति के ऐसे विश्वसनीय स्तम्भ हैं जो किसी भी प्रकार के कलंक के साथ जीना पसंद ही नहीं करेंगे उनकी ये निजी शाख है ऐसे लोगों को केवल यह सोच कर छोड़ गए कि घोटाले वाजों की जमात में सम्मिलित होने की देर हो रही थी ! यदि कोई बुद्धिमान नेता होता तो यह भी सोच सकता था कि हम तो केंद्र सरकार में सम्मिलित हैं आरोप प्रान्त सरकार पर हैं इसलिए ओवर एक्टिंग करने की जरूरत क्या थी ?दूसरी बात कि ऐसे व्यक्ति के साथ गठबंधन करने की आवश्यकता ही क्या है जो सरकार को मुसीबत में फँसा देखकर सरकार को न केवल छोड़कर चला गया हो अपितु विरोधियों को खुश करने के लिए सरकार का उपहास उड़ा रहा था और वहाँ दुम हिलाने पहुँचा जहाँ जाकर अच्छे भले स्वस्थ लोग अचानक धर्मनिरपेक्ष हो जाते हैं ।
इन्हीं सब हलके आचरणों के परिणाम स्वरूप बिहार की प्रबुद्ध जनता ने पिछले चुनावों में बड़ी बुरी तरह से इस दलित नेता का और इसकी
पार्टी को बिलकुल मुख ही नहीं लगाया पुराने गठबंधन के सहयोगियों ने भी घास नहीं डाली ,यहाँ तक कि उन लोगों ने भी मुख नहीं लगाया जिनके मसीहा बनने का दम्भ भर रहे
थे अन्यथा अपनी सीट तो बचा ही सकते थे उस राजद ने भी मुख नहीं लगाया जिनकी
गलबाहीं डाले घूमा करते थे !धर्म निरपेक्षता की वह महान शक्ति पीठ पार्टी
जिसके कहने मात्र से लोग धर्म निरपेक्ष या सांप्रदायिक मान लिए जाते हैं
जिसके घाँघरे में छिपकर ही तो अभी तक ये दलित नेता भी बेचारे न केवल धर्मनिरपेक्ष बने
रहे अपितु उसी शक्ति पीठ पार्टी को खुश करने के लिए भाजपा और राजग की
खिल्ली उड़ाया करते थे किन्तु अबकी जैसा कि वो खुद कह रहे थे कि धक्के तो
वहाँ खूब खाए किन्तु किसी ने फर्याद सुनी ही नहीं यहाँ तक कि शक्ति पीठ पार्टी के स्वयंभू हमदर्द प्रवक्ता से मिलने
बेचारे जेल तक गए किन्तु वहाँ से भी गठबंधन का कटोरा खाली लेकर ही लौटना पड़ा। जिस धर्मनिरपेक्ष शक्ति पीठ पार्टी पर ये दलित नेता बेचारे तन मन धन न्योछावर किया करते थे उसके
आकाओं से मिलने का आश्वासन देते देते महीनों बीत गए किन्तु बेचारे दलित नेता की दर्शन की अभिलाषा पूरी नहीं हो सकी और तो और मिलने तक का अवसर नहीं दिया गया ! ऊपर आसमान नीचे
धरा जब कहीं कोई ठिकाना नहीं मिला -"तब ताकेसि रघुनायक सरना"अर्थात तब निराश हताश होकर रामजी की पार्टी भाजपा की ओर चला !
दूसरी ओर राम जी की पार्टी होने के कारण भाजपा ने भी उसकी आशा के अनुरूप ही बर्ताव किया है! इसीलिए पिछले दस वर्षों से सत्ता रूपी सीता की खोज में बन बन भटकती रही भाजपा यथा -
हे खग हे मृग हे मधुकर श्रेनी ।
तुम देखी सत्ता मृगनयनी॥
इसलिए भाजपा ने भी "बूड़त विरह नाव जनु पाई ।" और उसका मुख मीठा कराने में बिलकुल देरी नहीं की और तर्क देने लगी कि --
जौं सभीत आवा शरनाई ।
रखिहउँ ताहि प्रान की नाईं॥
इसके बाद भाजपा ने -
माँगा तुरत सिंधु कर नीरा ।
और बिहार की सात सीटों पर उसका अभिषेक कर दिया किन्तु सारा दारोमदार उस प्रदेश की सात सीटों की जनता पर है कि वो तारेगी या बोरेगी !जहाँ तक बात भाजपा
की है उसे तकलीफ दोनों ही परिस्थितियों में रहेगी यदि दलित नेता को ये सीटें
नहीं मिल पाती हैं तब तो इन्हें राजग पर बोझ बनकर रहना ही है और यदि मिल
जाती हैं तो फिर ये लहर तो मारेंगे ही इनका प्रयास तो हमेंशा यही रहेगा कि
वो शक्ति पीठ पार्टी अपने यहाँ शरण देकर एक बार फिर से गले लगाकर और बना ले धर्मनिरपेक्ष
!क्योंकि इनकी मानसिकता अभी भी वहीँ समर्पित है वैसे रामायण में तो विभीषण
जी की शरणागति हुई ही सत्ता परिवर्तन के लिए थी, काश !यहाँ भी ऐसा हो !
मेरे कहने अभिप्राय मात्र इतना है कि जिन वी.पी.सिंह जी सरकार के अहं हिस्सा रह चुके हैं ये दलित नेता! इन्हीं लोगों की सरकार के समय ही अयोध्या में श्री रामभक्तों के साथ जो कुछ हुआ वो सारे विश्व ने देखा जिन मोदी जी के कारण राजग छोड़
कर चले गए थे ये दलित नेता आज उनके प्रधान मंत्री बनने पर कैसे कर पाएँगे उनके साथ काम?आखिर कैसे बदला या बिगड़ा उस दलित नेता का मन ? यह तो स्पष्ट करके जनता को भी बताया जाना ही चाहिए कि
ये गठ बन्धन हुआ आखिर कैसे ?किसने क्या क्या छोड़ा क्या क्या पकड़ा !अर्थात
क्या वे अब भी मोदी जी के प्रति वही धारणा रखते हैं जिसे लेकर उन्होंने राजग
छोड़ा था या अब उन्हें अपनी गलती का एहसास हो गया है ये बातें जनता को पता
लगनी चाहिए अन्यथा जब ये कल को लहर मारेंगे तब यही कहेंगे कि भाजपा वालों ने
आकर माफी माँगी थी तब मैं गया था राजग में !तब कैसे दी जाएगी सफाई और कौन
करेगा विश्वास ?
इसलिए ऐसी भाजपा किसी ऐसे व्यक्ति से समझौता करे जिसकी सम्पूर्ण कार्यशैली ही विवादित रह चुकी हो जो सवर्णों को देखकर अकारण खुंदक खाता रहा हो यह कैसे स्वागत योग्य कहा जा सकता है!भाजपा के अब ऐसे दिन तो नहीं रहे हैं कि निरपराध सवर्णों पर गालियाँ और गोलियाँ तान देने वालों की कृपा पर भाजपा सरकार बनावे !
भाजपा जैसी देश की किसी बड़ी राजनैतिक पार्टी को ऐसा क्यों लग रहा है कि लोग उनके चेहरों और भाषणों से प्रभावित हैं जबकि सच्चाई यह है कि समाज उनकी ईमानदारी सिद्धांतवादिता एवं स्वाभाविक विनम्रता से प्रभावित है किन्तु यदि ये भाजपा अपने सिद्धांतों से ही समझौता करने लगेगी तो आम जनता पर क्या बीतेगी !
माना कि भाजपा के लोग तो ऐसे समझौतों को इस लोभ से बर्दाश्त कर लेंगे कि उन्हें सांसद ,मंत्री ,प्रधानमंत्री आदि बनने को मिल जाएगा और किसी को चुनाव जीतने का उत्साह होगा तो किसी को चुनाव जितवाने का, सबका अपना अपना स्वार्थ होगा! किन्तु आम जनता का क्या स्वार्थ !आखिर वह ऐसे तथ्यहीन बेमेल समझौते क्यों बर्दाश्त करे !आखिर उसे क्या मिल जाएगा ?
कोई भी राजनैतिक दल यदि अपने नेताओं की सत्ता भूख के आगे स्वभाव के विरुद्ध केवल स्वार्थ साधन के लिए फैसले लेते समय अपने समर्थकों की परवाह ही नहीं करता है तो उसे अपने समर्थकों को भी बंधुआ मजदूर तो नहीं ही समझना चाहिए वो भी अपने फैसले लेने के लिए स्वतन्त्र होते हैं !अन्य कई पार्टियों की परंपरा है कि वे ऐसे समझौते करने से पूर्व या तो अपने अनुयायियों से विचार विमर्श करती हैं या फिर करने के बाद प्रेस के द्वारा जनता को सूचित कर देती हैं कि यह समझौता करने के लिए उन्हें मजबूर क्यों होना पड़ा और किस मुद्दे पर कितना समझौता किया गया है !तो जनता भी समझने लगती है कि रही होगी उनकी भी कोई मजबूरी और अपने प्रिय नेताओं की प्रसन्नता के लिए वह सह जाती है एक और पीड़ा !किन्तु जब पार्टी के मन में समर्थकों के समर्पण का कोई मूल्य ही न हो या अपने समर्थकों को सफाई देना तो दूर बताया जाना भी जरूरी न समझा जा रहा हो !तब कुर्बानी आखिर क्यों करें समर्थक ?
जो व्यक्ति वी.पी.सिंह की सरकार के समय में जातीय आरक्षण का इस कदर तक दीवाना रह चुका हो कि उन लोगों की निर्दयी सरकार ने सवर्णों को आत्म दाह के लिए मजबूर कर दिया हो कितने सवर्ण छात्र जातीय आरक्षण नाम के अत्याचार के विरुद्ध आत्म दाह जैसी कठोर यातना सहने के लिए विवश हुए थे कितने सवर्ण छात्रों को गोलियों से भून दिया गया था तब इस नेता का हृदय क्यों नहीं हिला था क्यों नहीं दिया था उस सरकार से त्यागपत्र ?पटना के शैलेन्द्र सिंह जी ऐसी ही साजिश का शिकार हुए थे जब उनका शव काशी के हरिश्चंद घाट पर लाया गया था भारी भीड़ के बीच किया गया था उनका अंतिम संस्कार !हर किसी की आँखों से चल रहे थे आँसू! उसी समय भारी भावुकता के वातावरण में मैंने उसी काशी तल वाहिनी माँ गंगा के पवित्र तट पर एक व्रत लिया था कि आज के बाद मैं सरकार से कभी नौकरी नहीं माँगूँगा ! इसके बाद काफी संघर्ष पूर्ण जीवन होने के बाद भी आज तक उस व्रत का पालन कर रहा हूँ ।
मेरी पाँच वर्ष की अवस्था में मेरे पिता जी का देव लोक गमन हुआ इसके बाद सन 1997 में माता जी का भी शरीर छूट गया । हम से दो वर्ष बड़े मेरे भाईसाहब ने मुझे पढ़ाने के लिए गम्भीर संघर्ष किया था मेरा घर अभी तक उस संघर्ष पीड़ा से उबर नहीं पाया है!हम और हमारे भाई साहब अभी भी अत्यंत सामान्य आजीविका के साथ अपने परिवार का पोषण कर रहे हैं । इस प्रकार से हमारे जैसे कितने स्वाभिमानी नौजवानों की जिंदगी से खेले हैं ये लोग अपना अपना पाप हर किसी को भोगना पड़ता है ये भी भोगेंगे इन्हें जनता जरूर सबक सिखाएगी इन पापों का प्रायश्चित्त जरूर करना होगा हमें तो भगवान् पर भरोसा है ।
मुझे गर्व है कि बाबा विश्वनाथ जी की कृपा से मेरी शिक्षा पूरी हुई सौ से अधिक किताबें लिखी हैं कई प्रकाशित भी हैं।कई पाठ्य क्रम में पढ़ाई भी जाती हैं । ये सब बातें लिखने का हमारा अभिप्राय आत्म विज्ञापन करना नहीं है अपितु यह हमारी सैद्धांतिक पीड़ा है कि जिस अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने के कारण हमारा परिवार आज भी यातनाएँ सहने पर मजबूर केवल इसी कारण तो है कि जातिगत आरक्षण का विरोध करने के कारण हमारे सवर्ण बंधुओं को गोलियों से भून दिया जा रहा था या वे बेचारे लोमहर्षक आत्मदाह करने को मजबूर हो रहे थे उनके पवित्र बलिदान को मैं आज तक सह नहीं पाया हूँ मेरी आत्मा मुझे रात रात भर सोने नहीं देती थी ।
सन 1989 में वी.पी.सिंह सरकार के सवर्ण एवं हिन्दू विरोधी अत्याचारों से आहत होकर उस समय देश का भयभीत सवर्ण और हिन्दू भाजपा से सम्भवतः इसीलिए चिपका था कि यह पार्टी हमारे साथ भी न्याय करेगी यही कारण है कि उसके बाद भाजपा की सीटें भी अचानक बहुत बड़ी मात्रा में बढ़कर आई थीं !
इसका मतलब यह कतई नहीं है कि हमारे उन भाइयों के साथ अन्याय हो जिन्हें आरक्षण का लाभ मिलने का तथाकथित दावा किया जा रहा है !किन्तु मेरी प्रार्थना मात्र इतनी है कि यदि यहाँ सक्षम लोकतंत्र है तो फिर इस वैज्ञानिक युग में ऎसे अंधविश्वास के साथ क्यों जीना कि दलितों का पहले कभी शोषण किया गया होगा अरे! पहले जो हुआ होगा सो हुआ होगा हमें वर्त्तमान में जीना चाहिए और इस देश का जो भी नागरिक गरीब हो उसका यथा सम्भव सहयोग किया जाए और आरक्षण का प्रावधान केवल विकलांगों अपाहिजों के लिए हो किन्तु जिनके हाथ पैर ठीक हों शरीर और दिमाग स्वस्थ हो उन्हें आरक्षण किस बात का और क्यों दिया जाए ?सब कुछ ठीक होने पर भी अगर कुछ लोगों के अंदर इस बात के लिए हीन भावना है कि वो अपने संघर्ष बल पर सवर्णों की बराबरी नहीं कर सकते हैं तो मैं जानना चाहता हूँ कि आखिर क्यों ? क्या कमी है देश के दलितों में ?यदि गरीब सवर्ण का बच्चा संघर्ष करके आगे बढ़ सकता है तो दलित का क्यों नहीं? केवल यही न कि दलितों को आरक्षण का सहारा होता है जबकि सवर्णों को अपने संघर्ष का ही सहारा होता है और अपने सहारे रहने वाला कभी पराजित नहीं होता है और यदि होता है तो कुछ अनुभव लेकर लौटता है जो भविष्य की तरक्की में सहायक होता है!फिर भी यदि किसी को लगता ही है कि वो अपने संघर्ष के बल पर सवर्णों की बराबरी नहीं कर सकते इसलिए उन्हें जातीय तौर पर आरक्षण चाहिए तो ये कोई दिमागी बीमारी है जिसकी जाँच हो और प्रापर इलाज उपलब्ध कराया जाए! हो न हो इसी बीमारी का शिकार होने के कारण अतीत में भी तरक्की न कर पाए हों !जिसके लिए आज भी सवर्णों पर आधार हीन शोषण करने के आरोप लगाए जाते रहते हैं !इसलिए दलितों को भी चाहिए कि सवर्णों की तरह ही अपनी भुजाओं का भरोसा करें उसी से सब कुछ ठीक हो जाएगा !अन्यथा आरक्षण से साठ नहीं छै सौ वर्ष में भी तरक्की नहीं हो सकती है भीख से किसी का भला नहीं हो सकता है!
जो कुछ करने योग्य न हैं किन्तु जो करने लायक हैं जो गरीब हैं मेरी उस समय की भी तत्कालीन सरकार से भी एक ही माँग थी कि बात हमारी भी सुनी जाए !तब फैसला लिया जाए कि जातिगत आरक्षण दिया जाना चाहिए या नहीं किन्तु उस सरकार ने हम लोगों की माँगों पर विचार करना भी जरूरी नहीं समझा ! ये वही वी. पी. सिंह थे जिन्हें वाराणसी के अस्सी क्षेत्र स्थित गोयनका महाविद्यालय में काशी के विद्वानों ने राजर्षि की उपाधि प्रदान की थी गुरुवर वागीश जी जैसे बड़े विद्वानों ने जिनकी प्रशंसा में बड़े बड़े कसीदे पढ़े थे वे वी.पी.सिंह अचानक बदल गए !यदि सवर्ण इतने ही गलत थे तो काशी के विद्वानों के बीच एक संस्कृत विद्यालय में राजर्षि बनने गए ही क्यों थे वी.पी.सिंह !किन्तु बाद में उनमें इतना बड़ा बदलाव कैसे आ गया ये ऐसे ही लोगों का असर था जिनके भवजाल में फँसकर भाजपा मुख मीठा कर एवं करा रही है वो कब कैसी लहर मारेंगे क्या पता!मैं तो यही कह सकता हूँ कि भाजपा की भगवान रक्षा करे !
उचित होगा कि अपने पुराने पापों का प्रायश्चित्त करते हुए ऐसे अवसर वादी नेताओं को भी अब किसी का तो होकर जीना ही चाहिए चाहिए अन्यथा जैसे को तैसा !!जय श्री राम !!!
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