सोमवार, 24 मार्च 2014

ये बाबालोग न जाने कब भाजपा को भी देने लगें ' मोदीगाली ' इनका क्या भरोस !

  धनवान योगी,व्यापार करने वाला  साधू तथा संतानवाले  ब्रह्मचारी का कितना विश्वास !

   जो बाबा तमाशाराम जी आजकल जेल में हैं उनका एक भाषण वीडियो  अटल जी के साथ था जब बाबा जी जेल गए  तो वो बार बार दिखाया जा रहा था। मोदी जी के साथ भी कुछ ऐसे बाबा बीडियो बनाए गए होंगे ……!

    जहाँ  माया मोह छोड़ने की कसम खाने वाले बाबा हजारों करोड़ के मालिक हों फिर भी वो ये न मानते हों कि वो काले धन से धनी हैं साधू के पास अच्छा धन तो हो ही नहीं सकता क्योंकि साधू के लिए व्यापार वर्जित है और बिना व्यापार धन आएगा कहाँ से !वैसे भी साधुओं के लिए धन संग्रह का निषेध है फिर भी जो लोग इस  शास्त्रीय संविधान को नहीं मानते उन साधुओं का सारा धन  ही काला धन होता है और ऐसे काले धन से धनी बाबा लोग धन की धमक के बल पर जहाजों पर चढ़े  घूमते एवं बड़े बड़े  आयोजन करते हैं फिर भी कोई बाबा कहे कि मेरे पास पैसे नहीं हैं तो ये उतना ही बड़ा झूठ है जितना कई संतानों का पिता अपने को ब्रह्मचारी कहता हो`!

     आम आदमी और साधू में यही अंतर होता है कि आम आदमी गृहस्थ होता है और साधू विरक्त होता है दूसरी बात आम आदमी व्यापार आदि करके नैतिक अनैतिक आदि सभी प्रकार से धन जुटाता है फिर उसकी सुरक्षा के लिए नेताओं अफसरों के पीछे दुम हिलाता घूमता है किन्तु साधू इस प्रपंच से दूर रहता है इसीलिए ऐसे सारे प्रपंचों में फँसे हुए किसी साधू व्यक्ति को शास्त्र मानते हैं कि वो पतित हो गया है और कोई पतित व्यक्ति क्या देश एवं समाज को दिशा दे पाएगा ! यदि उसे कुछ देना ही होता तो संस्कार देता जिससे बलात्कार रुकते किन्तु संस्कारों की अपेक्षा भी उससे की जानी चाहिए जिसके  पास  स्वयं में संस्कार हों किन्तु उन भयभीत बाबाओं से क्या अपेक्षा जो अपनी भोग वृत्तियों के पोल खुलने के भय से स्वयं नेताओं के साथ लिपटे घूम रहे हों !

     जैसे बिना पढ़े लिखे लोग अपनी पहचान एक ज्योतिषी के रूप में बनाने के लिए टी.वी.चैनलों में ज्योतिष ज्योतिष करके कुछ न कुछ बोलने बकने लगते हैं ,इनमें से कुछ तो ज्योतिष पढ़ाने का नाटक करने लगते हैं इस प्रकार की कलाएँ करने से लोग समझेंगे कि ये यदि ज्योतिष पढ़े न होते तो ज्योतिष पढ़ाते कैसे आदि आदि ! इसी प्रकार से दूसरों को बेईमान बेईमान कहने से लोग सोचने लगते हैं की जरूर ये ईमानदार होंगें तब तो बेइमानों  के विरुद्ध आवाज उठा रहे हैं !

     कोई योगी या संत राजनीति के लिए इतना पागल कभी नहीं हो सकता कि वो लोगों को गालियाँ देता फिरै आखिर साधू संतों की कुछ तो मर्यादा होती ही है ! कलियुग का प्रभाव आजकल तो धर्म पर भी इतना अधिक दीखने लगा है कि राजनीति करने के लिए पहले स्वयं तो पाप पूर्वक धन एकत्रित करेंगे  और जब अपना कोटा फुल हो जाए तो दूसरों के धन को काला धन - काला धन कहकर शोर मचाने लगेंगे  ताकि लोग उन्हें  ईमानदार समझते रहें ! इसी प्रकार से कृत्रिम ईमानदारवाद की सीढ़ियों पर चढ़ कर राजनीति में दखल बनाया जा सके !क्योंकि राजनैतिक दखल के बिना देखो आशाराम जी को !

       आज आशाराम जी के पास भी कुछ अपने सांसद होते तो काहे को भोगते बिचारे ये दुर्दशा !ये बात सन 2014  के चुनावों में इस प्रकार से हावी रही कि "साधू संत तो शांति पूर्वक भजन करते रहे किन्तु बाबा बिचारे बौखलाते घूमते रहे " अपना अपना पाप छिपाने के लिए कुछ लोग तो राजनीति में खुद कूदने के लिए आतुर रहे कुछ अपने चेला चेलियों को चुनाव लड़वाने के लिए एड़ी छोटी का जोड़ लगाए रहे ताकि मौके बेमौके  कोई दबी ढकी पोल खुलने ही लगी तो सरकारों पर दबाव बनाने के लिए मौके पर काम तो आएँगे ! इसी भय से तो कुछ बाबाओं ने अपने चेला चेलियों को जिताऊ समझी जाने वाली पार्टियों  से टिकट खरीद खरीद कर दिए ! 

      हुआ ये कि दिल्ली के किसी  क्षेत्र में एक दिन एक चौक पर मैं खड़ा था तो कुछ लोग एक प्रत्याशी महोदय के विषय में  आपस में चर्चा करते हुए कह रहे थे कि यार अपने ये प्रत्याशी तो पहले कभी अपनी पार्टी में देखे सुने ही नहीं गए थे अभी 6 महीने पहले भी इनका कहीं अता  पता नहीं था आज ये अचानक टिकट लेकर आ गए कैसे मिली इन्हें टिकट ! पार्टी के बीसों वर्ष पुराने कार्यकर्ता बेचारे देखकर रह गए ! तो पता लगा कि ये श्री श्री 3005 स्वामी जी महाराज के चेला हैं इसलिए ये उन्हीं का टिकट है जो यहाँ से लड़ा जा रहा है सुना जा रहा है कि  इसका पेमेंट बाबा जी ने ही किया है वे ध्यान सिखा सिखा कर पैसे कमाते हैं और अपना ऐश करते हैं जोड़ें भी तो किसके लिए कोई आगे पीछे तो है नहीं ! सुना है कि आजकल बाबा जी बहुत घबराए हुए हैं ! कुछ लोग तो अपने चेला चेलियों को कितना भी पैसा खर्च करके मंत्री वंत्री भी बनवाने की फिराक में भी लगे हैं !

      धर्म और योग में इस प्रकार का पाखण्ड इतना अधिक घुलमिल गया है कि  धर्म और योग का वास्तविक स्वरूप विलुप्त सा होता जा रहा है धर्म का चोला ओड़कर घूमने वाले डुप्लीकेट धार्मिक लोग समाज को संस्कार देने के नाम पर कुछ कर नहीं पा रहे हैं जिसका दुष्प्रभाव है कि समाज में अपराध कुसंस्कार ब्यभिचार आदि बढ़ता चला जा  रहा है।  कठोर से कठोर कानून भी निष्प्रभावी होते जा रहे हैं, फाँसी जैसी कठोर सजा होने पर भी लोग संयम लेने को तैयार नहीं हैं, अपने मन पर लोगों का नियंत्रण  समाप्त हो चुका है मन दूषित हो चुके हैं जिन्हें निर्मल करने का एक मात्र रास्ता धर्म और अध्यात्म है किन्तु धर्म और अध्यात्म के संस्कार देने वाले महापुरुष विलुप्त से होते जा रहे हैं जो हैं भी उनकी बातों का उतना असर ही नहीं हो पा रहा है जितना होना चाहिए उसका मुख्य कारण तो यह है कि वे स्वयं वैसा आचरण नहीं कर पा रहे हैं जिसकी समाज को आवश्यकता है या जो किसी योगी या संत को करने चाहिए इसीलिए बलात्कार के आरोपी बाबा  गिरी के चक्कर में ही एक बाप बेटा जेल में हैं चूँकि उनके पुण्य समाप्त हो चुके होंगे अन्यथा उन्होंने भी लम्बे समय तक दूसरे के दोष खोजने में ही अपना जीवन बर्बाद कर डाला अपने दोष छिपाते रहे किन्तु यदि पाप हैं तो कभी तो सड़ांध मारेंगे ही अब मार रहे हैं अब जनता पूछ रही है कि बाबा कहाँ गया आपका योग और सत्संग !

      आप स्वयं सोचिए कि जो योगी होगा वो योग का पालन करेगा -

योगश्चित्त वृत्ति निरोधः किन्तु अपने को योगी कहने वाला कोई बाबा राजनीति के लिए भूत बना हो, व्यापार करने में तत्पर हो, धन संग्रह में गिद्ध दृष्टि लगाए हो फिर भी दिनभर झूठ बोलता हो कि हमारे पास तो कोई पैसा ही नहीं है अरे ! ये कोई मानने वाली बात है ,क्या आम आदमी जहाजों से घूम सकता है इतनी बड़ी बड़ी भोग पीठें बना सकता है बहुत बड़े उद्योगपति के पास भोग विलास के जो संसाधन हों वो सारे जोड़कर कुंडली मारे बैठा हुआ कोई मजा मजाया झूठा प्रपंची ही अपने को योगी या संत आदि कह सकता है ऐसे लोगों का बात व्यवहार रहन सहन बड़े बड़े उद्योग पतियों जैसा है सारी  भोग सामग्रियों का संग्रह भी उसी प्रकार से किया गया है जिसे ये सारे भोग भोगने नहीं होंगे वो इनका संग्रह ही क्यों करेगा ?

      जहाँ तक बाबाओं के द्वारा राजनेताओं की करी  जाने वाली मदद की बात है उस विषय में तो यह कह पाना बहुत कठिन है कि ऐसे योग प्रसिद्ध रोगियों की डील कब कहाँ और कैसे फिसल जाए और देने लगें गलियाँ !बात बस इतनी है कि काले धन का मुद्दा किसका है,इसी प्रकार से भ्रष्टाचार एवं  टैक्स मुक्ति आदि से जुड़े मुद्दे किसके हैं ?और यदि किसी और के हैं तो क्या भाजपा उनके लिए उस और की मदद कर रही है !और यदि यह सच है तो भाजपा क्या इतने दिन में अपने चुनावी मुद्दे भी नहीं बना पाई है क्या?यदि यह सच है तो उसकी अपनी चुनावी तैयारियाँ  क्या हैं और यदि उसे दूसरों के एजेंडे पर ही चुनाव लड़ना होगा तो मुख्य विपक्षी दल होने के नाते उसकी अपनी योग्यता  क्या है?

  कल का कौतूहल-

    देश की मुख्य विपक्षी पार्टी के  समर्थक एक बाबा जी ने आजकल बीते कुछ दिनों से अपने स्वर कुछ बदल दिए हैं हमने तो टेलीवीजन चैनलों पर ही सुना है कि अब वे अपना समर्थन देने के लिए कोई शर्त भी रख रहे हैं कि यदि ऐसा तो वैसा अर्थात भाजपा यदि मेरी शर्त मानेगी तो मैं उसका समर्थन करूँगा। अभी तक पानी पी पीकर भाजपा का समर्थन करने की कसमें खाने वाले बाबा जी का अचानक बदला हुआ रुख देखकर हर कोई हैरान था कि आखिर क्या कुछ घटित हुआ जो बाबा जी को अचानक करवट बदलनी पड़ी !खैर ये बात तो लोगों की  है किन्तु बाबा जी देखने में परेशान से  लग रहे थे और वे हों भी क्यों न !संभवतः वे सोच रहे होंगे कि लोकपाल का श्रेय तो अन्ना हजारे ले गए अरविन्द केजरीवाल को  दिल्ली की सरकार मिल गई !शोर हमने भी खूब मचाया किन्तु हमारे हाथ तो कुछ भी नहीं लगा!यदि विदेश से काला धन लाने का और टैक्स मुक्ति का मुद्दा ही हमारा बन जाए अर्थात ये हो जाए कि बाबा जी के दबाव में आकर ही काला धन विदेश से लाने पर मुख्य विपक्षी पार्टी तैयार हुई है यही स्थिति टैक्स मुक्ति मुद्दे की हो जाए जिससे किसी तरह इन सफलताओं के हीरो बाबा जी माने जाएँ !भारतीय धर्मनीति, योगनीति, आयुर्वेद नीति ,साधुनीति, व्यापार नीति के बाद  राजनीति के हीरो भी बाबा जी ही मानें जाएँ !और हर क्षेत्र में मजबूत सिक्का उन्हीं का चले!

     राजनैतिक वार्ता के लिए दिल्ली की कुछ बात ही और है इस चक्कर में अबकी बार अपने वार्षिकोत्सव के साथ साथ अपना सारा आश्रम ही उठाकर बाबा जी  दिल्ली ले आए और फिर बुलाकर बैठाए  गए देश की मुख्य विपक्षी पार्टी के बड़े बड़े नेतात्रय और उनके सामने बाबा जी ने फेंका अपना एजेंडा ,किन्तु भला हो राज्य सभा में नेता प्रतिपक्ष का जिन्होंने इतनी सफाई से पानी फेरा आखिर वकील साहब जो ठहरे उन्होंने बाबा जी की और उनके आयोजन की और उनकी देश भक्ति की प्रशंसा करते हुए साफ कह दिया कि भ्रष्टाचार समाप्त करने का प्रमुख मुद्दा तो हमारी पार्टी का है ही साथ  ही कालाधन वापस लाने के लिए भी हमारी पार्टी निरंतर संघर्ष करती रही है! इसके लिए ही तो  हमारे बयोवृद्ध नेता ने चार साल पहले रथ यात्रा भी निकाली थी इसीलिए यह तो हमारी पार्टी का  प्रमुख मुद्दा पहले से रहा है आज भी है इसमें  कहने की कोई बात ही नहीं है !इसके बाद  बोलने की बारी आई पार्टी अध्यक्ष जी की उन्होंने भी बड़ी सफाई से कालाधन वापस लाने वाला मुद्दा अपनी पार्टी के पास ही रखा! फिर पार्टी के पी.एम.प्रत्याशी जी का नंबर आया उन्होंने गम्भीरता पूर्वक अपना एवं अपनी पार्टी का पक्ष रखते हुए बाबा जी को प्रणाम एवं उनकी प्रशंसा आदि खूब कर दी पर कालाधन वापस लाने से लेकर भ्रष्टाचार मुक्ति, किसान हित, टैक्स मुक्ति आदि सारे मुद्दे अपनी पार्टी के एजेंडे के रूप में ही बड़े जतन से सँभालकर अपनी पार्टी के पास ही रखे और भाषण पूरा कर दिया! इस बात से बाबा जी की आत्मा संतुष्ट नहीं हुई आखिर वे जो कहलाना चाह रहे थे वह बात तो सामने आई ही नहीं इसके बाद बाबा जी  स्वयं माइक लेकर खड़े हुए और फिर से उसी एजेंडे पर बोलने के लिए लगाया पी.एम. इन वेटिंग के मुख में माइक शायद उन्हें आशा रही होगी कि धोखे से भी कोई ऐसा शब्द निकल जाए जिससे लगने लगे कि काले धन वाले बाबा जी के मुद्दे को हम लोग एवं हमारी पार्टी गम्भीरता से लेगी ऐसा कुछ भी उनके मुख से निकलवाने पर पूरी तरह अमादा लग रहे थे बाबा जी! सोचते होंगे कि यदि ऐसा कुछ हुआ तो  ले उड़ेंगे किन्तु वे भी मजे खिलाड़ी हैं आखिर पी.एम.प्रत्याशी ऐसे ही थोड़े बनाए गए हैं उन्होंने अपनी पहले कही हुई बातें ही दोहरा  दीं इससे बाबाजी की बेचैनी घटी नहीं !अब निराश हताश बाबा जी ने माइक उठाकर पार्टी अध्यक्ष जी के मुख में लगाकर उन्हें एजेंडे पर बोलने को बाध्य किया किन्तु वे भी पार्टी अध्यक्ष जो ठहरे उन्होंने भी सारे एजेंडे फिर से अपनी पार्टी के पास ही रखते हुए अपनी पहले कही हुई बात ही दोबारा कह दी!सारा खेल बिगड़ गया अब बाबा जी ने स्वयं अपने हाथ में माइक पकड़ कर उन दोनों लोगों के सामने रखने लगे घुमा घुमाकर अपने एजेंडे और उन दोनों लोगों से हाँ कराना चाह रहे थे किन्तु जब उससे कोई रस नहीं निकला तो बाबा जी स्वयं अपने एजेंडे बोलते गए और पब्लिक को समझाते गए कि ये लोग सब कुछ ठीक ही करेंगे किन्तु उन दोनों  नेताओं के मुख से कुछ नहीं निकलने पर निराश हताश बाबा जी की बेचैनी बढ़ती ही जा रही थी कि ये तो जा रहे हैं कुछ हल भी नहीं निकला ये तो सारा भाँगड़ा ही बेकार जा रहा है! फिर जाते जाते उन्होंने अंतिम दाँव मारने की कोशिश की और समाज से कहने लगे कि आप लोगों की जो उचित,सच्चाई युक्त और न्यायसंगत योजनाएँ होंगी उसमें ये लोग आप लोगों का साथ अवश्य देंगे!इन्हीं अमृत बचनों के साथ उन्होंने अपनी हारी थकी बाणी  को बिश्राम दिया, भगवान् उनकी  आत्मा को शांति दे !दूसरी ओर वो अध्यक्ष जी और भावी प्रधान मंत्री जी किसी तरह से पीछा छुड़ाकर अपने अपने लोकों  को गए !भाजपा के कर्मठ एवं निष्ठावान कार्यकर्ताओं के लिए हमारे जैसे हैरान परेशान लोगों ने भी चैन की साँस ली !कि चलो बच गई पार्टी एवं पार्टी के असंख्य कार्यकर्ताओं की श्रम साधना!और जो उपलब्धि होगी उसका  श्रेय अब उन्हीं को मिलेगा जो उसके वास्तविक हक़दार हैं। दूसरा कोई अपने वाक्चातुर्य से पार्टी को मिलने योग्य उसका  श्रेय उससे लेकर अब अपने हक़ में नहीं कर पाएगा !

   भाजपा का समर्पित चिंतक होने के नाते मेरा निवेदन तो यही है कि अब भाजपा को किसी की शर्त के सामने घुटने नहीं टेकने चाहिए और अपने बल पर चुनाव लड़ना चाहिए। वैसे भी जिस देश में राष्ट्रीय पार्टियाँ दो ही हों कोई यदि एक से दुश्मनी कर ही ले तो अपना साम्राज्य सुरक्षित  रखने के लिए किसी दल से तो जुड़ना ही पड़ेगा अन्यथा दलों वाले लोगों के द्वारा दल दल में फँसा देने का भय तो उसे भी हमेंशा ही रहेगा !इसलिए किसी के शर्त के सामने घुटने नहीं टेकने चाहिए !

      वैसे भी कुछ हो न हो किन्तु भाजपा को एक बात तो समाज के सामने स्पष्ट कर ही देनी  चाहिए कि उसे आम समाज के सहारे चलना है या साधू समाज के ?       जो चरित्रवान विरक्त तपस्वी एवं शास्त्रीय स्वाध्यायी संत हैं उनके धर्म एवं वैदुष्य में सेवा भावना से सहायक होकर विनम्रता से साधुओं का आशीर्वाद लेना एवं उनकी समाज सुधार की शास्त्रीय बातों विचारों के समर्थन में सहयोग देना ये और बात है! सच्चे साधू संत भी अपने धर्म कर्म में सहयोगी दलों नेताओं व्यक्तियों कार्यक्रमों में साथ देते ही  हैं किन्तु उसके लिए कोई शर्त रखे और वो मानी जाए ये परंपरा ही ठीक नहीं है ! 

        विदेश से कालाधन लाने जैसी भ्रष्टाचार निरोधक लोकप्रिय योजनाओं के लिए भाजपा को स्वयं अपने कार्यक्रम न केवल बनाने अपितु घोषित भी करने चाहिए ताकि ऐसी योजनाओं का श्रेय केवल भाजपा और उसके लिए दिन रात कार्य करने वाले उसके परिश्रमी कार्यकर्ताओं को मिले।वो भाजपा की पहचान में सम्मिलित हो जिन्हें लेकर दुबारा समाज में जाने लायक  कार्यकर्ता बनें उनका मनोबल बढ़े !अन्यथा कुछ योजनाओं का श्रेय नाम देव ले जाएँगे कुछ का कामदेव और भाजपा के पास अपने लिए एवं अपने कार्यकर्ताओं के लिए बचेगा क्या ? ऐसे तो दस लोग और मिल जाएँगे वो भी अपने अपने मुद्दे भाजपा को पकड़ा कर चले जाएँगे भाजपा उन्हें ढोती फिरे श्रेय वो लोग लेते रहें ।

      इसलिए भाजपा को मुद्दे अपने बनाने चाहिए उनके आधार पर समर्थन माँगना चाहिए । अब यह समाज ढुलममुल भाजपा का साथ छोड़कर अपितु सशक्त भाजपा का साथ देना चाहता है। 

        जो ऐसी शर्तें रखते हैं ऐसे लोगों के अपने समर्थक कितने हैं और वो उनका कितना साथ देते हैं यह उनके आन्दोलनों  में देखा जा चुका है किसी ने पुलिस के विरोध में एक दिन धरना प्रदर्शन भी नहीं किया था सब भाग गए थे । 

        दूसरी बात संदिग्ध साधुओं की विरक्तता पर अब सवाल उठने लगे हैं अब  लोग किसी बाबा की अविरक्तता  सहने को तैयार नहीं हैं किसी भी व्यापारी या ब्याभिचारी बाबा से अधिक संपर्क इस समय लोग नहीं बना  रहे  हैं सम्भवतः इसीलिए कथा कीर्तन भी घटते जा रहे हैं ।

       इसलिए भाजपा समर्थकों का भाजपा से निवेदन है कि वो अपने मुद्दों पर ही समाज से समर्थन माँगे तो बेहतर होगा !



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