पार्टी के अंदर से पार्टी के निर्णयों की मीडियाई आलोचना शुभ संकेत नहीं माने जा सकते !वैसे भी केवल हर हर मोदी क्यों चुनावों के बाद जनता कहाँ ढूँढेगी मोदी जी को ?कार्यकर्ता अपने विश्वास पर क्यों नहीं माँगते हैं वोट !
बड़ी बात यह नहीं है कि भाजपा का प्रत्याशी हारे या जीते किन्तु बड़ी बात यह जरूर है कि दोनों ही परिस्थितियों में नेता कभी ही जनता की पहुँच से दूर न हो !ताकि यदि जीत जाए तब तो जनता के काम आएगा ही किन्तु यदि हार जाए तो भी जनता के हितों के अधिकार के लिए जनांदोलन के माध्यम से या इस किसी भी प्रकार से जनता का विश्वास जीतता रहे जिसका लाभ चुनावी दृष्टि से भी अगले चुनावों में प्रत्याशी और पार्टी को मिल ही जाता है जनता की सेवा कभी बेकार नहीं जाती !किन्तु जिन लोगों का पार्टी की बिचारधारा से कभी कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध ही न रहा हो कोई क्रिकेट में,कोई फिल्मों में कोई संगीत में या अन्य सामाजिक क्षेत्रों में काम करते करते सुप्रसिद्ध हो गया हो इसका यह कतई मतलब नहीं है कि वो लोक सभा का पार्टी प्रत्याशी बना दिया जाए
!इससे दो लाभ और तीन बड़े नुक्सान होंगे !लाभ पहला तो यह होगा कि पार्टी का 272प्लस सीटों के लिए एक कदम बढ़ा हुआ माना जाएगा दूसरा भीड़ जुटाऊ एक चेहरा अपने पास होगा जिसे कहीं भी दिखाकर तालियाँ बजवाई जा सकती हैं ।दूसरी बात जो तीन बड़े नुक्सान हैं वो ये कि ऐसे लोग पार्टी की विचार धारा से अपरिचित होने के कारण अपने ही अंदाज में केवल अपनी कला के बल पर वोट माँगते हैं जीतने के बाद न तो जनता के बीच जाने का समय ही इनके पास होता है और न ही जनता से मिलने की इच्छा ही होती है इसलिए जनता मिलने जाए तो भी नहीं मिलते हैं हारने के बाद तो जनता से मिलने का सवाल ही नहीं उठता है । ऐसी परिस्थिति में न तो ये पार्टी का अनुशासन मानते हैं इनके सामने पार्टी और पार्टी का नेतृत्व बौना दिखाई पड़ता है चूँकि इन्होंने अपना चेहरा दिखाके वोट माँगा होता है इसलिए ये उस क्षेत्र के पार्टी कार्यकर्ताओं को मुख ही नहीं लगाते हैं इससे बेशक वो सीट जीत ली जाए किन्तु पार्टी की छवि बिगड़ जाती है !
ऐसी जगहों पर सबसे बड़ा नुकसान पार्टी के उन कार्यकर्ताओं का होता है जो ऐसे क्षेत्रों में पार्टी के वास्तविक प्रहरी होते हैं उन पर पहले तो काम का बोझ होता है फिर उन्हीं का हक मारा जाता है 2014 चुनावों में दिल्ली में पार्टी ने कई ऐसे प्रत्याशी बनाए हैं जिन्हें जनता या तो पहचानती नहीं है या पार्टी के कार्यकर्ता के रूप में उनकी अपनी कोई पहचान नहीं है या उस क्षेत्र के विकास में उनका अपना कोई योगदान नहीं है जो आजतक भाजपा कार्यकर्ता के रूप में कभी जनता के किसी काम न आए हों उन्हें प्रत्याशी जाने का सीधा सा मतलब होता है पार्टी में घटती जननेताओं की संख्या या चाटुकारिता के चक्कर में पड़कर पार्टी लगातार कराती जा रही है अपनी दुर्दशा !योग्य नेताओं की उपेक्षा और अयोग्य लोगों की अपेक्षा से पार्टी का बड़ा नुक्सान हुआ है नया नेतृत्व जो बनता है वो समर्पित कार्यकर्ताओं का नहीं होता है !
जो लोग पहले कभी जनता का दुःख दर्द भी पूछने न आए हों ऐसे लोगों के विषय में यदि किसी भी एजेंसी के द्वारा सर्वे करा लिया जाए तो उन्हें उस क्षेत्र से पार्टी का लोकतांत्रिक प्रत्याशी नहीं कहा जा सकता है ऐसे प्रत्याशियों को लोग अर्थतांत्रिक प्रत्याशी ही मानते हैं वास्तविकता भले कुछ भी हो ! वैसे भी जिस प्रत्याशी के विषय में अध्ययन करने पर आसानी से अनुमान लगाया जा सकता हो कि पार्टी ने यहाँ अपनी विश्वसनीयता को दाँव पर लगाया है इसके पीछे पार्टी नेतृत्व का लोभ कुछ भी रहा हो !किन्तु पार्टी के समझौता के पीछे पार्टी का चुनावी हित तो नहीं ही सम्मिलित रहा है । बात और है कि कुछ प्रत्याशी यह कहते सुने जा सकते हैं कि मैं तो यहीं पैदा हुआ था अरे! इसका मतलब क्या हुआ जनता आपके पैदा होने का कर्जा चुकाए कुछ लोग कहते हैं कि मैं तो बीसवर्ष पहले यहीं रहता था इसका मतलब क्या अब टैक्स लेने आए हो !बंधुवर !जनता आपकी पैदाइस के हिसाब से वोट नहीं देती है जनता तो काम के हिसाब से वोट देती है इस क्षेत्र के लिए अभी तक आपने किया क्या है सो बताइए ! जो बताने और समझने में सफल हो गया जनता उसको आशीर्वाद दे देती है !
आजकल भाजपा की चुनावी दुकानदारी इतनी अच्छी चल रही है कि अपनी अपनी पार्टियाँ छोड़ छोड़ कर तमाम रंग बिरंगे तीतर बटेर भाजपाई चबूतरे पर इकट्ठे हो रहे हैं उनमें कुछ तो अभी कुछ समय पहले तक तक इतने कट्टर भाजपा द्रोही रह चुके हैं किन्तु सत्ता का मुख भाजपा की और देखकर अब पद लोलुपों ने भाजपा रूपी नाव की ही सवारी कर ली है लोग बैठते चले जा रहे हैं भाजपा द्रोहियों का भर न सह पाने के कारण अब नाव डगमगाने लगी है इसलिए अनाड़ी नाविक पुराने भाजपाइयों को नाव से उतरने के लिए मजबूर करते जा रहे हैं किन्तु बात बिचारधारा की है इसलिए लटके वे भी हैं जाएँ तो जाएँ कहाँ ! किन्तु संशय इस बात का है कि ये नाव आगामी चुनावी वैतरणी में कहीं दम न तोड़ दे और डूब जाए!दुर्भाग्य वश यदि ऐसा हुआ तब ये आने वाले तीतर बटेर तो उड़ कर उस शाखा पर बैठेंगे जहाँ सरकार बनती होगी नुकसान तो भाजपा का होगा !आज तो जो आ रहा है सबका लक्ष्य केवल एक ही है सब मिलजुलकर मोदी जी के हाथ मजबूत करना चाहते हैं किन्तु उनसे ये कोई नहीं पूछता कि उन्हें ये क्यों लगता है कि मोदी जी के हाथ कमजोर हैं दूसरी बात रंग बिरंगे तीतर बटेर जैसे ये आगंतुक मौसमी पक्षी चुनावों के बाद फिर न जाने कहाँ उड़ कर जाएँगे और अगले चुनावी मौसम में उड़कर न जाने किस पेड़ पर बैठें !ये चलते फिरते रहने वाले कम्प्यूटरी वायरस की तरह हैं न जाने कब किस पार्टी की विंडो करेप्ट करके निकल लें !
इसलिए चुनाव के समय अक्सर अपने बोझ से ही अस्थिर हो जाने वाली भाजपा एक ज्योतिषीय दोष से इतना अधिक पीड़ित है उसे यदि कोई बताना भी चाहे तो किसे बताए किन्तु दिल्ली से केंद्र तक के चुनावों में भाजपा को हर बार इसकी कीमत चुकानी पड़ती है मैं क्षमा याचना के साथ कहना चाहता हूँ कि इस दोष के रहते मोदी जी के नाम की कृत्रिम श्वाँस बहुत कुछ चमत्कार कर पाते एक ज्योतिषी होने के नाते कम से कम हमें तो नहीं ही दिख रही है किन्तु यह बात बताई किसे जाए और सुने कौन !
खैर जो भी हो हम तो यही कहेंगे कि हारें या जीतें किन्तु चुनावों के बाद जनता को भूल जाने की आदत छोड़नी चाहिए भाजपा को !
भाजपा के कार्यकर्ता दिल्ली और यू.पी.के भाजपाइयों की तरह आलसी न हों जो खुद तो चुनाव बीतने के बाद निष्क्रिय हो ही जाते हैं और जनता को दिखाने लगते हैं ठेंगा ! चुनावों आने पर फिर माथे पर तिलक काँधे पर रामनामी से विभूषित होकर जाने लगते हैं जनता के बीच वोट माँगने !कभी अटल जी की फ़ोटो लेकर कभी अडवाणी जी की कभी मोदी जी की!चुनावों के बाद फिर नए चेहरे की तलाश ! आखिर कब तक चलेगा यह खेल ! आखिर अपने चेहरे की पहचान पर ,अपने विश्वास पर ,अपने जन सेवा कार्यों के बल पर,अपनी ईमानदारी के बलपर क्यों नहीं माँगे जा सकते हैं वोट !हर हर मोदी घर घर मोदी ये सब क्या है ?चुनावों के बाद जब काम पड़ेगा या आएगा कोई संकट तब जनता कहाँ ढूंढेगी मोदी जी को?है कोई हेल्प लाइन नंबर भाजपा का जहाँ जनता करे काल और भाजपा के कार्य कर्ता जनता के न्यायोचित मुद्दों पर क्यों न दें जनता का साथ !यदि चुनावों के बाद जीत जाएँ तो ईमानदारी पूर्वक जनता के काम करें और न भी जीतें तो भी जो सरकार हो उस पर दबाव बनाकर
कराएँ जनता के काम !चुनावों की इस पवित्र बेला पर भाजपा क्यों नहीं घोषित
कर देती है कोई पार्टी का हेल्प लाइन नंबर !भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को भी
तो पता लगे कि आखिर इतने दिनों से यू.पी. और दिल्ली में क्यों पिट रही है
भाजपा की भद्द !आखिर तीन दिन के केजरीवाल का इतना साहस कि वो राष्ट्रीय
पार्टी भाजपा के पी.एम.प्रत्याशी को चुनौती देने का साहस कर रहे हैं और मीडिया उनकी बातों को ध्यान दे रही है समाज का विश्वास जीतने वाले कार्यकर्ता भाजपा में क्यों नहीं बनाए जा सकते !ऐसे लोगों को क्यों दे उनके नाम पर वोट !जो केवल
मोदी मन्त्र के सहारे चुनाव जीतने की इच्छा रखते हैं अपनी जिम्मेदारी और
ईमानदारी पर जनता से माँगिए वोट और कीजिए जन सेवा के काम जिससे सुधरे जनता
के मन में भाजपा के प्रति टूटा विश्वास !अन्यथा ब्यर्थ में हर हर मोदी कहने से या फेशबुक रँगने से कुछ नहीं होगा यदि साहस है तो जनता के बीच जाकर अपनी गड़बिल पर माँगिए वोट ये है पार्टी के वास्तविक कार्यकर्ताओं की पहचान !
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