लोकतंत्र
को बचाए रखने के नाम पर सवर्ण आखिर कब तक सहें अपना राजनैतिक शोषण ?दलितों
के शरीरों में ऐसी कमी क्या है कि उनके विकास के लिए आरक्षण ही एक मात्र विकल्प है ?क्या
सवर्ण इस देश के नागरिक नहीं हैं! या धन धान्य से परिपूर्ण हैं! क्या
संघर्ष पूर्वक वो अपना विकास नहीं करते हैं फिर दलित क्यों नहीं कर सकते
?और नेताओं को केवल दलितों की ही चिंता क्यों है ?आखिर बाक़ी लोग कहाँ जाएँ ?
दलित यदि वास्तव में अपमानित किए ही गए हैं ऐसा उनको लगता है तो लड़ाई सम्मान की होनी चाहिए न कि आरक्षण की !दलितों के आत्मसम्मान की रक्षा आरक्षण से कैसे हो सकती है ?क्या गरीबों का सम्मान नहीं होता है ! दलितों का शोषण कब क्यों और किसने किया ?
चूँकि आरक्षण एक प्रकार की भिक्षा या सरकारी दया है जो दलितों को सवर्णों का हक़ छीनकर दी जाती है महिलाओं को पुरुषों का हक़ छीनकर एवं अल्प संख्यकों को बहु संख्यकों का हक़ छीन कर दी जाती है!इसलिए जिसका हक़ बलपूर्वक छीना जाता है वो लेने वाले को भिखारी ही समझा करता है इसलिए उसे सम्मान कभी नहीं देता है दूसरा उससे हमेंशा घृणा ही करता है बददुआ दिया करता है।ऐसी परिस्थिति में आरक्षण लेने वाले अपमानित भी हुए और कुछ खास मिला भी नहीं जो मिला वो इतनी बद दुवाओं के साथ मिला कि उससे बरक्कत ही नहीं हुई !दूसरी ओर जिनको आरक्षण मिलना था उनका नाम आगे करने से बद दुवाएँ तो आरक्षण लेने वालों को मिलीं और हिस्सा मार ले गए नेता लोग !
दलित यदि वास्तव में अपमानित किए ही गए हैं ऐसा उनको लगता है तो लड़ाई सम्मान की होनी चाहिए न कि आरक्षण की !दलितों के आत्मसम्मान की रक्षा आरक्षण से कैसे हो सकती है ?क्या गरीबों का सम्मान नहीं होता है ! दलितों का शोषण कब क्यों और किसने किया ?
चूँकि आरक्षण एक प्रकार की भिक्षा या सरकारी दया है जो दलितों को सवर्णों का हक़ छीनकर दी जाती है महिलाओं को पुरुषों का हक़ छीनकर एवं अल्प संख्यकों को बहु संख्यकों का हक़ छीन कर दी जाती है!इसलिए जिसका हक़ बलपूर्वक छीना जाता है वो लेने वाले को भिखारी ही समझा करता है इसलिए उसे सम्मान कभी नहीं देता है दूसरा उससे हमेंशा घृणा ही करता है बददुआ दिया करता है।ऐसी परिस्थिति में आरक्षण लेने वाले अपमानित भी हुए और कुछ खास मिला भी नहीं जो मिला वो इतनी बद दुवाओं के साथ मिला कि उससे बरक्कत ही नहीं हुई !दूसरी ओर जिनको आरक्षण मिलना था उनका नाम आगे करने से बद दुवाएँ तो आरक्षण लेने वालों को मिलीं और हिस्सा मार ले गए नेता लोग !
आखिर
क्या कारण है कि सूखा हो या बाढ़ आवे भूकम्प हो या और कोई बड़े से बड़ा
उपद्रव फैले इतना सब कुछ होने पर भी नेताओं की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ता
है ! ये तो आपदा राहत में भी कमा लेते हैं । गरीब से गरीब नेताओं की
संपत्ति भी सौ गुनी और हजार गुनी या जो भी गुनी संभव हो के हिसाब से बढ़ती
चली जाती है आखिर आती कहाँ से है ! इनको कोई काम या व्यापार करने का भी
समय नहीं होता है ये आम आदमी की
अपेक्षा खाते पहनते भी अच्छा हैं ऐश आराम के पूरे साधन भी जुटा लेते हैं
इनके बच्चे भी महँगी महँगी गाड़ियों पर सवार होकर घूमते हैं हवाई जहाजों पर
घूमना विदेशों में बच्चों को पढ़ाना महँगे अस्पतालों में इलाज करवाना इनके
लिए आम बात होती है इनकी सारी शौक करोड़ों अरबों की होती है जिसे ये पूरी भी
आसानी से कर लेते हैं आखिर ये सब आता कहाँ से है और इकठ्ठा कैसे होता है
?दूसरी ओर महिलाओं,अल्पसंख्यकों और दलितों आदि को आरक्षण भिखारियों के नाम
से प्रसिद्ध कर दिया गया ! इस प्रकार से आजादी के इतने वर्ष बीत गए खुद तो
कुछ दिया ही नहीं और एक ऐसा लेबल लगा दिया है कि विदेशों में भी कहीं काम न
मिले लोग सोचते हैं ये आरक्षण प्रेमी लोग कुछ करने लायक ही होते तो अपने
देश में ही बोझ बनकर क्यों जी रहे होते ! आरक्षण प्रेमी (अर्थात कम परिश्रम
में अच्छा लाभ लेने की ईच्छा रखने वाले)लोगों को कोई काम नहीं देना चाहता
इसीलिए अब निजी क्षेत्रों में भी आरक्षण की माँग उठने लगी है आखिर अपने बश
का कुछ नहीं हैं क्यों!भाई ऐसा जीवन क्यों बना दिया गया कि कोई खुश होकर
अपने साथ रखना ही नहीं चाहता है सरकारी चाबुक के बल पर कब तक बोझिल जीवन
जिया जाएगा !अपना कोई वजूद ही नहीं है क्यों ?
ऐसे आरक्षण के द्वारा डाक्टर बने लोगों से लोग इलाज या आपरेशन नहीं
करवाना चाहते हैं।प्राइवेट नौकरियों में लोग किसी ठीक जगह इसलिए नहीं रखना
चाहते हैं ये जिम्मेदारी पूर्वक काम नहीं कर सकते जब काम पड़ेगा तो भाग खड़े
होंगे अन्यथा इन्हें आरक्षण की जरूरत ही क्यों पड़ती जो गरीब लोग बिना
आरक्षण के भी ईमानदारी पूर्वक परिश्रम करके अपना विकास कर लेते हैं उनसे
प्रेरणा लेकर आरक्षणी वर्ग को क्या बिना किसी सहारे अपने पैरों पर नहीं खड़ा
होना चाहिए ये आरक्षण की बैशाखियाँ क्यों !आरक्षण के द्वारा प्राप्त अपमान
पूर्ण आरक्षणी रईसत की अपेक्षा सम्मान स्वाभिमान पूर्ण गरीबत सौ गुना
अच्छी होती है जिसने अपने जीवन को स्वयं ही बुना हो उसकी तरक्की को कोई
नहीं रोक सकता और उस तरक्की को कोई झुका भी नहीं सकता है ।आखिर इन्हें
क्यों लगता है कि हम आरक्षण के बिना अपने बल पर आगे नहीं बढ़ सकते! ये
लँगड़े, लूले, अंधे, काने आदि अपाहिज तो हैं नहीं फिर अपने बल का भरोसा
क्यों नहीं है उसमें भी ये कहना कि हमें सम्मान नहीं मिलता आखिर सम्मान
आरक्षण में तो मिलेगा नहीं परिश्रम पूर्वक जीने वाले स्वाभिमानी जीव को
मिलता है सम्मान !जब आरक्षण एक भिक्षा है तो भिक्षुक का सम्मान कहाँ होता
है -
सेवक सुख चह मान भिखारी।
ब्यसनी धन शुभ गति ब्यभिचारी॥
जब जब इन लोगों ने हिम्मत करके ईमानदारी पूर्वक कुछ करने का मन बनाया तब
तब इनके कटोरे में कुछ न कुछ डाल दिया गया बोले तुम्हें दो दो किलो चावल
मिलेगा! तीन किलो गेहूं मिलेगा !हमने फूड सिक्योरिटी बिल पास किया है इस
प्रकार से नेताओं ने आरक्षण की इच्छा रखने वालों को पेट की परेशानियों से
बाहर निकलने ही नहीं दिया मानों नेताओं की साजिश हो कि जिस दिन इनका पेट
भरने लगेगा उस दिन ये हमारी झूठी झूठी बातों पर विश्वास करना ही बंद कर
देंगे तो कैसे होगा भ्रष्टाचार कैसे चलेगा अपना व्यापार! इसीलिए ऐसे
विश्वास घाती नेताओं ने आरक्षण प्रेमियों के लिए जब कमाने का समय था तब
इन्हें आरक्षण माँगने के लिए भिक्षा का कटोरा पकड़ा दिया ! सरकार कुछ देगी
उसी से अपने सारे दुःख दूर करने के लालच में आरक्षण प्रेमी लोग बिचारेबड़े
बड़े नेताओं की रैलियों में भीड़ बढ़ाबढ़ा कर अपने जीवन का बहुमूल्य समय
बर्बाद करते रहे !ये नेता आरक्षण प्रेमियों का हिस्सा सरकार से तो पास करते
कराते रहे किन्तु खुद हड़प करते रहे और आरक्षण समर्थकों के क्रोध की तोप
का मुख सवर्णों की ओर घुमाए रहे !और आजादी के साठ पैंसठ वर्ष बिता दिए पता
ही नहीं चला कब बीत गए केवल नेताओं का विकास हुआ बाकी देश आज भी पीने के
पानी तक के लिए मोहताज है नेता लोग अभी तक आरक्षण में भोजन दे रहे थे लगता
है कि अब पानी देंगे कुल मिला कर लगता है कि अभी भी लोग यदि जागरूक नहीं
हुए तो ये लुटेरे नेता लोग आरक्षण प्रेमियों को खाने पीने तक ही सीमित
रखेंगे !ये रातोंरात लखपति करोड़पति अरब पति और फिर अरबों पति बन जाते हैं
नेता जी !ये देश में अमन चैन हो तो कमाते हैं और आपद राहत में भी कमाते हैं
और आरक्षण प्रेमियों के साथ रहकर हमेंशा कमाते रहते हैं नेता !
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