शनिवार, 5 अप्रैल 2014

क्या अपने भगवानों में कोई कमी आ गई है?आखिर उनका सम्मान क्यों समिटता जा रहा है !

    कम से कम कथा बाचकों, गायकों ,रामायणियों साधुओं से तो ऐसी अपेक्षा न थी !

 

   आखिर क्यों उठता जा रहा है कथा वक्ताओं का भगवान् से विश्वास?क्या अपने भगवानों में कोई कमी आ गई है वैसे भी कोई पीरों जखैयों को पूज रहा है कोई किसी और को पूज रहा है तो कोई कोई तो बाबाओं को बिलकुल भगवान् ही मानने लगा है सुना है कि ऐसे मंदिरों में करोड़ों रूपए का चढ़ावा आता है जबकि भगवानों  के मंदिर सूने पड़े होते हैं  भगवानों की आरती दो बार उनकी पाँच  बार हो रही है भगवान् के मंदिर में एक बार सफाई होती है वहाँ तो दिन भर सफाई और सजावट होती ही रहती है और भी बहुत कुछ !  आखिर ऐसा क्यों हो रहा है ?
कई बार आपने भी सुना होगा कि श्री श्री 1008 अमुक  अमुकानन्द जी महाराज के श्री मुख से राम कथा  का आनंद लीजिए !

        इसी प्रकार से परम पूज्य सर ….... चालक महोदय ने कहा कि राम मंदिर बन कर रहेगा !

 इसी प्रकार से   कथा कहने के नाम पर गा बजाकर  मनोरंजन कराने वाले  कथा बाचकों की आस्था भगवान् से बिलकुल घटती जा रही है ऐसे में बच्चे या समाज कहाँ से पावें संस्कार !ऐसे आचरण देखकर कैसे करें अपने से बड़ों का सम्मान !और क्यों न बढे समाज में दुराचार !कथा बाचक लोग अपना  आसन तो ऊपर और भगवान का आसन नीचे रखते हैं इसीचित्र में देखिए एक कथा बाचक महोदय यदि चाहते तो अपने पास में ही  सिंहासन के ऊपर भी लगाया जा सकता था श्री राम प्रभु भी चित्र !किन्तु हो सकता है ये लोग ऐसा मानते हों कि इससे वक्ता  का सम्मान घट जाएगा अच्छा किया अपना सम्मान बचा लिया श्री राम का बचा कर क्या करना है ! बचाना ही होगा तो लवकुश जानें जिन्होंने श्री राम जी की जायदाद ली थी श्री राम और कृष्ण के सम्मान से कथा बाचकों या गायकों को क्या लेना देना ! 

        आखिर हिन्दू  धार्मिक लोग  इतने संस्कार भ्रष्ट क्यों होते जा रहे हैं धर्म का उपयोग केवल धंधे के लिए धिक्कार है हमें ! तमाशा राम भी अपनी रथयात्राओं में ऐसे ही अपने पैरों के पास लगाया करते थे भगवानों के चित्र आज भोग रहे हैं अपने कर्मों का फल ! 

      अपने भगवानों का इतना अपमान तो कभी विधर्मियों ने भी नहीं किया होगा ये सब देख कर क्यों नहीं हिलता है राम भक्तों का हृदय ?क्या ये राम भक्ति नहीं है कि ऐसे लोगों से मुक्त कराया जाए श्री राम का गौरव पूर्ण सम्मान !


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