बुधवार, 9 अप्रैल 2014

मोदी सरकार क्यों भाजपा सरकार क्यों नहीं ?क्या मोदी जी भाजपा से अलग हैं !या मोदी भाजपा कोई और है ?

   पार्टी के अंदर से पार्टी के निर्णयों की मीडियाई आलोचना शुभ संकेत नहीं माने जा सकते !वैसे भी केवल हर हर मोदी क्यों चुनावों के बाद जनता कहाँ ढूँढेगी मोदी जी को ?कार्यकर्ता अपने विश्वास पर क्यों नहीं माँगते हैं वोट !

     इसमें कोई शक नहीं है कि पिछले एक डेढ़ वर्ष से मोदी जी ने सारे भारत वर्ष में अपनी पार्टी भाजपा को चुनावी विजय दिलाने के लिए घनघोर परिश्रम किया है जिसका असर भी पूरे देश में दिखाई पड़  रहा कार्यकर्ताओं में अद्भुत उत्साह है इसमें कोई संदेह नहीं है किन्तु सारे देश में एक चर्चा यह भी जोरों पर है कि बरिष्ठ  अभिभावकों को से भरी पुरी भाजपा में रैलियाँ केवल मोदी जी की क्यों होती रहीं जितने खर्चे में रैलियों का आयोजन होना था जब  खर्चा उतना ही लगना था तो उन्हीं रैलियों में उपस्थित होकर पार्टी के और भी बरिष्ठ नेता गण शोभा बढ़ा सकते थे किन्तु केवल मोदी मय वातावरण बनाने की कोशिश हुई आखिर क्यों ?इससे  पार्टी के अंदर की पारस्परिक घुटन मीडिया के माध्यम से भी समाज में पहुँची जो पार्टी के स्वास्थ्य के लिए चिन्तनीय बना रहा कब कहाँ कौन क्या बोल रहा है इस पर पार्टी उस तरह का नियंत्रण नहीं कर पाई जैसा होना चाहिए था सम्भव है कि मोदी सरकार की जगह यदि भाजपा सरकार की बात होती तो शायद सभी लोग अपनी सरकार बनाने की भावना से काम करते ! उसमें उनका भी अपनापन होता !

     दूसरी बात मोदी जी एक प्रदेश के मुख्य मंत्री हैं  यदि उन्हें ही प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी बनाया जाना था तो उन्हें ऐसा करने से पहले गुजरात से मुक्त होकर केंद्रीय भाजपा में शामिल किया जाना चाहिए था इसके बाद प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी घोषित किए जाने से केंद्रीय हाईकमान का गौरव भी बचाया जा सकता था ऐसे एक सन्देश समाज में गया कि केंद्रीय नेतृत्व से प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी क्यों नहीं चुना जा सकता था क्या वहाँ योग्य लोग नहीं थे आखिर वो हाईकमान किस बात का ! इन्हीं भावनाओं से केंद्रीय नेतृत्व न केवल अपने को उपेक्षित मानने लगा अपितु वहाँ से चर्चाएँ भी छन छन कर बाहर आने लगीं और असंतोष भड़कने लगा !   

    आज मोदी जी काँग्रेस के पिछले दस वर्षों के कुशासन के लिए काँग्रेस को कोसते रहते हैं इसी भावना से राहुल और सोनियाँ की भी आलोचनाएँ किया करते  हैं महँगाई भ्रष्टाचार बिगड़ती कानून व्यवस्था आदि आदि प्रमुख कारण बताते हैं !मोदी जी की काँग्रेस से शिकायतें होनी तो स्वाभाविक हैं किन्तु जनता की शिकायतें तो मोदी जी से भी हैं कि तब आप कहाँ थे और क्यों आज आपको दे दिए जाएँ वोट ! अरे मोदी सरकार जी तब कहाँ थे आप !और हमें चारों तरफ से मुसीबतों में घिरा देखकर भी आप अपने उस देश को घूम फिर कर देखने भी नहीं आए कि एक बार सुध ही ले लेते ! क्या मोदी जी उन परेशानियों के समय कभी देश की जनता की आवाज आप तक नहीं पहुँची !और यदि पहुँची तो क्या किसी प्रदेश के मुख्यमंत्री को किसी अन्य प्रदेश या पूरे देश में  जाने के लिए कोई मनाही होती है क्या ?आखिर तब मोदी जी क्यों नहीं आए देश की जनता का दुःख दर्द बाँटने !जहाँ तक आज की बात है तो आज भी एक अघोषित डील  के तहत जनता के दुःख दर्द की बात कर रहे हैं आप ! यदि आपको केंद्र सरकार की चाभी दी जाएगी तब तो आप देश  की जनता के साथ हैं अन्यथा आप गुजरात लौट जाएँगे जहाँ के आप अभी भी यशस्वी मुख्यमंत्री हैं फिर देश की जनता से आपको क्या लेना देना !क्या गुजरात पहुँचकर फिर भूल जाएँगे हमारा दुःख दर्द ! आखिर देश की आम जनता की पीड़ा का यदि आपको इतना ही ध्यान है तो गुजरात लौट जाने की भावना ही क्यों ?आप  डटकर दीजिए देश की जनता का साथ और देश की सत्ता मिले न मिले आप रहिए हमारे साथ !अन्यथा  लोकसभा  चुनावों तक मोदी सरकार नामका हाहाकार मचा हुआ है चुनावों के बाद यदि एक प्रतिशत भी ऐसा होता है कि मोदी जी की सरकार नहीं बनती है तो सरकार तो रहेगी ही नहीं मोदी जी गुजरात लौट जाएँगे इस प्रकार से मोदी और मोदी सरकार की आँधी हटते ही काम तो वही पुरानी वाली भाजपा ही आएगी और वही नेता जिनकी आज उपेक्षा हो रही है!ऐसी परिस्थिति में मोदी सरकार क्यों भाजपा सरकार क्यों  नहीं  जिसके नेताओं से कल भी काम लिया जाना है मोदी जी तो चुनावों के समय ही आए हैं और फिर चुनावों के समय ही आएँगे और सरकार बनेगी तो यहाँ रुकेंगे अन्यथा गुजरात लौट जाएँगे !

    इसी प्रकार से मोदी जी विकास के अधिकाँश उदाहरण गुजरात के विकास से देते रहे जबकि पी.एम.प्रत्याशी होने के नाते उनके लिए भाजपा शासित सभी प्रदेश लगभग समान रूप से प्रशंसनीय थे किन्तु मोदी जी के भाषणों में गुजरात जैसा प्रतिनिधित्व औरों को नहीं मिल सका !एक बड़ी बात और है कि यदि मोदी जी की अगुवाई में भाजपा लोक सभा चुनाव लड़ने जा रही है तो मोदी जी को भाजपा के अभी तक के प्रधानमंत्री या प्रधानमंत्री प्रत्याशियों की परंपरा को ही आगे बढ़ाना चाहिए था अर्थात अटल जी की सरकार के द्वारा किए गए कार्यों या चलायी गई योजनाओं को विस्तारित करके प्रमुख रूप से भाषणों में स्थान दिया जाना  चाहिए था किन्तु ऐसा बहुत कम ही दिखाई पड़ा क्योंकि वर्त्तमान भाजपा केवल मोदी मय दिखना चाहती थी यहाँ तक कि अटल अडवाणी जी के चित्रों तक को प्रचार सामग्री में उतना महत्त्व नहीं दिया गया वस्तुतः सच्चाई ये है कि मोदी सरकार बनाने की विशाल तैयारियों में भाजपा कहीं सम्मिलित ही नहीं दिखाई देती थी केवल मोदी जी दिन रात जुटाए  गए क्या अडवाणी जी, जोशी जी, सुषमा जी, जेटली जी, उमा जी को  क्या बोलना नहीं आता है या ये लोग भाजपा में सम्मिलित नहीं हैं या ये लोग पहले बोलने जाते नहीं रहे ! 

     इन चुनावों में उस समाज को काफी ठेस लगती  रही है जिसके मन में भाजपा का नाम आते ही अटल जी  एवं अडवाणी जी जोशी जी जैसे पुराने नेताओं की छवि सहसा कौंध जाया करती है अबकी बार उन जैसे नेताओं की अपनी टिकटों को विवादित बनाकर न केवल उनका अपितु भाजपा का गौरव गिरते देखा गया है !

    उमा जी का यह कहना कि मोदी जी अच्छे वक्ता नहीं हैं इसमें उन्होंने तुलना अटल जी से भले ही कर दी हो किन्तु इसका एक अर्थ तो ये भी निकलता था कि इससे अच्छा तो मैं बोल सकती थी आखिर मेरी तो पहचान ही भाषणों से हुई है इसमें क्या संदेह है कि उमा जी के भाषणों की सीडियाँ  खूब खरीदी बेची जाती रही हैं किन्तु आज उमा जी की वक्तृत्वकला का पार्टी ने वैसा कुछ खास उपयोग नहीं किया जैसा किया जा सकता था! 

       कुल मिलाकर मोदी सरकार बनाने की तैयारियों को देखकर ऐसा लग रहा  था जैसे मोदी जी की सरकार बनाने के लिए समायोजित महामहोत्सव की  सारी  व्यवस्था श्री राजनाथ जी देख रहे हैं बाकी भाजपा केवल भोज में सम्मिलित है बस!इन चुनावों में भाजपा का और कोई लेना देना ही नहीं है !

     मोदी सरकार के नशे में भाजपा में आपसी घालमेल इस तरह का हुआ है कि किसी को नहीं पता है कि इस समय पार्टी चला कौन रहा है कौन किसको कब पार्टी से निकाल दे कौन किसको भर्ती कर ले अथवा भाजपा वाले भर्ती कर लें तो मोदी सरकार वाले आकर निकाल दें कोई किसी को सुबह भर्ती कर ले तो शाम को निकाल दिया जाए!भाजपा के किसी पुराने कार्यकर्त्ता की मोदी सरकार वालों ने टिकट काट दी तो भाजपा वालों ने कहा कि मीटिंग में तो इसका निर्णय हुआ ही नहीं था फिर भी ऐसा किया गया मुझे इसका दुःख है !

     इस प्रकार से सारी पुरानी पहचानें  मिटा दी गई हैं हर नेता सशंकित है कि मोदी सरकार पार्टी के निर्णय के नाम पर हमारे साथ कब क्या कर दे पता नहीं ! सच्चाई तो यह लगने लगी है कि भाजपा भी वो भाजपा नहीं रही जिसमें रहकर अटल जी प्रधान मंत्री बने थे या जिसके प्रधान मंत्री पद के प्रत्याशी श्री अडवाणी जी रह चुके हैं किन्तु इन चुनावों में उस भाजपा से काम नहीं चला उस भाजपा के मुखिया और बरिष्ठ लोगों के रूठने की चर्चाएँ कई बार आईं जब पार्टी के अंदर नहीं सुनी गईं  तो कई बार इनमें से ही भाजपा के कई लोग अपनी अपनी ब्यथा और बिचारों को लेकर मीडिया में भी आए किन्तु  इस मोदी भाजपा में वही होता है जो मोदी जी को अच्छा लगता है यहाँ हर कुछ अपनी अपनी सुविधा के अनुशार होता है !नियमतः उस भाजपा के मुखिया श्री अडवाणी जी हैं जबकि मोदी भाजपा के मुखिया मोदी जी हैं यहाँ तो सारे निर्णय ही मोदी भाजपा में होते दिख रहे हैं वैसे भी स्वयं अडवाणी जी की अपनी टिकट भी जहाँ संशय में रह चुकी हो जोशी जी की टिकट को लेकर भी कई चर्चाएँ चल चुकी हों ऐसी परिस्थिति में अडवाणी जी के नेतृत्व को कैसे माना जाए !कुल मिलाकर दो भाजपाओं के चक्कर में भाजपा का मुखिया ही नहीं स्पष्ट हो रहा  है कि भाजपा का वास्तविक नेता है कौन ?

    जहाँ तक काँग्रेस का हाईकमान है तो विश्व विदित है । इसी प्रकार से जनता हर पार्टी की हाईकमान एवं उसकी स्वाभाविक स्थिरता और विचारधारा पर भरोसा करके  उसका साथ देती है कि ये हारे चाहें जीते किन्तु ये समय कुसमय में हमारा साथ देगा!

    जैसे - मुलायम सिंह जी सपा में कभी भी कोई भी निर्णय ले सकते हैं वे स्वतंत्र हाईकमान हैं ,इसी प्रकार बसपा में मायावती,नीतीशकुमार जी जद यू में,लालू प्रसाद जी जनतादल में,तृणमूल काँग्रेस में ममता बनर्जी जी ,अकाली दल में प्रकाश सिंह जी बादल ,इसी प्रकार उद्धव ठाकरे जी,राज ठाकरे जी ,ओम प्रकाश चोटाला जी ,शरद पवार जी,करुणा निधि जी , जय ललिता  जी, नवीन पटनायक जी ,चन्द्र बाबू नायडू जी आदि और भी छोटे बड़े सभी दलों के हाईकमान अपनी अपनी पार्टी में सदैव सम्माननीय  एवं प्रभावी बने रहते हैं चुनावों में उनकी हार जीत कुछ भी हो तो होती रहे किन्तु इनके सम्मान एवं अधिकारों में कटौती नहीं होती है ये स्वतन्त्र रूप से निर्णय लेने में सक्षम बने रहते हैं उन्हें ही देखकर उनके स्वभाव को समझने वाली जनता यह समझकर वोट देती है कि ये हारें या जीतें किन्तु यदि हम इनका साथ देंगे तो ये हमारे साथ भी खड़े होंगे!इसी प्रकार से पार्टी कार्यकर्ता भी अपने हाईकमान को पहचानने लगते हैं कि ये जैसा कहेंगे इस पार्टी में रहने के लिए  हमें वैसा ही करना होगा किन्तु जिन पार्टियों में हाईकमान गुप्त है वहाँ कार्यकर्ता भी चुप रहता है और समर्थक तो चुप रहते ही  हैं।

          बड़ी बात यह नहीं है कि भाजपा का प्रत्याशी हारे या जीते किन्तु बड़ी बात यह जरूर है कि दोनों ही परिस्थितियों में नेता कभी भी जनता की पहुँच से दूर न हो !ताकि यदि जीत जाए तब तो जनता के काम आएगा ही किन्तु यदि हार जाए तो भी जनता  के हितों के अधिकार के लिए जनांदोलन के माध्यम से या इस किसी भी प्रकार से जनता का विश्वास जीतता रहे जिसका लाभ चुनावी दृष्टि से भी अगले चुनावों में प्रत्याशी और पार्टी को मिल ही जाता है जनता की सेवा कभी बेकार नहीं जाती !किन्तु जिन लोगों का पार्टी की बिचारधारा से कभी कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध ही न रहा हो कोई क्रिकेट में,कोई फिल्मों में कोई संगीत में या अन्य सामाजिक क्षेत्रों में काम करते करते सुप्रसिद्ध हो गया हो इसका यह कतई मतलब नहीं है कि वो लोक सभा का पार्टी प्रत्याशी बना दिया जाए !इससे दो लाभ और  तीन बड़े नुक्सान होंगे !लाभ पहला तो यह होगा कि पार्टी का 272प्लस सीटों के लिए एक कदम बढ़ा हुआ माना जाएगा दूसरा भीड़ जुटाऊ एक चेहरा अपने पास होगा जिसे कहीं भी दिखाकर तालियाँ बजवाई जा सकती हैं ।दूसरी बात जो तीन बड़े  नुक्सान हैं वो ये कि ऐसे लोग पार्टी की विचार धारा से अपरिचित होने के कारण अपने ही अंदाज में केवल अपनी कला  के बल पर वोट माँगते हैं जीतने के बाद न तो जनता के बीच जाने का समय ही इनके पास होता है और न ही जनता से मिलने की इच्छा ही होती है इसलिए जनता मिलने जाए तो भी नहीं मिलते हैं हारने के बाद तो जनता से मिलने का सवाल ही नहीं उठता है । ऐसी परिस्थिति में न तो ये पार्टी का अनुशासन मानते हैं इनके सामने पार्टी और पार्टी का नेतृत्व बौना दिखाई पड़ता  है चूँकि इन्होंने अपना चेहरा दिखा के वोट माँगा होता है इसलिए ये उस क्षेत्र के पार्टी कार्यकर्ताओं  को मुख ही नहीं लगाते हैं इससे बेशक वो सीट जीत ली जाए किन्तु पार्टी की छवि बिगड़ जाती है !

     ऐसी जगहों पर सबसे बड़ा नुकसान पार्टी के उन कार्यकर्ताओं का होता है जो ऐसे क्षेत्रों में पार्टी के वास्तविक प्रहरी होते हैं उन पर पहले तो काम का बोझ होता है फिर उन्हीं का हक मारा जाता है 2014 चुनावों में दिल्ली में पार्टी ने कई ऐसे प्रत्याशी बनाए हैं जिन्हें जनता या तो पहचानती नहीं है या पार्टी के कार्यकर्ता के रूप में उनकी अपनी कोई पहचान नहीं है या उस क्षेत्र के विकास में उनका अपना कोई योगदान नहीं है जो आजतक भाजपा कार्यकर्ता के रूप में कभी जनता के किसी काम न आए हों उन्हें प्रत्याशी बनाए  जाने का सीधा सा मतलब होता है  पार्टी में घटती जननेताओं की संख्या या चाटुकारिता के चक्कर में पड़कर पार्टी लगातार कराती जा रही है अपनी दुर्दशा !योग्य नेताओं की उपेक्षा और अयोग्य लोगों की अपेक्षा से पार्टी का बड़ा नुक्सान हुआ है नया नेतृत्व जो बनता है वो समर्पित कार्यकर्ताओं का नहीं होता है !

     जो लोग पहले कभी जनता का दुःख दर्द भी पूछने न आए हों  ऐसे लोगों के विषय में यदि किसी भी एजेंसी के द्वारा सर्वे करा लिया जाए तो उन्हें उस क्षेत्र से पार्टी का लोकतांत्रिक प्रत्याशी नहीं कहा जा सकता है ऐसे प्रत्याशियों को लोग अर्थतांत्रिक प्रत्याशी ही मानते हैं  वास्तविकता भले कुछ भी हो ! वैसे भी जिस प्रत्याशी के विषय में अध्ययन करने पर आसानी से अनुमान लगाया जा सकता हो कि पार्टी ने यहाँ अपनी विश्वसनीयता को दाँव पर लगाया है इसके पीछे पार्टी नेतृत्व का लोभ कुछ भी रहा हो !किन्तु पार्टी के समझौता के पीछे पार्टी का चुनावी हित तो नहीं ही सम्मिलित रहा है । बात और है कि कुछ प्रत्याशी यह कहते सुने जा सकते हैं कि मैं तो यहीं पैदा हुआ था अरे! इसका मतलब क्या हुआ जनता आपके पैदा होने का कर्जा चुकाए कुछ लोग कहते हैं कि मैं तो बीस वर्ष पहले यहीं रहता था इसका मतलब क्या अब टैक्स लेने आए हो !बंधुवर !जनता आपकी पैदाइस के हिसाब से वोट नहीं देती है जनता तो काम के हिसाब से वोट देती है इस क्षेत्र के लिए अभी तक आपने किया क्या है सो बताइए ! जो बताने और समझने में सफल हो गया जनता उसको आशीर्वाद दे देती है !

    आजकल भाजपा की चुनावी दुकानदारी इतनी अच्छी चल  रही है कि अपनी अपनी पार्टियाँ छोड़ छोड़ कर तमाम रंग बिरंगे तीतर बटेर भाजपाई चबूतरे पर इकट्ठे हो रहे हैं उनमें कुछ तो अभी कुछ समय पहले तक तक इतने कट्टर भाजपा द्रोही रह चुके हैं किन्तु सत्ता का मुख भाजपा की और देखकर अब पद लोलुपों ने भाजपा रूपी नाव की ही सवारी कर ली है लोग बैठते चले जा रहे हैं भाजपा द्रोहियों का भार न सह पाने के कारण अब नाव डगमगाने लगी है इसलिए अनाड़ी नाविक पुराने भाजपाइयों को नाव से उतरने के लिए मजबूर करते जा रहे हैं किन्तु बात बिचारधारा की है इसलिए लटके वे भी हैं जाएँ  तो जाएँ  कहाँ ! किन्तु संशय इस बात का है कि ये नाव आगामी चुनावी वैतरणी में कहीं दम न तोड़ दे और डूब जाए!दुर्भाग्य वश यदि ऐसा हुआ तब ये आने वाले तीतर बटेर तो उड़ कर उस शाखा पर बैठेंगे जहाँ सरकार बनती होगी नुकसान तो भाजपा का होगा !आज तो जो आ रहा है सबका लक्ष्य केवल एक ही है सब मिलजुलकर मोदी जी के हाथ मजबूत करना चाहते हैं किन्तु उनसे ये कोई नहीं पूछता कि उन्हें ऐसा क्यों लगता है कि मोदी जी के हाथ कमजोर हो गए हैं दूसरी बात रंग बिरंगे तीतर बटेर जैसे ये आगंतुक मौसमी पक्षी चुनावों के बाद फिर न जाने कहाँ उड़ कर जाएँगे और अगले चुनावी मौसम में उड़कर न जाने किस पेड़ पर बैठें !ये चलते फिरते रहने वाले कम्प्यूटरी वायरस की तरह हैं न जाने कब किस पार्टी की विंडो  करेप्ट करके निकाल लें !

     इसलिए चुनाव के समय अक्सर अपने बोझ से ही अस्थिर हो जाने वाली भाजपा एक ज्योतिषीय दोष से इतना अधिक पीड़ित है उसे यदि कोई बताना भी चाहे तो किसे बताए किन्तु दिल्ली से केंद्र तक के चुनावों में भाजपा को हर बार इसकी कीमत चुकानी पड़ती है मैं क्षमा याचना के साथ कहना चाहता हूँ कि इस दोष के रहते मोदी जी के नाम की कृत्रिम श्वाँस बहुत कुछ चमत्कार कर पाते एक ज्योतिषी होने के नाते कम से कम हमें तो नहीं ही दिख रही है किन्तु यह बात बताई किसे जाए और सुने कौन !

     खैर जो भी हो हम तो यही कहेंगे कि हारें या जीतें किन्तु चुनावों के बाद जनता को भूल जाने की आदत छोड़नी चाहिए भाजपा को !

    भाजपा के कार्यकर्ता दिल्ली और यू.पी.के भाजपाइयों की तरह आलसी न हों जो खुद तो चुनाव बीतने  के बाद निष्क्रिय हो ही जाते हैं और जनता को दिखाने लगते हैं ठेंगा ! चुनावों आने पर फिर माथे पर तिलक काँधे पर रामनामी से विभूषित होकर जाने लगते हैं जनता के बीच वोट माँगने !कभी अटल जी की फ़ोटो लेकर कभी अडवाणी जी की कभी मोदी जी की!चुनावों के बाद फिर नए चेहरे की तलाश ! आखिर कब तक चलेगा यह खेल ! आखिर अपने चेहरे की पहचान पर ,अपने विश्वास पर ,अपने जन सेवा कार्यों के बल पर,अपनी ईमानदारी के बलपर क्यों नहीं माँगे जा सकते हैं वोट !हर हर मोदी घर घर मोदी ये सब क्या है ?चुनावों के बाद जब काम पड़ेगा या आएगा कोई संकट तब जनता कहाँ ढूंढेगी मोदी जी को?है कोई हेल्प लाइन नंबर भाजपा का जहाँ जनता करे काल और भाजपा के कार्य कर्ता जनता के न्यायोचित मुद्दों पर क्यों न दें जनता का साथ !यदि चुनावों के बाद जीत जाएँ तो ईमानदारी पूर्वक जनता के काम करें और न भी जीतें तो भी जो सरकार हो उस पर दबाव बनाकर कराएँ जनता के काम !चुनावों की इस पवित्र बेला पर भाजपा क्यों नहीं घोषित कर देती है कोई पार्टी का हेल्प लाइन नंबर !भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को भी तो पता लगे कि आखिर इतने दिनों से यू.पी. और दिल्ली में क्यों पिट रही है भाजपा की भद्द !आखिर तीन दिन के केजरीवाल का इतना साहस कि वो राष्ट्रीय पार्टी भाजपा के पी.एम.प्रत्याशी को चुनौती देने का साहस कर रहे हैं और मीडिया उनकी बातों को ध्यान दे रही है समाज का विश्वास जीतने वाले कार्यकर्ता भाजपा में क्यों नहीं बनाए जा सकते !ऐसे लोगों को क्यों दे उनके नाम पर वोट !जो केवल मोदी मन्त्र के सहारे चुनाव जीतने की इच्छा रखते हैं अपनी जिम्मेदारी और ईमानदारी पर जनता से माँगिए वोट और कीजिए जन सेवा के काम जिससे सुधरे जनता के मन में भाजपा के प्रति टूटा विश्वास !अन्यथा ब्यर्थ में हर हर मोदी कहने से या फेशबुक रँगने से कुछ नहीं होगा यदि साहस है तो जनता के बीच जाकर अपनी गुडबिल पर माँगिए वोट ये है पार्टी के वास्तविक कार्यकर्ताओं की पहचान !

मोदी की लहर' किन्तु लहरों का क्या आस्तित्व !वे तो आपसी कलह की चट्टानों से टकराकर लौट जाएँगी !
मोदी लहर की काल्पनिक कलह से जूझ रही भाजपा किन्तु मोदी लहर है कहाँ और होती भी तो लहरें पकड़ कर नहीं रखी जा सकती हैं ये तो जहाँ से उठती हैं वहीँ विलीन हो जाती हैं ? न इनको उठते देर न विलीन होते भाजपा क्या सोचती है कि इस लहर को वो पकड़ कर बैठ जाएगी! वैसे भी भाजपा की पहचान बन चुके बरिष्ठ नेता जब रूठे चल रहे हैं तब पार्टी चला कौन रहा है ?

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