गुजरात का हिन्दू U.P. और बिहार पहुँचकर जातिवादी क्यों हो जाता है अर्थात उसे अपनी जाति बताने के लिये मजबूर क्यों किया जाता है?
जातिवाद के धंधे से अच्छी खासी कमाई एवं पद प्रतिष्ठा प्राप्त करने वाली बहन जी भी अपनी एक मात्र योग्यता अर्थात जातिवाद का धंधा मंदा होता देखकर वे भी मोदी जी को अपनी जाति बताने के लिए बार बार ललकार रही हैं आखिर क्यों ?काँग्रेस का मोदी जी की जाति खोज अभियान आखिर कहाँ तक उचित है क्या सरकारें भी अब जातियों के हिसाब से चलेंगी ?
उन्हें या किसी और को किसी भी व्यक्ति की जाति पर स्पष्टी करण माँगने का अधिकार किसने दिया है और कोई अपने पिता या पितामह आदि की जाति कैसे प्रमाणित करे! उन्होंने जो कहा वही मानना मजबूरी है !लोग अपनी अपनी जातियाँ अपनी अपनी इच्छानुशार लिखने लगे उन्हें कैसे रोका जाए क्यों रोक जाए और कौन रोकेगा ?सरकार उन्हें वह जाति लिखने के लिए यदि रोकना भी चाहे कि तुम अपनी जाति झूठ बता रहे हो तुम्हारी जाति ये नहीं ये है तो इसका निर्णय सरकार कैसे करे या कोई कैसे करेगा ? जिस जाति का पता लगाने के लिए कोई मेडिकल या वैज्ञानिक जाँच प्रक्रिया नहीं है कोई प्रमाण नहीं हैं उन्हें आधार बनाकर आरक्षण जैसी और भी तमाम प्रकार की सुख सुविधा देने वाली योजनाएँ सरकारें कैसे चला जा सकती हैं और क्या यह न्याय है ?सरकार जब जिस जाति को चाहे दलित मान ले या OBC मान ले ! या जो मंत्री मुख्यमंत्री आदि बने वो तीर तुक्का लगाकर अपनी जाति को आरक्षण सुविधा दिलाने के लिए यहीं कहीं शामिल करा ले ! ये सब क्या ड्रामा है और कब तक चलेगा ? यदि जातियों में घालमेल की गुंजाइस न होती तो बड़े बड़े अरबोंपति नेता ग़रीबों अर्थात दलितों में कैसे घुस आते !अब ऐसे घुसपैठिए लोग भी अपने को दलित कहते हैं ये कोई मानने वाली बात है!और यदि ये घुसपैठिए अपने को दलित कह सकते हैं तो मोदी जी क्यों नहीं ?आप पढ़ें हमारा यह लेख -
"मोदी जी दलित क्यों नहीं और मायावती जी दलित क्यों हैं ? हर जाति का हर गरीब व्यक्ति दलित क्यों नहींहोसकता"seemore...http://bharatjagrana.blogspot.in/2014/05/blog-post_7.html|
जिस घर में समाज में देश वा प्रदेश में किसी भी स्त्री पुरुष के गुण चरित्र शालीनता साधुता सेवा भावना शिक्षा की कोई कदर ही न हो केवल जाति समुदाय संप्रदाय के आधार पर ही उसे नौकरियाँ एवं नौकरियों में प्रमोशन ,मनोनुकूल जगह पर ट्रांसफर तथा राजनैतिक पद प्रतिष्ठा आदि प्रदान की जाती हो केवल कुछ जातियों को फायदा पहुँचाने के लिए नेताओं से लेकर सरकारें तक काम करती हों जहाँ एक से एक अयोग्य लोगों को केवल उनकी जातियों के कारण टिकट दिए जाते हों मंत्री बनाया जाता हो मुख्यमंत्री बनाया जाता हो और भी बड़े बड़े पद दिए जाते हों और बड़े बड़े पढ़े लिखे मारे मारे फिरते हों क्योंकि वे उन जातियों के नहीं हैं जिनकी राजनैतिक दलों को जरूरत है ! हमने भी लगभग हर राजनैतिक दल को अपनी शिक्षा,स्वाध्याय एवं सामजिक सेवाओं के प्रमाण पत्र भेजे ताकि वे खुश होकर हमें भी अपने दल में सम्मिलित करके दें समाज सेवा का अवसर किन्तु उन्होंने हमारे सभी योग्यता प्रमाणपत्रों को मानो अयोग्यता प्रमाणपत्र मानकर अपने मुख ही नहीं लगाया पत्रोत्तर तक नहीं दिया कई पार्टियों में तो कई कई पत्र भेजे फिर भी नहीं आया कोई उत्तर तो मैं यहाँ पाठक मित्रों के साथ जन हित में अपने समय का करने लगा सदुपयोग !आप भी देखें -"अपने को योग्य कहूँ या अयोग्य"see more....http://snvajpayee.blogspot.com/2014/03/blog-post_14.html
दूसरी ओर जिनके पास अच्छा बोलने की तो छोड़िए कैसा भी बोलने तक की योग्यता न हो दूसरों से लिखाकर ले गए कागज़ पढ़कर प्रेस कांफ्रेंस करते हों सबसे बड़ा आश्चर्य तो इस बात का है कि वो ऐसे जातीय प्रदेशों में एक नहीं कई कई बार मंत्री या मुख्यमंत्री रह चुके हों ! क्या उन्हें उठना बैठना बोलना चालना सीख नहीं लेना चाहिए जब इन्हें धंधा राजनीति का ही करना है !आखिर मोची जूता सिलना सीख लेते हैं,दर्जी कपड़ा सिलना सीख लेते हैं राजमिस्त्री दीवार बनाना सीख लेते हैं तो राजनेता लोग अच्छा बोलना या प्रेसकांफ्रेंस में बोलना क्यों नहीं सीख पाते हैं क्यों लिख लिख कर ले जाते और कैमरों के सामने पढ़कर चले आते हैं! जिन्हें हिंदी नहीं आती है उनकी तो भाषायी मजबूरी है किन्तु जो हिंदी बोल लेते हैं वो भी प्रेसकांफ्रेंस में बोलने के लिए संभवतः इसलिए लिख लिख कर पढ़ते हैं कि बिना लिखे बोलने में पत्रकार बंधु अपनी बातों में फाँसकर कहीं वो सारा घपलों घोटालों का सच उगलवा न लें ! ऐसे जितना लिखा है उतना बोलना है बाकी वकीलों सलाहकारों ने कसम खिला रखी होती है कि इससे अधिक बोले तो तुम जानो तुम्हारे करम जानें इसलिए बेचारे नहीं बोलते हैं!
दूसरे वो नेता लोग लिखकर पढ़ते हैं जो हमेंशा गाली गलौच या बड़ी बड़ी धमकियाँ दिए बिना बोलते ही नहीं हैं ऐसे राजनेता या तो भाषण और प्रेसकांफ्रेंस के नाम पर लिख लिख कर पढ़ते हैं या फिर गंध बकते बोलते हैं आखिर अच्छा बोलने के लिए वे शब्द और भावनाएँ कहाँ से लावें लगातार छलकपट धोखा धड़ी पाप प्रपंच करते करते मर चुके हैं मन के अच्छे शब्द और जन हितकारी भाव एवं भावनाएँ !दूसरों की सेवा करने की ग़रीबों की मदद करने की औरों को अपनापन देने की तो इनकी इच्छा ही मर चुकी होती है फिर भी बड़ी बेशर्मी से दूसरों को सुख सुविधाएँ देने सम्बन्धी झूठी बातें बोलनी ही पड़ती हैं इसलिए लिखकर तो ले जानी ही पड़ेंगी अन्यथा मुख से सच निकलेगा तो कौन दे देगा वोट ? ऐसे लोग लगभग हर पार्टी में होते हैं बात और है कि किसी में कुछ कम हैं किसी में कुछ अधिक हैं काँग्रेस के शीर्ष से अभी नीचकर्म सम्बन्धी एक शब्द बड़े जोर शोर से उछाला गया है तो मुझे आश्चर्य लगा कि नीचकर्म खोजने ही थे तो शुरुआत अपने से करते तो अच्छा भी लगता और आप ही अच्छे हो जाते तो जनता उनसे स्वयं किनारा कर लेती जिनके नीच कर्मों से आप परेशान हैं किन्तु समस्या तो ये है कि कर्म आपके भी कोई बहुत अच्छे नहीं हैं आपने सबसे लम्बे समय तक देश में शासन किया है क्या आपको सीखना नहीं चाहिए था कि दुर्गुण खोजने की शुरुआत दूसरों से करना ये अपने आप में सबसे बड़ा दुर्गुण है ! क्या भ्रष्टाचार ,महँगाई एवं बिगड़ती कानून व्यवस्था इस देश में आपकी सरकार की सच्चाई नहीं है आप केवल राहुल जी राहुल जी सुनकर खुश हैं यह सब देखकर मैंने उन्हीं से एक लेख के माध्यम से कुछ प्रश्न पूछे हैं क्योंकि नीचकर्मों की तान छेड़ी ही उन्होंने है आखिर नीच कर्म किसके हैं ?आप भी पढ़ें हमारा वह लेख -"राहुल प्रियंका जी ! नीच कर्मकिसके हैं और कौन कर रहा है नीच
राजनीति ?
/2014/05/blog-post_7.html
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