वातावरण में प्रतिरोधक क्षमता घटने का प्रभाव !
प्रतिरोधक क्षमता घटने पर पशु पक्षियों की तरह ही बेचैनी मनुष्यों में भी होती है | जिससे लोग उन्मादित हो उठते हैं | समाज आंदोलित होने लगता है |विभिन्न स्थानों पर दंगा भड़कने लगता है | आतंकी घटनाएँ घटित होने लगती हैं | कुछ राष्ट्रों में युद्ध का वातावरण बनने लग जाता है | लोगों में हिंसा की भावना बढ़ती चली जाती है | इसी घबड़ाहट से बेचैन होकर बहुत लोग हत्या आत्महत्या जैसे बुरे बिचारों से भावित हो उठते हैं |
इनमें से कुछ लोग सुख सुविधाओं का सहारा लेकर या चिकित्सकीय सहयोग लेकर या रुचिकर वातावरण का सेवन करके अपनी बेचैनी कम कर लिया करते हैं तो कुछ लोग अपना ध्यान इधर उधर भटका लिया करते हैं | वैसे भी मनुष्यों का मन विविधप्रकार की चिंताओं उलझनों में लगा रहता है | इसलिए ऐसी बेचैनी का सामना करते हुए भी उनका ध्यान इधर नहीं जाता है| इसलिए उस बेचैनी के लक्षण पशुओं पक्षियों की अपेक्षा मनुष्यों को कम अनुभव हो पाते हैं |उनका ध्यान इन आतंरिक संकेतों की ऒर बहुत कम पहुँच पाता है | ऐसा होता भी है तो इसके लिए वे अपनी लौकिक परिस्थितियों को जिम्मेदार मान लेते हैं | कई बार समझने की क्षमता के अभाव में भी इस रहस्य को समझना संभव नहीं हो पाता है |
इसलिए मनुष्यों को इसका पता तभी लग पाता है ,जब इसके कारण होते नुक्सान को वे अपनी आँखों से देख हैं | इसी कारण कोरोना महामारी जब आ गई लोग संक्रमित होने या मृत्यु को प्राप्त होने लगे तब पता लगा कि महामारी प्रारंभ हो गई है|
बिशेष बात ये है कि नुक्सान होना जब शुरू हो ही जाता है तो वैज्ञानिक अनुसंधानों की आवश्यकता ही क्या रह जाती है |प्राकृतिकआपदाओं एवं कोरोना जैसी महामारियों से समाज को सुरक्षित बचाने का यदि लक्ष्य है तो तो ऐसे उसकी पूर्ति कैसे हो सकती है |
प्रकृति से संबंधित अनुसंधानों को प्राचीनकाल की पद्धति से करवाया जाना चाहिए | जिससे ऐसी घटनाओं के घटित होने से पहले इनके बिषय में पता लगाया जाना संभव हो सके |
प्राचीनकाल में प्रकृति से लेकर प्राणियों तक में होने वाले ऐसे परिवर्तनों को पहचानकर उनके आधार पर ऐसी घटनाओं के घटित होने से पहले ही उनके बिषय में पूर्वानुमान लगा लिया जाता रहा है | जिससे ऐसी घटनाओं से सुरक्षा संबंधी तैयारियाँ करने के लिए समय मिल जाता है | प्राचीनकाल से ही इन्हें समझने के लिए प्रयत्न करना प्रारंभ कर दिया गया था | जिसमें वे सफल भी हुए थे |
महामारियों की निर्माण प्रक्रिया
प्रत्यक्ष और परोक्षभेद से प्राकृतिक प्रतिरोधकक्षमता भी दो प्रकार की होती है |एक मनुष्यकृत तो दूसरी प्राकृतिक होती है|इसके कमजोर होने से प्राकृतिक वातावरण बिगड़ने लगता है | बादल वर्षा चक्रवात भूकंप आदि प्राकृतिक घटनाएँ अधिक मात्रा में घटित होने लगती हैं | ऐसे वातावरण में पल बढ़ रहे वृक्षों बनस्पतियों फूलों फलों फसलों आदि में उसप्रकार के बिकार आने लग जाते हैं |ऐसे बिकारित वातावरण में साँस लेने से तथा इसमें पैदा होने वाली खाने पीने की वस्तुओं को खाने पीने से मनुष्य आदि जीव जंतुओं के शरीर रोगी होने लग जाते हैं | इससे प्रकृति को तो नुक्सान होता ही है | प्रकृति से पोषण प्राप्त कर रहे प्राणियों को भी नुक्सान होता है |उस विकारित वातावरण का प्रभाव बनस्पतियों एवं अन्य औषधीय द्रव्यों पर भी पड़ता है |इससे वे अपने गुणों से हीन एवं कुछ दूसरे गुणों से युक्त हो जाती हैं |
प्राकृतिक वातावरण में प्रतिरोधकक्षमता कमजोर होने पर कुछ उस प्रकार की प्राकृतिक घटनाएँ घटित होने लगती हैं |ऐसी घटनाओं के घटित होने से पहले ही प्राकृतिक वातावरण में कुछ उस प्रकार के संकेत उभरने लगते हैं |ऐसे वातावरण में उसमें साँस लेने से मनुष्यों समेत समस्त पशु पक्षियों एवं जीव जंतुओं में बेचैनी बढ़ने लगती है |उनका व्यवहार बदलने लगता है |जिससे वे उन्मादित होकर उपद्रव करने लगते हैं |इन्हीं लक्षणों के आधार पर मौसम या महामारी जैसी प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में पहले से पूर्वानुमान लगाया जा सकता है |इसीलिए भूकंप जैसी घटनाओं के घटित होने से पहले भी जीव जंतुओं के व्यवहार बदलते हुए देखे जाते हैं |
कोरोना काल में ही देखा जाए तो आवारा पशुओं का आतंक बहुत अधिक बढ़ गया था | अभी भी है किंतु उतना नहीं है जितना कोरोना काल में था |गाय का स्वभाव मुर्गा खाना नहीं होता है किंतु कोरोनाकाल में ऐसी घटनाएँ भी घटित होते देखी गईं | कई देशों प्रदेशों में टिड्डियों की संख्या बहुत अधिक बढ़ गई थी |चूहों का आतंक विश्व के अनेकों देशों में बढ़ता जा रहा था | बेचैन कौवे चमगादड़ आदि पक्षी भयभीत थे | अनेकों स्थानों पर बागों जंगलों आदि में चमगादड़ कौवे जैसे पक्षी बड़ी संख्या में मृत पाए गए थे | ऐसे परिवर्तन होते हमेंशा नहीं देखे जाते हैं | ये महामारी आने या बढ़ने के संकेत थे |पशु पक्षियों को ऐसी प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में बहुत पहले से आभाष हो जाता है |
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