वायुप्रदूषणसंबंधी अनुसंधान और प्राचीनविज्ञान
प्रस्ताव का उद्देश्य :
हमारा उद्देश्य वायु प्रदूषण के कारणों और पूर्वानुमानों को प्राचीन भारतीय समय विज्ञान और पर्यावरणीय सिद्धांतों के साथ जोड़कर देखना है, ताकि सरकार को और अधिक सटीक और समय पर जानकारी मिल सके और आम जनता को अप्रत्याशित प्रतिबंधों से बचाया जा सके।
यह शोध परियोजना आधुनिक वायु प्रदूषण के कारणों और समय चक्रों का सूक्ष्मता से अध्ययन करती है, जिसका लक्ष्य प्राचीन भारतीय समय विज्ञान और पर्यावरणीय सिद्धांतों के आधार पर प्राकृतिकघटनाओं के बिषय में अनुसंधान करना है |
इसके साथ ही हमारा उद्देश्य प्राचीन भारतीय पद्धति और आधुनिक पर्यावरणीय डेटा का संयोजन कर वायु प्रदूषण के मूल कारणों का सही पता लगाना है। जिससे वायुप्रदूषण बढ़ने का कारण प्राकृतिक है या मनुष्यकृत ये पता लगाया जा सके |वायुप्रदूषण नियंत्रण के लिए सटीक पूर्वानुमान लगाए जा सकें | यह परियोजना समाज को कठोर प्रतिबंधों से बचाते हुए, सरकार को पहले से प्रभावी नीतियां बनाने और आम जनता की स्वास्थ्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में सहायक सिद्ध होगी।
इसके अतिरिक्त, यह शोध पारंपरिक ज्ञान और समकालीन विज्ञान के समन्वय से एक ऐसी व्यवस्था विकसित करना चाहता है, जो न केवल पर्यावरणीय संतुलन को सुदृढ़ करे, बल्कि सरकारी योजनाओं में वैज्ञानिक और प्राकृतिक दृष्टिकोण को एकीकृत कर सतत विकास को बढ़ावा दे सके।
यह अध्ययन वायु प्रदूषण के बढ़ने और घटने के वास्तविक कारणों को उजागर कर, समाज को अवांछित प्रतिबंधों से मुक्त करने में सहायक होगा , जिससे संसाधनों का उचित उपयोग हो सके और भविष्य की चुनौतियों का सामना प्रभावी ढंग से किया जा सके।इसके अलावा, यह परियोजना सार्वजनिक स्वास्थ्य की सुरक्षा में भी योगदान देती है, क्योंकि पूर्वानुमान के माध्यम से वायु प्रदूषण के हानिकारक प्रभावों को कम करने के लिए त्वरित और लक्षित कदम उठाए जा सकेंगे ।
इस दृष्टिकोण से आधुनिक वैज्ञानिक समुदाय के लिए नए अनुसंधान के द्वार खुलेंगे, जो विभिन्न पर्यावरणीय समस्याओं को सुलझाने में पारंपरिक और प्राचीन पद्धतियों की प्रासंगिकता को प्रमाणित करते हैं।यह शोध प्रस्ताव नीति निर्माताओं को दूरगामी और टिकाऊ समाधान प्रदान कर, भविष्य के पर्यावरणीय प्रबंधन के लिए एक नया स्वदेशी मॉडल तैयार करने का मार्ग प्रशस्त होगा।यह शोध परियोजना भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक डेटा के एक अनूठे मेल को प्रदर्शित करती है, जिससे भविष्य में अन्य पर्यावरणीय चुनौतियों के लिए राष्ट्र को उसकी वैज्ञानिक विरासत से जोड़ते हुए, आत्मनिर्भरता और नवाचार के मार्ग को प्रशस्त करता है।
यह प्रस्ताव पारंपरिक भारतीय ज्ञान के वैज्ञानिक आधार को सुदृढ़ कर, विश्व स्तर पर भारत की वैज्ञानिक क्षमता और स्वतंत्र अनुसंधान को एक नई पहचान देने में सहायक होगा।
द्वितीय अध्याय
संस्थान के उद्देश्य एवं लक्ष्य
राजेश्वरी प्राच्यविद्या शोध संस्थान, प्राचीन भारतीय समय विज्ञान और आधुनिक वायुमंडलीय डेटा के संयोजन से पर्यावरण की भविष्यवाणी करने वाला एक अग्रणी स्वतंत्र अनुसंधान संगठन है। इसके अतिरिक्त विश्व में कोई दूसरी ऐसी वैज्ञानिक अनुसंधान पद्धति नहीं है | जिसके द्वारा प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में दीर्घावधि पूर्वानुमान लगाए जाने संभव हों | सूर्य चंद्रग्रहणों के बिषय में हजारों वर्ष पहले सही पूर्वानुमान लगाया जाना इसी अनुसंधान पद्धति से संभव हो पाया है |
इसी प्रकार से प्रत्येक प्राकृतिक घटना के बिषय में सटीक दीर्घावधि पूर्वानुमान लगाना हमारे अनुसंधानों का लक्ष्य है | इससे प्राकृतिक आपदाओं महामारियों वायु प्रदूषण आदि के बिषय में सही दीर्घावधि पूर्वानुमान लगाकर ऐसी घटनाओं से जनधन की सुरक्षा के लिए पहले से प्रयत्न किए जा सकते हैं | इसके आधार पर मौसम से लेकर कोरोना महामारी एवं उसकी लहरों के बिषय में इसके आधार पर लगाए गए पूर्वानुमान प्रायः सही निकलते रहे हैं | प्राकृतिक वायु प्रदूषण के बिषय में भी इसके आधार पर लगाए गए पूर्वानुमान प्रायः सही निकलते रहे हैं |
हमारा कार्य वायु प्रदूषण पूर्वानुमान प्राकृतिक संकेतों के विश्लेषण पर केंद्रित है ताकि आपदा प्रबंधन और नीति निर्माण में सहायता प्रदान की जा सके। संस्थान प्राचीनज्ञान और आधुनिकविज्ञान के मेल से वायुप्रदूषण और मौसमी चक्रों पर केंद्रित अनुसंधान करता है। साथ ही भूकंपीय और क्षेत्रीय वर्षा चक्रों का गणितीय विश्लेषण करके प्राकृतिक आपदाओं का पूर्वानुमान लगाने की दिशा में कार्य कर रहा है।
हमारा संस्थान पारंपरिक प्रकृतिविज्ञान समयविज्ञान एवं जीवनविज्ञान से संबंधितअनुसंधानों को करता है | समय समय पर होने वाले आकस्मिक खगोलीय परिवर्तनों का अध्ययन किया जाता है | पेड़ों पौधों बनस्पतियों आदि में होने वाले परिवर्तनों को समझना होता है | पशुपक्षियों समेत समस्त जीव जंतुओं के बदलते व्यवहारों के आधार पर मौसम संबंधी भावी प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में अनुसंधान पूर्वक पूर्वानुमान लगाए जाते हैं |प्राकृतिकपरिवर्तनों के द्वारा मनुष्यों के लिए समय समय पर दी जाने वाली सांकेतिक सूचनाओं का अनुसंधान पूर्वक पता लगा लगाता है |प्राचीनविज्ञान के साथ नवीनतम वायुमंडलीय डेटा के तालमेल से पर्यावरण और आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में एक नई और उन्नत कार्यप्रणाली विकसित की जा रही है |
इसके अलावा, संस्थान इस समय एक विस्तृत बहु-अध्यायी प्रस्ताव और वाणिज्यिक सेवा प्रक्रिया विकसित कर रहा है, ताकि हमारे शोध निष्कर्षों को व्यावहारिक संस्थागत समाधानों में बदला जा सके। संस्थान समय समय पर अधिकृत विभिन्न सरकारी और विधायी निकायों तक अपने पूर्वानुमानों को भेजता भी है |मौसम संबंधी दैनिक पूर्वानुमान सोशल साइटों पर आगे से प्रकाशित किए जाते हैं |जिसके बिषय में विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में समय समय पर प्रकाशित होता रहता है |
पर्यावरण मंत्रालय, सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ,प्रधानमंत्री कार्यालय और दिल्ली के उपराज्यपाल,मुख्यमंत्री से मिलकर वायु प्रदूषण पूर्वानुमान पर सहयोग लेने का प्रयास कर रहा है।इस प्रस्ताव में संसदीय समितियों और पर्यावरण मंत्रालयों को शामिल करने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा ताकि शोध के निष्कर्षों को प्रभावी नीतिगत निर्णयों में बदला जा सके।इसके अलावा, संस्थान इस शोध में काल चक्रों के सिद्धांतों को भी जोड़ता है, जिससे पर्यावरण परिवर्तनों को समझने का एक नया दृष्टिकोण मिलता है।
संस्थान शैक्षिक वीडियो और सोशल मीडिया रील्स के माध्यम से समय चक्र और प्राकृतिक घटनाओं के वैज्ञानिक विश्लेषण को आम जनता तक पहुँचाने का भी कार्य करता है।संस्थान इस शोध को वाणिज्यिक रूप से संचालित करने के लिए निजी कॉर्पोरेट कंपनी की स्थापना की संभावनाओं पर भी विचार कर रहा है।
निजी कंपनी की स्थापना से गैर-लाभकारी शोध संस्थान से अलग एक व्यावसायिक इकाई का ढांचा तैयार कर सकते हैं। इसमें जैसे एफईआई रिसर्च('Forecasting and Environmental Insights') जैसी कंपनी के माध्यम से वाणिज्यिक पूर्वानुमान सेवाओं का प्रबंधन किया जा सकता है। एफईआई रिसर्च, राजेश्वरी प्राच्यविद्या शोध संस्थान के साथ व्यावसायिक पूर्वानुमान सेवाओं के प्रबंधन के लिए प्रस्तावित एक निजी कॉर्पोरेट इकाई है| जो वायु प्रदूषण और समय विज्ञान से जुड़े समाधानों को बाजार में ले जाने में मदद कर सकती है।संस्थान का मुख्य उद्देश्य पर्यावरण और आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में प्राचीन भारतीय ज्ञान और आधुनिक वैज्ञानिक डेटा के समन्वय से समाज को लाभ पहुँचाना है।संस्थान का लक्ष्य अपनी शोध रिपोर्टों के माध्यम से पर्यावरणीय समस्याओं के लिए नीतिगत समाधान प्रस्तुत करना है।संस्थान नियमित रूप से शैक्षिक वीडियो और सोशल मीडिया रील्स भी तैयार कर रहा है, जिससे समय चक्र और प्राकृतिक घटनाओं का वैज्ञानिक विश्लेषण आम जनता तक पहुँचाया जाता है।राजेश्वरी प्राच्यविद्या शोध संस्थान वायुप्रदूषण संबंधित पूर्वानुमान लगाने एवं जनहित के लिए समर्पित है।
तीसरा अध्याय
वायुप्रदूषण संबंधी अनुसंधानों का तुलनात्मक विश्लेषण
वायुप्रदूषण बढ़ने के लिए जिम्मेदार मानकर जिन कार्यों पर प्रतिबंध और जिन लोगों पर जुर्माना लगाया जाता है | यदि उन्हें ही विश्वास में लिया जाए तो संभव है कि प्रतिबंध और जुर्माना लगाने की आवश्यकता ही न पड़े | समाज समयानुसार ढलने के लिए स्वयं सहमत हो जाए |
इसके लिए वायुप्रदूषण बढ़ने के लिए जिम्मेदार वास्तविक कारण पता लगाने होंगे और सही पूर्वानुमान समाज को बताने होंगे | वायुप्रदूषण बढ़ने का कारण प्राकृतिक है या मनुष्यकृत अनुसंधानों के द्वारा इस रहस्य को सुलझाना होगा |
वर्तमान समय में धुआँ धूल उड़ाने वाली जितनी भी चीजें हैं उन सभी को वायु प्रदूषण बढ़ने के लिए जिम्मेदार बता दिया जाता है | इसमें अनुसंधानजनित कारण और पूर्वानुमान न होकर जब जैसा होते दिखाई पड़ता है तब तैसा तब वैसा बताया जाने लगता है | दशहरे में यदि वायुप्रदूषण बढ़ा तो वायुप्रदूषण बढ़ने का कारण पटाखा फोड़ने को बताया जाता है |इसे जनता भी मान लेती है और अंदाजा लगा लेती है कि दो तीन दिन बढ़ा रहेगा फिर सामान्य हो जाएगा | ऐसे ही दीपावली के समय में वायुप्रदूषण बढ़ा तब भी उसके बढ़ने का कारण पटाखा फोड़ने को बता दिया जाता है | इससे वायु प्रदूषण एक सप्ताह बढ़ा रहेगा जनता भी ऐसा अंदाजा न लेती है |
इसके बाद भी जब वायु प्रदूषण बढ़ा रहता है तो वायुप्रदूषण बढ़ने का कारण पराली जलाने को बता दिया जाता है |धान की फसल समाप्त होने तक वायुप्रदूषण बढ़ेगा जनता ऐसा मान लेती है | उसके बाद भी जब वायु प्रदूषण कम नहीं होता है तो सर्दी में हवाओं की गति कम होने को वायु प्रदूषण बढ़ने को जिम्मेदार बताया जाता है | गर्मी में वायु प्रदूषण बढ़ता है तो हवाओं की तेजगति तेज होने के साथ धूल उड़ने को वायु प्रदूषण बढ़ने के लिए जिम्मेदार बता लिया जाता है | वायु प्रदूषण बढ़ने के लिए जब ऐसा कोई कारण नहीं होता है तब उद्योगों वाहनों ईंटभट्ठों निर्माण कार्यों आदि से निकलने वाले धुएँ धूल को वायु प्रदूषण बढ़ने का कारण बता दिया जाता है |जब जैसी घटना घटित होने लगती है तब तैसा कारण बता दिया जाता है | उस कारण के आधार पर पहले से लगाया गया पूर्वानुमान सही न निकलने के कारण जनता को उन पर विश्वास नहीं होता है |
कुलमिलाकर प्रकृति में जब जैसी घटनाएँ घटित होती जाएँगी तब तैसा ही बताया जाना है और उस समय जो काल्पनिक कारण हैं उन्हें ही दोषी बता दिया जाना है तो इसमें अनुसंधान जैसा विश्वसनीय कुछ दिखता भी नहीं है | इसलिए समाज ऐसी बातों पर भरोसा नहीं कर पाता है |
इसमें जनता का भी अपना चिंतन होता है | पराली जलाने या पटाखा फोड़ने की तुलना वायु प्रदूषण बढ़ने की बातों की तुलना जनता कई कई वर्षों से युद्ध झेल रहे देशों से करती है जहाँ रोज हजारों बम मिसाइलें आदि फोड़ी जाती हैं फिर भी वहाँ के वातावरण में यदि उस प्रकार से वायु प्रदूषण नहीं बढ़ता है तो यहाँ उद्योगों वाहनों ईंटभट्ठों निर्माण कार्यों आदि से इतना अधिक वायु प्रदूषण कैसे बढ़ सकता है | ऐसी शंकाओं का समाधान किए बिना ऐसी बातों पर समाज विश्वास नहीं कर पाता है |
इसलिए वैज्ञानिकों के द्वारा बताए गए वायु प्रदूषण से संबंधित पूर्वानुमानों एवं उसे कम करने के लिए लगाए जाने वाले प्रतिबंधों पर समाज विश्वास नहीं कर पाता है | यही कारण है कि उनके द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के पालन में उनकी रुचि नहीं हो पाती है | जिसके लिए सरकारों को जुर्माना आदि दंड विधान करने पड़ते हैं | उनका उतना प्रभाव इसलिए नहीं पड़ता है ,क्योंकि इतने बड़े समाज पर कोई बात थोपी नहीं जा सकती है |अनुसंधानों के द्वारा समाज का विश्वास जीतकर ही उसे कोई बात मनाई भी सकती है | इसलिए अनुसंधानों की विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए प्रयत्न किए जाने चाहिए |
कुल मिलाकर वैज्ञानिकों के द्वारा माने गए वर्तमान मानक केवल उत्सर्जन सीमाएँ निर्धारित करते हैं, लेकिन उस प्रक्रिया से समय, स्थान और प्रत्यक्ष कारकों के गतिशील संयोजन न हो पाने के कारण उसके वायु प्रदूषण पर पड़ने वाले प्राकृतिक प्रभावों को समझना कठिन होता है |
ऐसी समस्याओं के समाधान एवं जनता की विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए हमारी शोधपद्धति के अंतर्गत बहु-मापदंडीय अनुदैर्ध्य आँकड़ों का उपयोग किया जाता है । इसमें वायुमंडलीय चर, वर्षण आँकड़े और खगोलीय पंचांग चक्र शामिल हैं | ये आँकड़े अंशांकन और पूर्वव्यापी सत्यापन का आधार बनते हैं। इससे यह सिद्ध हो सके कि मॉडल पूर्वानुमान लगाने में कितना सटीक रहा है ।खगोलीय पंचांग चक्रों और ऐतिहासिक डेटा का उपयोग करके वायुमंडलीय विकारों के पैटर्न को सटीक रूप से पहचाना जा सकता है |जिससे वैज्ञानिक त्रुटियों और अनिश्चितता को काफी कम किया जाता है।
इनके सही निकलने पर वायु प्रदूषण संबंधी पूर्वानुमानों एवं इसे कम करने के लिए बनाए जाने वाले नियमों पर जनता का भी विश्वास बढ़ेगा | इनका पालन समाज स्वयं करने लगेगा |जनता भी तो स्वस्थ रहने के लिए वायु प्रदूषण मुक्त वातावरण चाहती है | जनता और सरकारों के संयुक्त प्रयासों से वायु प्रदूषण से स्वास्थ्य सुरक्षा करने में मदद मिलेगी |
अध्याय 4
धुआँ और धूल का वैज्ञानिक वर्गीकरण: प्राकृतिक बनाम कृत्रिम स्रोत !
आधुनिकविज्ञान के आने से पहले जो पारंपरिक जीवन शैली रही है| उसमें अधिकतर रहन सहन गाँवों खेतों खलिहानों में होता था |फसलों की कटाई मड़ाई आदि से धूल उड़ा करती थी | मार्च से जुलाई तक लू एवं आँधी तूफानों में धूल से वातावरण व्याप्त रहता था | घरों की दीवारें छोटी एवं घर खुले होते थे |उस कृषि आधारित जीवन पद्धति में धूल से बच के रहना संभव ही नहीं होता है |बचपन में छोटे छोटे बच्चे धूल में खेला करते थे | कृषिकार्यों में तो धुआँ धूल तो सहनी ही पड़ती है |
इसीप्रकार से ग्रामीण जीवनशैली में धुएँ से मुक्त वातावरण कभी हो ही नहीं पाता है| फसलों के अवशेष जलाए जाते थे |उनसे धुआँ निकलता था |माताएँ ईंधन से चूल्हे पर भोजन बनाती थीं |वहाँ धुएँ में ही रहना होता था | सर्दी में पूरा समय अलाव सेंक कर ही बिताना पड़ता था | उसमें घरों में धुआँ धुआँ भर जाता था| हवन यज्ञ होते थे |उसमें धुआँ होता था |उसे वातावरण को स्वास्थ्यकर बताया जाता था | बहुत लोग धूमपान करते थे |वो तो सीधे ही मनुष्यों के अंदर जाता है |आयुर्वेद की चरकसंहिता आदि ग्रंथों में औषधीय धूमपान चिकित्सकीय और दिनचर्या का हिस्सा माना गया है। महर्षि चरक ने इसे सिर, गले, नाक और छाती से जुड़े वात और कफ रोगों को दूर करने के लिए हितकर बताया है।उस युग में लोग बड़े रोगों से रोगी होते होंगे ऐसा कोई वर्णन नहीं मिलता है |
वैसे भी देखा जाता है कि जिस प्रकार की लकड़ी या वस्तुओं के जलने का धुआँ होता है |उसी प्रकार के गुणधर्म उस धुएँ में भी होते हैं | मिर्चे को जलाने का धुआँ खाँसी छींक पैदा करता सुगंधित द्रव्यों का धुआँ सुगंध फैलाता है |
इसलिए वनस्पति आधारित धुएँ और प्राकृतिक धूल का स्वास्थ्य पर प्रभाव पेट्रोलियम पदार्थों के धुएँ से अलग होता है, क्योंकि इनका रासायनिक स्वरूप प्राकृतिक होता है।'वनस्पति आधारित धुआँ और प्राकृतिक धूल का स्वरूप और स्वास्थ्य पर प्रभाव
बताएं कि पराली जलाने जैसा धुआं जैविक है, जिसमें कार्बन के साथ-साथ प्राकृतिक पोषक तत्व होते हैं, जबकि पेट्रोलियम और उद्योगों का धुआं रासायनिक होने के कारण हानिकारक तत्वों से भरा होता है।इसका शोध होना चाहिए |
इसके अलावा धूल को लेकर यह वैज्ञानिक शोध आवश्यक है कि मौसमी धूल का शरीर पर प्रभाव हमेशा प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाला रहा है, जिससे कृषक वर्ग और बच्चे स्वस्थ रहे हैं। पारंपरिक कृषि पद्धतियों में धुआं हमेशा से मौसम चक्र का एक हिस्सा रहा है। इसलिए प्रदूषण नियंत्रण के नियमों को एकसमान न बनाकर प्रदूषण के स्रोतों के वैज्ञानिक वर्गीकरण पर आधारित होना चाहिए, ताकि सही समस्याओं का समाधान हो सके।
वर्तमान प्रदूषण नीतियां त्रुटिपूर्ण हैं क्योंकि वे स्रोतों के बीच वैज्ञानिक अंतर नहीं करती हैं। वनस्पति के जलने से होने वाले धुएँ और मौसमी धूल के हानिरहित प्रकृति को स्वीकार करते हुए नियमों को लक्षित और तर्कसंगत बनाया जाना चाहिए। जिम्मेदारी का निर्धारण करते समय भी अलग-अलग कारकों को ध्यान में रखना आवश्यक है, ताकि दंड केवल उन गतिविधियों पर लगे जो वास्तव में हानिकारक हैं। यह हमारे प्रस्ताव का मुख्य आधार बिंदु है।
हमारे शोध का एक प्रमुख लक्ष्य प्रदूषण के विभिन्न स्रोतों का वैज्ञानिक वर्गीकरण करना है, ताकि उनके प्रभावों का सटीक और पृथक विश्लेषण किया सके।हमारा बहुबिषयक दृष्टिकोण केवल उत्सर्जन तक सीमित नहीं है, बल्कि समय और प्राकृतिक कारकों पर भी आधारित है। वहीं, 'वैज्ञानिक पारदर्शिता' इस बात को रेखांकित करती है कि हमारी प्रक्रिया स्पष्ट है और जनता के भरोसे पर खरी उतरती है, जिससे नियमों का पालन स्वाभाविक रूप में होता है।
संलग्न ग्राफिक्स और डेटा तालिकाओं में प्रस्तुत निष्कर्ष आने वाले महीनों के मौसमी और प्रदूषण के रुझानों का स्पष्ट विवरण देते हैं। यह विश्लेषण हमारे शोध की प्रभावशीलता को सिद्ध करता है और इसके अगले चरण में इन अनुमानित प्रवृत्तियों की विस्तृत समीक्षा की जाएगी।मैं विश्वास पूर्वक कह सकता हूँ कि ये पूर्वानुमान यदि शत प्रतिशत सही न भी निकले तो 70 प्रतिशत से अधिक सही निकलने की आशा करता हूँ | भविष्य में जैसे जैसे अनुसंधानों का विस्तार होता जाएगा वैसे वैसे अनुमानों पूर्वानुमानों में निखार आता जाएगा |
पाँचवाँ अध्याय:
भविष्य की राह और निष्कर्ष
1. व्यापक प्रकृति अध्ययन की आवश्यकता
* वायु प्रदूषण और पर्यावरणीय चक्रों का सटीक पूर्वानुमान लगाने के लिए केवल प्रयोगशालाओं या सीमित आंकड़ों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है।
* इसके लिए प्रकृति के विभिन्न अंगों—जैसे वन प्रांत, जल स्रोत, पर्वतीय क्षेत्र, आकाशीय और खगोलीय स्थितियाँ, तथा स्थानीय जीव-जंतुओं और वनस्पतियों में होने वाले परिवर्तनों का सूक्ष्म अध्ययन आवश्यक है।
* इस समग्र अध्ययन के लिए विभिन्न क्षेत्रों के जानकारों (जैसे पशुपालक, कृषक, वनवासी और मौसम चक्र के जानकारों) के अनुभवों को साथ लेकर चलना होगा।
2. स्वतंत्र अनुसंधान और प्रशासनिक स्वतंत्रता
* पारंपरिक शोध प्रणालियों की तरह हर छोटे-छोटे खर्च का प्रशासनिक हिसाब देना इस प्रकार के प्राचीन समय-चक्र (समय विज्ञान) आधारित अनुसंधान के लिए व्यावहारिक नहीं है।
* शोधकर्ताओं को बिना किसी प्रशासनिक उलझन के स्वतंत्र रूप से कार्य करने की छूट होनी चाहिए, ताकि वे प्रकृति के संकेतों का गहराई से अध्ययन कर सकें।
3. सरकार के लिए व्यावहारिक सुझाव: पूर्वानुमान क्रय मॉडल
* सरकार पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण पर अरबों रुपये खर्च करती है, फिर भी सटीक पूर्वानुमान मिलना कठिन होता है।
* हमारा मुख्य सुझाव यह है कि सरकार इस अनुसंधान संस्थान पर अत्यधिक धन खर्च करने के बजाय, हमसे सीधे वैज्ञानिक और सटीक वायु प्रदूषण पूर्वानुमान खरीदे और इसके एवज में हमें आर्थिक योगदान या पारिश्रमिक दे।
* इस मॉडल से सरकार को बिना किसी पेचीदा प्रशासनिक झंझट के उच्च स्तर की सटीकता वाले पूर्वानुमान प्राप्त हो जाएंगे।
4. जनता और उद्योगों को राहत
* यदि हमारे पूर्वानुमान 70% से अधिक सटीकता के साथ वास्तविक कारणों और समय-सारणी को स्पष्ट करेंगे, तो सरकार को आम जनता और उद्योगों के विरुद्ध दंडात्मक कदम उठाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।
* इसके तहत निम्नलिखित राहतें सुनिश्चित की जा सकती हैं:
* पराली जलाने या अन्य प्राथमिक कारणों से जुड़े मामलों में किसानों और आम नागरिकों के विरुद्ध अनावश्यक दंडात्मक कार्रवाई और भारी जुर्माने रोके जा सकेंगे।
* वायु प्रदूषण बढ़ने के नाम पर अचानक वाहनों के संचालन, औद्योगिक इकाइयों, निर्माण कार्यों और ईंट भट्टों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की स्थिति से बचा जा सकेगा।
* यदि प्रतिबंध आवश्यक भी हुआ, तो वह केवल उतने ही सीमित दिनों के लिए होगा जितने दिनों की वास्तविक आवश्यकता होगी, जिससे मेहनतकश लोगों की आजीविका सुरक्षित । हमारा लक्ष्य दीर्घावधि मौसम पूर्वानुमान लगाने के लिए कोई ऐसी वैज्ञानिक पद्धति विकसित करना है | जिसके आधार पर भविष्य में घटित होने वाली संभावित प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में दीर्घावधि पूर्वानुमान लगाए जा सकें |



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