शुक्रवार, 6 नवंबर 2026


    वैज्ञानिकों का काम वायु प्रदूषण बढ़ने का वास्तविक कारण खोजना एवं उसके आधार पर वायु प्रदूषण बढ़ने के बिषय में पूर्वानुमान लगाना है | पूर्वानुमान सही निकलें तो खोजे गए कारण सही अन्यथा गलत !

      जिन वैज्ञानिकों के द्वारा ऐसा कुछ खोजा नहीं जा सका !उन्हें भी जनता के टैक्स के  पैसों से भारी भरकम सैलरी सुख सुविधाएँ आदि दी जाती हैं आखिर क्यों ? 

      कारण खोजने के नाम पर बहाने बनाए जाते हैं |तीर तुक्के लगाए जाते हैं |  कार्यों पर प्रतिबंध या जुर्माना लगा दिया जाता है | इसके अलावा उन वैज्ञानिकों के बश का है भी क्या ?  

    वायु प्रदूषण कब बढ़ेगा क्यों बढ़ेगा ये खोज नहीं पाए किंतु जब बढ़ेगा उस समय जो घटना घट रही होती सारा दोष उसी पर मढ़ देते हैं |  वायु प्रदूषण  दीपावली के समय बढे तो पटाखों का बहाना उसके बाद बढ़े तो  पराली जलाने का बहाना,उसके बाद बढ़े तो ठंड में 'एयर लॉक', गर्मी में बढ़े तो 'धूल भरी आँधियों का बहाना ! हर मौसम में प्रदूषण का एक नया और सुविधाजनक बहाना तैयार कर लेते हैं । सोचिए अबकी बार पिछले सप्ताह से वायु प्रदूषण बढ़ रहा है | इनमें से कोई बहाना काम नहीं आ रहा है | अब बतावें कि वायु प्रदूषण बढ़ क्यों रहा है ? दिवाली के पटाखे अभी फोड़े नहीं गए , पराली अभी जली नहीं ठंड अभी पड़ी नहीं | आँधियों से धूल उडी नहीं | सरकार उन्हीं से पूछे अब क्यों बढ़ रहा  है वायुप्रदूषण !

      वो कहेंगे उद्योग, निर्माण कार्य और गाड़ियां ज़िम्मेदार हैं। पर ये तो साल के बारह महीने, रोज़ाना चलते हैं। फिर अचानक एक ही हफ्ते में हवा में यह ज़हर कैसे घुल गया है? सिर्फ आंखों देखी घटना को बिना किसी डेटा के प्रदूषण का मुख्य कारण मान लेना तर्क नहीं, प्रशासनिक अंधापन है। विज्ञान तर्क और ठोस प्रमाण पर चलता है, अनुमानों पर नहीं। 

   यदि इतने दशकों बाद भी हमारी वैज्ञानिक संस्थाएं प्रदूषण का वास्तविक, तकनीकी और सटीक स्रोत नहीं खोज पा रही हैं, तो जनता की गाढ़ी कमाई और टैक्स का पैसा ऐसे अनुसंधानों, प्रयोगशालाओं और वैज्ञानिकों पर क्यों बहाया जा रहा है? केवल प्रतिबंध लगाना और जुर्माने थोपना नीति नहीं, विफलता को छुपाने का ड्रामा है।
सुविधाजनक बहानों और दिखावटी पहलों का दौर बंद होना चाहिए। हमें प्रशासनिक खानापूर्ति नहीं, वास्तविक फोरेंसिक डेटा और ठोस वैज्ञानिक जवाबदेही चाहिए। तर्कसंगत सवाल पूछिए, क्योंकि हवा सबकी है और पैसा भी जनता का है।

कोई टिप्पणी नहीं: